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नया नियम · मत्ती · अध्याय 26 / 28

मत्ती 26

1ऐसा हुआ कि जब यीशु ये सब बातें कह चुका, तो उसने अपने चेलों से कहा,

2“तुम जानते हो कि दो दिन के पश्चात् फसह का पर्व आ रहा है और मनुष्य का पुत्र क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए पकड़वाया जाएगा।”

3तब मुख्य याजक और लोगों के प्रचीन, काइफा नाम महायाजक के आंगन में एकत्रित हुए,

4और उन्होंने आपस में यीशु को चुपचाप पकड़ने और मार डालने का षडयंत्र रचा।

5परन्तु वे कहते थे, “पर्व के समय नहीं, कहीं ऐसा न हो कि लोगों में दंगा हो जाए।”

6जब यीशु बैतनिय्याह में शमौन कोढ़ी के घर में था,

7तो एक स्त्री संगमरमर के पात्र में बहुमूल्य इत्र लेकर उसके पास आई, और जब वह भोजन करने बैठा तो उसे उसके सिर पर उंडेल दिया।

8परन्तु चेले यह देख कर क्रोधित हुए और कहने लगे, “यह बरबादी क्यों?

9इस इत्र को ऊंचे दाम में बेचकर कंगालों को पैसा दिया जा सकता था।”

10यह जानकर यीशु ने उनसे कहा, “तुम इस स्त्री को क्यों परेशान करते हो? क्या इसलिए कि उसने मेरे साथ भलाई की है?

11कंगाल तो तुम्हारे साथ सदा रहते हैं, परन्तु मैं तुम्हारे साथ सदा न रहूँगा।

12जब उसने मेरी देह पर यह इत्र उंडेला तो इसलिए उंडेला कि मेरे गाड़े जाने के लिए मुझे तैयार करे।

13मैं तुमसे सच कहता हूँ कि समस्त संसार में जहां कहीं यह सुसमाचार प्रचार किया जाएगा, वहां इस स्त्री के कार्य का वर्णन भी उसकी स्मृति में किया जाएगा।”

14तब बारहों में से एक, जिसका नाम यहूदा इस्करियोती था, मुख्य याजकों के पास गया,

15और उसने कहा, “यदि मैं यीशु को तुम्हारे हाथ पकड़वा दूं तो मुझे क्या दोगे?” और उन्होंने उसे चांदी के तीस सिक्के तौलकर दे दिए।

16तब से वह उसे पकड़वा देने के लिए उपयुक्त अवसर ढूंढ़ने लगा।

17फिर चेले अखमीरी रोटी के पर्व के पहले दिन, यीशु के पास आकर पूछने लगे, “तू कहां चाहता है कि हम तेरे लिए फसह खाने की तैयारी करें?”

18उसने कहा, “नगर में अमुक व्यक्ति के पास जाकर उससे कहो, ‘गुरु कहता है, “मेरा समय निकट है। मुझे अपने चेलों के साथ तेरे यहां फसह का पर्व मनाना है।”

19तब यीशु की आज्ञा के अनुसार चेलों ने फसह की तैयारी की।

20जब संध्या हुई तो वह बारह चेलों के साथ भोजन करने बैठा।

21जब वे भोजन कर रहे थे तो उसने कहा, “मैं तुमसे सच कहता हूँ कि तुममें से एक मुझे पकड़वाएगा।”

22इसपर वे अत्यन्त व्यथित होकर एक-एक करके उससे पूछने लगे, “प्रभु, मैं तो नहीं हूँ न?”

23उसने कहा, “वह जिसने मेरे साथ कटोरे में हाथ डाला है, वही मुझे पकड़वाएगा।

24मनुष्य के पुत्र को तो, जैसा उसके विषय में लिखा गया है, जाना ही है, परन्तु हाय उसपर जिसके द्वारा मनुष्य का पुत्र पकड़वाया जाएगा! उस मनुष्य के लिए अच्छा होता यदि वह जन्म ही न लेता।”

25तब उसके पकड़वाने वाले, अर्थात् यहूदा ने कहा, “रब्बी, क्या वह मैं हूँ?” उसने कहा, “तू ने स्वयं ही कह दिया।”

26जब वे भोजन कर रहे थे, यीशु ने रोटी ली और आशिज मांगकर तोड़ी और चेलों को देकर कहा, “लो, खाओ; यह मेरी देह है।”

27फिर उसने प्याला लेकर धन्यवाद दिया और उन्हें देते हुए कहा, “तुम सब इसमें से पियो,

