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नया नियम · मत्ती · अध्याय 27 / 28

मत्ती 27

1जब सुबह हुई तो सब मुख्य याजकाें और लोगों के प्रचीनों ने यीशु के विरुद्ध उसे मार डालने की सम्मति की।

2फिर उन्होंने उसे बांधा और लेजाकर राज्यपाल पिलातुस के हाथों में सौंप दिया।

3तब जब यहूदा ने, जिसने उसके साथ छल किया था, यह देखा कि यीशु दोषी ठहराया गया है, तो वह पछताया और चांदी के तीस टुकड़ों को मुख्य याजकों और प्राचीनों को यह कहकर लौटा दिया,

4“मैंने निर्दोष के लहू का सौदा करके पाप किया है।” परन्तु उन्हाेंने कहा, “इससे हमें क्या? तू ही जान।”

5तब वह उन चांदी के सिक्कों को मन्दिर में फेंककर चला गया और उसने जाकर फांसी लगा ली।

6तब मुख्य याजकों ने चांदी के उन सिक्कों को लेकर कहा, “इन्हें मन्दिर के कोज में रखना उचित नहीं, क्योंकि यह लहू का मूल्य है।”

7और उन्होंने आपस में सलाह की और उन पैसों से परदेशियों को दप़फ़नाने के लिए कुम्हार का खेत मोल लिया।

8इसी कारण से वह खेत आज भी ‘लहू का खेत’ कहलाता है।

9तब वह वचन जो यिर्मयाह नबी के द्वारा कहा गया था पूरा हुआः “उन्होंने चांदी के तीस सिक्के लिए, अर्थात् वह मूल्य जिसे इस्राएल की सन्तानों ने उसके लिए ठहराया था।

10और उन्होंने उसे कुम्हार के खेत के लिए दे दिया, जैसा कि प्रभु ने मुझे निर्देश दिया था।”

11तब यीशु राज्यपाल के सामने खड़ा हुआ और राज्यपाल ने उससे पूछा, “क्या तू यहूदियों का राजा है?” तो यीशु ने उससे कहा, “ठीक, तू स्वयं ही कहता है।”

12और जब मुख्य याजक तथा प्राचीन उसपर दोष लगा रहे थे तो उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

13तब पिलातुस ने उससे कहा, “क्या तू नहीं सुनता, ये तेरे विरुद्ध कितनी बातों की गवाही दे रहे हैं?”

14परन्तु उसने उसको एक भी बात का उत्तर नहीं दिया। इससे राज्यपाल को बड़ा आशचर्य हुआ।

15राज्यपाल की यह रीति थी कि पर्व के समय किसी एक बन्दी को जिसे लोग चाहते थे, छोड़ दिया करता था।

16और उस समय उनकी व़फ़ैद में बरअब्बा नामक एक कुख्यात बन्दी था।

17जब वे इकट्ठे हुए तो पिलातुस ने उनसे कहा, “तुम किसको चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए छोड़ दूं? बरअब्बा को, या यीशु को जो मसीह कहलाता है?”

18क्योंकि वह जानता था कि उन्होंने उसे ईर्ष्यावश पकड़वाया है।

19और जब वह न्याय-आसन पर बैठा तो उसकी पत्नी ने उसे कहला भेजा, “इस धर्मी मनुष्य के मामले में हाथ न डालना, क्योंकि आज रात को मैंने स्वप्न में उसके कारण बहुत दुख उठाया है।”

20परन्तु मुख्य याजकों और प्राचीनों ने भीड़ को भड़काया कि वे बरअब्बा को छोड़ने और यीशु को मार डालने की मांग करे।

21तब राज्यपाल ने उत्तर दिया, “इन दोनों में से किसको चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए छोड़ दूं?” उन्हों कहा, “बरअब्बा को।”

22पिलातुस ने उनसे कहा, “फिर मैं यीशु का, जो मसीह कहलाता है, क्या करूं?” उन सब ने कहा, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।”

23उसने कहा, “क्यों? उसने क्या बुराई की है?” परन्तु वे और भी अधिक चिल्लाकर कहने लगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए!”

24जब पिलातुस ने देखा कि मुझसे कुछ भी बन नहीं पड़ता वरन् दंगा भड़कने पर है, तो उसने पानी लिया और भीड़ के सामने अपने हाथ धोकर कहा, “मैं इस मनुष्य के लहू से निर्दोष हूँ। तुम्हीं जानो।”

25इसपर लोगों ने उत्तर दिया, “इसका लहू हमपर और हमारी सन्तान पर हो!”

26तब उसने बरअब्बा को तो उनके लिए छोड़ा, पर यीशु को कोड़े लगवाकर क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए सौंप दिया।

27तब राज्यपाल के सैनिक, यीशु को प्रेटोरियुम में ले गए, और वहां उसके चारों ओर समस्त रोमी सैन्य-दल को एकत्रित कर लिया।

28फिर उसके वस्त्र उतारकर उन्होंने उसे गाढ़े लाल रंग का चोगा पहनाया।

29और काँटों का मुकुट गूंथकर उन्होंने उसके सिर पर रखा और उसके दाहिने हाथ में सरकण्डा दिया। फिर उसके आगे घुटने टेककर वे उसका उपहास करके कहने लगे, “हे यहूदियों के राजा, तेरी जय हो!”

