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नया नियम · मत्ती · अध्याय 25 / 28

मत्ती 25

1“तब स्वर्ग के राज्य की तुलना उन दस कुँवारियों से की जाएगी जो अपने दीपक लेकर दूल्हे से मिलने को निकली।

2उनमें से पांच मूर्ख और पांच बुद्धिमान थी।

3क्योंकि मूर्खों ने जब दीपक लिए तो उन्होंने अपने साथ तेल नहीं लिया,

4परन्तु बुद्धिमानों ने अपने दीपकों के साथ कुप्पियों में तेल भी लिया।

5जब दूल्हे के आने में देर हो रही थी तो वे सब ऊँघने लगीं और सो गईं।

6परन्तु आधी रात को पुकार मचीः ‘देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने चलो!’

7तब वे सब कुँवारियां उठ बैठीं और अपना-अपना दीपक ठीक करने लगी।

8और मूर्खों ने बुद्धिमानों से कहा, ‘हमें भी अपने तेल में से कुछ दो, क्योंकि हमारे दीपक बुझने पर है।’

9परन्तु बुद्धिमानों ने उत्तर दिया, ‘नहीं, यह हमारे लिए और तुम्हारे लिए पूरा न होगा। अच्छा है कि तुम दुकानदारों के पास जाकर अपने लिए मोल लो।’

10जब वे मोल लेने को चली गईं तो दूल्हा आ गया, और जो तैयार थीं, वे उसके साथ विवाह-भोज में अन्दर चली गईं। तब द्वार बन्द कर दिया गया।

11बाद में वे दूसरी कुँवारियां भी आकर कहने लगीं, ‘स्वामी, हे स्वामी, हमारे लिए द्वार खोल दे!’

12परन्तु उसने उत्तर दिया, ‘मैं तुमसे सच कहता हूँ, मैं तुम्हें नहीं जानता।’

13इसलिए जागते रहो, क्योंकि तुम न तो उस दिन को जानते हो और न ही उस घड़ी को।

14“फिर यह उस मनुष्य के समान है जो यात्रा पर जाने को था और जिसने अपने दासों को बुलाकर अपनी सम्पत्ति उनको सौंप दी।

15उसने एक को पांच तोड़े, दूसरे को दो, और तीसरे को एक, अर्थात् प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार दिया, और यात्रा पर चला गया।

16जिसे पांच तोड़े मिले थे, उसने तुरन्त जाकर उनसे व्यापार किया और पांच तोड़े और कमाए।

17इसी प्रकार जिसे दो तोड़े मिले थे, उसने भी दो और कमाए।

18पर वह जिसे एक मिला था, उसने जाकर भूमि खोदी और अपने स्वामी के तोड़े को उसमें छिपा दिया।

19“बहुत दिनों के पश्चात् उन दासों का स्वामी आया और उनसे लेखा लेने लगा।

20तब वह जिसे पांच तोड़े मिले थे, उसने पांच तोड़े और लाकर कहा, ‘स्वामी, तूने मुझे पांच तोड़े सौपें थे। देख, मैंने इनसे पांच और कमाए है।’

21उसके स्वामी ने उससे कहा, ‘शाबाश, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास! तू थोड़े ही में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी ठहराऊंगा। अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हो।’

22“वह जिसे दो तोड़े मिले थे, उसने आकर कहा, ‘स्वामी, तूने मुझे दो तोड़े सौंपे थे। देख, मैंने दो और कमाए है।’

23स्वामी ने उससे कहा, ‘शाबाश, अच्छे और विश्वासयोग्य दास! तू थोड़े ही में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत-सी वस्तुओं का अधिकारी बनाऊंगा। अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हो।’

24“तब वह भी जिसे एक तोड़ा मिला था आकर कहने लगा, ‘हे स्वामी, मैं जानता था कि तू कठोर मनुष्य है; जहां नहीं बोता वहां काटता है’ और जहां नहीं बिखेरता वहां से बटोरता है;