28क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लहू है जो बहुत लोगों के निमित्त पापों की क्षमा के लिए बहाया जाने को है।

29परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि दाख का यह रस अब से लेकर उस दिन तक नहीं पीऊंगा, जब तक अपने पिता के राज्य में तुम्हारे साथ नया न पीऊ।”

30भजन गाने के पश्चात् वे जैतून पर्वत पर चले गए।

31तब यीशु ने उनसे कहा, “आज रात तुम सब मेरे कारण ठोकर खाओगे, क्योंकि लिखा है, ‘मैं चरवाहे को मारूंगा और झुंड की भेड़ें तितर-बितर हो जाएंगी।’

32परन्तु जीवित होने के पश्चात् मैं तुमसे पहले गलील को जाऊंगा।”

33इसपर पतरस ने उससे कहा, “चाहे सब-के-सब तेरे कारण ठोकर खाएं-तो-खाएं, पर मैं कभी नहीं खाऊंगा।”

34यीशु ने कहा, “मैं तुझसे सच कहता हूँ कि आज ही रात को, मुर्ग के बांग देने से पहले, तू तीन बार मेरा इनकार करेगा।”

35पतरस ने उससे कहा, “चाहे मुझे तेरे साथ मरना भी पड़े, मैं तेरा इनकार नहीं करूंगा।” सब चेलों ने भी यही बात कही।

36तब यीशु उनके साथ गतसमनी नामक स्थान में आया, और अपने चेलों से कहा, “जब तक मैं वहां जाकर प्रार्थना करता हूँ, तुम यहीं बैठो।”

37उसने अपने साथ पतरस और जब्दी के दो पुत्रों को लिया और व्यथित तथा व्याकुल होने लगा।

38फिर उसने उनसे कहा, “मेरा मन बहुत उदास है, यहां तक कि मैं मरने पर हूँ। यहीं ठहरो और मेरे साथ जागते रहो।”

39फिर वह उनसे थोड़ा आगे बढ़ा और मुंह के बल गिरकर यह प्रार्थना करने लगाः “हे मेरे पिता, यदि सम्भव हो तो यह प्याला मुझसे टल जाए। फिर भी मेरी नहीं, पर तेरी इच्छा पूरी हो।”

40तब वह चेलों के पास आया, और उन्हें सोते पाकर उसने पतरस से कहा, “क्या तुम लोग मेरे साथ एक घड़ी भी न जाग सके?

41जागते रहो और प्रार्थना करते रहो कि तुम परीक्षा में न पड़ो। आत्मा तो तैयार है, परन्तु देह निर्बल है।”

42फिर उसने दूसरी बार जाकर यह प्रार्थना कीः “हे मेरे पिता, यदि यह मेरे पीए बिना नहीं टल सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो।”

43उसने फिर आकर उन्हें सोते पाया, क्योंकि उनकी आंखें नींद से भारी थी।

44वह उन्हें फिर छोड़कर चला गया और फिर वही बात कहकर तीसरी बार प्रार्थना करने लगा।

45फिर उसने चेलों के पास आकर उनसे कहा, “क्या तुम अब तक आराम से सो रहे हो? देखो, घड़ी आ पहुंची है और मनुष्य का पुत्र पापियों के हाथों में पकड़वाया जाता है।

46उठो, चले। देखो, मेरा पकड़वाने वाला निकट आ पहुंचा है।”

47जब वह यह कह ही रहा था तो देखो, यहूदा, जो बारहों में से एक था आ गया, और उसके साथ तलवारें और लाठियां लिए हुए एक बड़ी भीड़ थी जिसे मुख्य याजकों और लोगों के प्राचीनों ने भेजा था।

48पकड़वाने वाले ने उन्हें यह कहकर संकेत दिया थाः “जिसको मैं चूमूं, वही है। उसे पकड़ लेना।”

49वह तुरन्त यीशु के पास आकर बोला, “हे रब्बी, नमस्कार!” और उसे चूमा।

50यीशु ने उससे कहा, “मित्र, जिस काम के लिए तू आया है, उसे कर।” तब उन्होंने पास आकर यीशु को पकड़ा और गिरफ्ऱतार किया।

51फिर देखो, यीशु के साथियों में से एक ने हाथ बढ़ाकर तलवार खींची और महायाजक के दास पर चलाई और उसका कान उड़ा दिया।

52तब यीशु ने उससे कहा, “अपनी तलवार म्यान में रख; क्योंकि वे सब जो तलवार उठाते हैं तलवार से ही नाश किए जाएंगे।

53अथवा क्या तुम सोचते हो कि मैं अपने पिता से विनती नहीं कर सकता और वह तुरन्त स्वर्गदूतों का बारह से अधिक सैन्यदल मेरे अधिकार में कर देगा?