30उन्होंने उसपर थूका, और सरकण्डा लेकर वे उसके सिर पर मारने लगे।

31उपहास करने के बाद उन्होंने उसका चोगा उतारा और उसी के वस्त्र उसे पहना दिए, और क्रूस पर चढ़ाने के लिए ले चले।

32जब वे बाहर निकल रहे थे तो उन्हें शिमौन नामक एक कुरेनी मिला। उन्होंने उसे बेगार में पकड़ा कि उसका क्रूस उठाकर ले चले।

33और जब वे उस स्थान पर आए जो गुलगुता कहलाता है, अर्थात् ‘खोपड़ी का स्थान,’

34तो उन्होंने उसे पित्त मिला हुआ दाखरस पीने को दिया, परन्तु उसने चखकर पीना न चाहा।

35और जब वे उसे क्रूस पर चढ़ा चुके तो उन्होंने चिट्ठियां डालकर उसके कपड़ों को आपस में बांट लिया।

36और वहां बैठकर, वे उसका पहरा देने लगे।

37और उन्होंने उसके सिर के ऊपर उसका दोषपत्र लगाया जिसमें लिखा था, “यह यहूदियों का राजा यीशु है।”

38उस समय उन्होंने उसके साथ दो डाकुओं को भी क्रूस पर चढ़ाया, एक को उसकी दाहिनी और दूसरे को उसकी बाईं ओर।

39वहां से आने-जाने वाले उसकी निन्दा कर रहे थे और सिर हिला हिलाकर,

40कह रहे थे, “हे मन्दिर को ढाने वाले और तीन दिन में बनाने वाले, अपनेआप को बचा! यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो क्रूस पर से उतर आ।”

41इसी प्रकार मुख्य याजक भी शास्त्रियों और प्राचीनों के साथ उसका ठट्ठा करते हुए कह रहे थे,

42“इसने दूसरों को बचाया, पर अपने को नहीं बचा सकता। यह इस्राएल का राजा है-अब वह क्रूस पर से उतरे तब हम इसपर विश्वास करेंगे।

43यह परमेश्वर पर भरोसा रखता है; यदि वह इससे प्रसन्न है तो अभी छुड़ा ले, क्योंकि इसने कहा था, ‘मै परमेश्वर का पुत्र हूँ’।”

44और वे डाकू भी जो उसके साथ क्रूसों पर चढ़ाए गए थे, इसी प्रकार उसकी निन्दा कर रहे थे।

45दोपहर से लेकर तीन बजे तक सारे देश में अन्धकार छाया रहा।

46तीन बजे के लगभग यीशु ऊंची आवाज से चिल्लाया “एली, एली, लमा शबक्तनी?” अर्थात्, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?”

47वहां खड़े हुओं में से कुछ ने यह सुनकर कहा, “यह मनुष्य एलिय्याह को पुकार रहा है।”

48उनमें से एक ने तुरन्त दौड़कर स्पंज को सिरके में डुबाया और सरकण्डे पर रखकर उसे चूसने को दिया।

49परन्तु शेज लोगों ने कहा, “देखें एलिय्याह उसे बचाने के लिए आता है या नही।”

50तब यीशु ने फिर ऊंची आवाज से चिल्लाकर प्राण त्याग दिया।

51और देखो, मन्दिर का पर्दा ऊपर से नीचे तक फटकर दो टुकड़़े हो गया। पृथ्वी डोल उठी, और चट्टानें भी तड़क गईं,

52तथा कब्रें खुल गईं, और सोए हुए बहुत-से पवित्र लोगों के शव जीवित हो उठे।

53और उसके पुनरुत्थान के बाद वे कब्रों में से निकलकर पवित्र नगर में गए और बहुतों को दिखाई दिए।

54तब सूबेदार और जो लोग उसके साथ यीशु का पहरा दे रहे थे, जब उन्होंने भूकम्प तथा इन घटनाओं को देखा तो अत्यन्त भयभीत होकर कहा, “सचमुच यह परमेश्वर का पुत्र था!”

55और वहां बहुत-सी स्त्रियां जो यीशु की सेवा करती हुई गलील से उसके पीछे चली आई थीं, दूर से यह देख रही थी।

56उनमें मरियम मगदलीनी, याकूब और युसुफ की माता मरियम, और जब्दी के पुत्रों की माता थी।

57जब संध्या हुई तो अरिमतियाह का यूसुफ नामक एक धनी पुरुष आया। वह भी यीशु का चेला था।

58जब उसने पिलातुस के पास जाकर यीशु का शव मांगा तो पिलातुस ने उसे दिलवा दिया।

59तब यूसुफ ने शव को ले जाकर स्वच्छ मलमल के कपड़े में लपेटा,

60तथा उसे अपनी नई कब्र में रखा जो उसने चट्टान में खुदवाई थी। फिर एक भारी पत्थर को कब्र के द्वार पर लुढ़काकर वह चला गया।

61मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम वहां कब्र के सामने बैठी थी।

62दूसरे दिन, अर्थात् तैयारी के दिन के एक दिन पश्चात्, मुख्य याजकों और फरीसियों ने पिलातुस के पास इकट्ठे होकर कहा,

63“महोदय, हमें स्मरण है कि उस धोखेबाज ने अपने जीते-जी कहा था, ‘तीन दिन के बाद मैं फिर जी उठूंगा।’

64अतः आज्ञा दे कि तीसरे दिन तक कब्र की रक्षा की जाए, कहीं ऐसा न हो कि चेले आकर शव को चुरा ले जाएं और लोगों से कहें, ‘वह मृतकों में से जी उठा है।’ तब पिछला धोखा पहले से भी बुरा होगा।”

65पिलातुस ने उनसे कहा, “तुम्हारे पास पहरेदार है; जाओ, जैसे भी उसे सुरक्षित रख सको, करो।”

66अतः उन्होंने जाकर कब्र की रखवाली करवाई तथा पहरेदार बैठाकर पत्थर पर मुहर भी लगा दी।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)