25अतः मैं डर गया और जाकर तेरे तोड़े को मैंने भूमि में छिपा दिया। देख, जो तेरा है उसे ले ले।’

26परन्तु उसके स्वामी ने उसे उत्तर दिया, ‘हे दुष्ट और आलसी दास, तू यह जानता था कि जहां मैं नहीं बोता वहां से काटता हूँ, और जहां बीज नहीं बिखेरता वहां से बटोरता हूँ;

27तब तो तुझे चाहिए था कि मेरा धन साहूकारों के पास रख देता जिससे कि मैं आकर अपना धन ब्याज सहित उनसे ले लेता।

28इसलिए इससे वह तोड़ा भी ले लो, और जिसके पास दस हैं, उसे दे दो।

29क्योंकि प्रत्येक जिसके पास है उसको और भी दिया जाएगा और उसके पास बहुत हो जाएगा। परन्तु जिसके पास नहीं है, उससे वह भी ले लिया जाएगा जो उसके पास है।

30इस निकम्मे दास को बाहर के अन्धियारे में डाल दो, जहां रोना और दांत पीसना होगा।’

31“पर जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा और सब स्वर्गदूत उसके साथ आएंगे, तो वह अपने महिमामय सिंहासन पर विराजमान होगा।

32और सब जातियां उसके सम्मुख एकत्रित की जाएगी; और वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा-जैसे चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग करता है।

33वह भेड़ों को अपनी दाहिनी ओर, तथा बकरियों को बाईं ओर करेगा।

34तब राजा अपने दाहिने हाथ वालों से कहेगा, ‘हे मेरे पिता के धन्य लोगो, आओ, उस राज्य के अधिकारी बनो जो जगत की उत्पत्ति से तुम्हारे लिए तैयार किया गया है।

35क्योंकि मैं भूखा था और तुमने मुझे खाने को दिया। मैं प्यासा था और तुमने मुझे पानी पिलाया। मैं परदेशी था, और तुमने मुझे अपने घर में ठहराया।

36मैं नंगा था, तुमने मुझे कपड़े पहनाए; बीमार था, तुमने मेरी सुधि ली; बन्दीगृह में था, तुम मुझसे मिलने आए।

37“तब धर्मी उसे उत्तर देंगे, ‘प्रभु, हमने तुझे कब भूखा देखा और भोजन कराया, या प्यासा देखा और पानी पिलाया?

38और हमने कब तुझे परदेशी देखा और अपने घर में ठहराया या नंगा देखा और कपड़े पहनाए?

39हमने कब तुझे बीमार या बन्दीगृह में देखा और तुझसे मिलने आए?’

40“इस पर राजा उन्हें उत्तर देगा, ‘मैं तुमसे सच कहता हूँ कि जो कुछ तुमने मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी भी एक के साथ किया, वह मेरे साथ किया।’

41“तब वह बाईं ओर वालों से कहेगा, ‘हे शापित लोगो, मुझ से दूर होकर उस अनन्त अग्नि में जा पड़ो जो शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गई है!

42मैं भूखा था, तुमने मुझे कुछ खाने को नहीं दिया; प्यासा था, तुमने मुझे पानी नहीं पिलाया;

43परदेशी था, तुमने मुझे अपने घर में नहीं ठहराया; नंगा था, तुमने मुझे कपड़े नहीं पहनाए; बीमार और बन्दीगृह में था, तुम मुझे देखने नहीं आए।’

44“इस पर वे उससे पूछेंगे, ‘प्रभु, हमने कब तुझे भूखा या प्यासा, या परदेशी, या नंगा, या बीमार, या बन्दीगृह में देखा, और तेरी देख-भाल न की?’

45“तब वह उन्हें उत्तर देगा, ‘मैं तुमसे सच कहता हूँ कि जो तुमने इन छोटे से छोटों में से किसी एक के साथ नहीं किया, वह मेरे साथ भी नहीं किया।’

46“ये लोग अनन्त दण्ड भोगेंगे, परन्तु धर्मी अनन्तजीवन में प्रवेश करेंगे।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)