54परन्तु तब पवित्रशास्त्र का लेख कैसे पूरा होगा कि ऐसा ही होना अवश्य है?”

55तब यीशु ने भीड़ से कहा, “क्या तुम तलवार और लाठियां लिए मुझे पकड़ने आए हो मानों मैं कोई डाकू हूँ? मैं प्रतिदिन मन्दिर में बैठकर उपदेश दिया करता था और तुमने मुझे नही पकड़ा।

56परन्तु यह सब इसलिए हुआ कि नबियों के लेख पूरे हो।” तब सब चेले उसे छोड़कर भाग गए।

57जिन्होंने यीशु को पकड़ा था, वे उसे महायाजक काइफा के पास ले गए जहाँ शास्त्री और प्राचीन इकट्ठे थे।

58पतरस भी कुछ दूरी पर उसके पीछे-पीछे चलकर महायाजक के आंगन तक पहुंचा और उसमें प्रवेश करके, परिणाम देखने के लिए, पहरेदारों के साथ बैठ गया।

59मुख्य याजक और सारी महासभा यीशु के विरुद्ध झूठी साक्षी पाने का प्रयत्न करते रहे जिससे कि वे उसे मार डाले।

60परन्तु बहुत-से झूठे गवाहों के आने पर भी, वे कुछ न पा सके। अन्त में दो ने आकर कहा,

61“इस मनुष्य ने कहा है, ‘मैं परमेश्वर के मन्दिर को ध्वस्त करके उसे तीन दिन में पुनः बना सकता हूँ’।”

62तब महायाजक ने खड़े होकर उससे कहा, “क्या तू उत्तर नहीं देता? ये लोग तेरे विरुद्ध क्या साक्षी दे रहे हैं?”

63परन्तु यीशु चुप रहा। इसपर महायाजक ने उससे कहा, “मैं जीवते परमेश्वर की शपथ देता हूँ, कि यदि तू परमेश्वर का पुत्र मसीह है, तो हमसे कह दे।”

64यीशु ने उससे कहा, “तूने स्वयं ही यह कह दिया। फिर भी मैं तुझसे कहता हूँ कि अब से तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान के दाहिनी ओर बैठा हुआ और स्वर्ग के बादलों पर आता हुआ देखोगे।”

65इस पर महायाजक अपने वस्त्र फाड़कर कहने लगा, “इसने परमेश्वर की निन्दा की है। अब हमें और गवाहों की क्या आवश्यकता है? देखो, तुम यह निन्दा सुन चुके हो।

66अब तुम्हारा क्या विचार है?” उन्होंने उत्तर दिया, “वह मृत्युदण्ड के योग्य है!”

67तब उन्होंने उसके मुंह पर थूका, उसे घूसों से मारा और कुछ ने थप्पड़ मारकर कहा,

68“हे मसीह, भविष्यद्वाणी करके हमें बताः किसने तुझे मारा?”

69पतरस आंगन में बाहर बैठा हुआ था कि एक दासी ने उसके पास आकर कहा, “तू भीे गलीली यीशु के साथ था।”

70परन्तु इससे इनकार करते हुए उन सब के सामने उसने कहा, “मैं नहीं जानता कि तू क्या कह रही है।”

71जब वह बाहर ड्योढ़ी पर गया तो एक और दासी ने उसे देखकर उनसे जो वहां पर थे, कहा “यह मनुष्य भी नासरत के यीशु के साथ था।”

72तब उसने शपथ खाकर फिर इनकार कियाः “मैं इस मनुष्य को नहीं जानता।”

73थोड़ी देर के बाद उन्होंने जो वहां खड़े थे पतरस के पास आकर उससे कहा, “निशिचतरूप से तू भी उन्हीं में से है, क्योंकि तेरी बोली तुझे प्रकट करती है।”

74तब वह धिक्कारने और शपथ खाने लगाः “मैं उस मनुष्य को नहीं जानता।” और तुरन्त मुर्ग ने बांग दी।

75तब पतरस को वह बात जो यीशु ने कही थी स्मरण हो आईः “मुर्ग के बांग देने से पहले तू तीन बार मेरा इनकार करेगा।” और वह बाहर जाकर फूट-फूट कर रोने लगा।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)