नया नियम · मत्ती · अध्याय 8 / 28
मत्ती 8
1जब वह पर्वत पर से उतरा, तो एक विशाल जनसमूह उसके पीछे चल पड़ा।
2और देखो, एक कुष्ठ-रोगी उसके पास आया और दण्डवत् करके उससे कहने लगा, “हे प्रभु, यदि तू चाहे तो मुझे शुद्ध कर सकता है।”
3यीशु ने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ और कहा, “मै चाहता हूँ। तू शुद्ध हो जा।” और वह कुष्ठ-रोग से तुरन्त शुद्ध हो गया।
4और यीशु ने उससे कहा, “देख, किसी से न कहना, परन्तु जाकर अपने आप को याजक को दिखा, और मूसा के द्वारा निर्धारित भेंट चढ़ा कि उनपर साक्षी हो।”
5और जब उसने कफरनहूम में प्रवेश किया तो एक सूबेदार उसके पास आया और विनती करके
6कहने लगा, “हे प्रभु, मेरा सेवक लकवे का मारा घर में पड़ा हुआ अत्यन्त पीड़ा में तड़प रहा है।”
7उसने उससे कहा, “मैं आकर उसे चंगा करूंगा।”
8परन्तु सूबेदार ने उत्तर दिया, “हे प्रभु, मैं इस योग्य नहीं कि तू मेरी छत तले आए, परन्तु केवल वचन कह दे और मेरा सेवक चंगा हो जाएगा।
9क्योंकि मैं भी शासन के अधीन हूँ, और मेरे अधीन सिपाही है। जब मैं एक से कहता हूँ, ‘जा!’ तो वह जाता है, और दूसरे से, ‘आ!’ तो वह आता है, और जब अपने दास से कहता हूँ, ‘यह कर!’ तो वह करता है।”
10जब यीशु ने यह सुना तो अचम्भा किया और अपने पीछे आने वालों से कहा, “मैं तुमसे सच कहता हूँ, मैंने इस्राएल के किसी व्यक्ति में भी ऐसा बड़ा विश्वास नही पाया।
11मैं तुमसे कहता हूँ कि पूर्व और पशिचम से बहुत-से लोग आकर इब्राहीम, इसहाक और याकूब के साथ स्वर्ग के राज्य में भोजन करने बैठेंगे,
12परन्तु राज्य के सन्तान बाहर अन्धकार में फेंक दिए जाएंगे; और वहां रोना और दांत पीसना होगा।”
13और यीशु ने सूबेदार से कहा, “जा, तेरे विश्वास के अनुसार ही तेरे लिए हो।” और सेवक उसी क्षण चंगा हो गया।
14और जब यीशु पतरस के घर आया तो उसकी सास को ज्वर से पीड़ित बिस्तर पर पड़े देखा।
15उसने उसका हाथ छुआ और उसका ज्वर उतर गया और वह उठकर उसकी सेवा-टहल करने लगी।
16और जब संध्या हुई, तो वे बहुत-से दृष्टात्मा-ग्रस्त लोगों को उसके पास लाए; और उसने वचन-मात्र से ही उन दुष्ट आत्माओं को निकाला और उन सब को चंगा किया जो बीमार थे,
17जिससे कि जो वचन यशायाह नबी द्वारा कहा गया था वह पूरा होः “उसने स्वयं हमारी दुर्बलताओं को ले लिया और हमारे रोगों को उठा लिया।”
18यीशु ने जब अपने चारों ओर भीड़ को देखा तो उस पार जाने का आदेश दिया।
19और किसी शास्त्री ने आकर उससे कहा, “गुरु, जहां कहीं तू जाएगा, मैं तेरे पीछे चलूंगा।”
20यीशु ने उससे कहा, “लोमड़ियों की मांदें और आकाश के पक्षियों के घोंसले होते हैं, परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिए सिर रखने को भी कहीं स्थान नहीं है।”
21उसके चेलों में से किसी ने उससे कहा, “प्रभु, पहले मुझे अनुमति दे कि मैं जाकर अपने पिता को दप़फ़न करू।”
22परन्तु यीशु ने उससे कहा, “मेरे पीछे चला आ और मुर्दों को अपने मुर्दे दप़फ़न करने दे।”
23जब वह नाव पर चढ़ गया तो उसके चेले उसके पीछे चल पड़े।
24और देखो, समुद्र में एक बड़ी आंधी उठी जिससे कि नाव लहरों से ढंक गई; परन्तु वह सो रहा था।
25वे उसके पास आए और उन्होंने यह कहकर उसे जगाया, “प्रभु, हमें बचा! हम नाश हुए जाते है।”
26उसने उनसे कहा, “हे अल्प-विश्वासियो, तुम इतने भयभीत क्यों हो?” तब उठकर उसने आंधी और समुद्र को डांटा, और पूर्णतः शान्ति छा गई।
27और वे विस्मित होकर कहने लगे, “यह कैसा मनुषय है, कि आंधी और समुद्र भी इसकी आज्ञा मानते हैं?”
28और जब वह दूसरी ओर गदरेनियों के प्रदेश में पहुंचा, तो दो मनुषय जिनमें दुष्ट आत्माएं थीं कब्रों से निकलकर उससे मिले। वे इतने उग्र थे कि कोई भी उस मार्ग से नहीं निकल सकता था।
29और देखो, उन्होंने चिल्लाकर कहा, “हे परमेश्वर के पुत्र, हमारा तुझ से क्या काम? क्या तू यहां हमें समय से पहले यातना देने आया है?”
30कुछ दूरी पर बहुत-से सूअरों का एक झुण्ड चर रहा था।
31दुष्ट आत्माएं उससे यह कहकर विनती करने लगीं, “यदि तू हमें निकालना चाहता है तो हमें सूअरों के झुण्ड में भेज दे।”
32उसने उनसे कहा, “जाओ!” और वे निकलकर सूअरों में समा गईं, और देखो, वह पूरा झुण्ड वेगपूर्वक ढालू किनारे से समुद्र में जा पड़ा और डूब मरा।
33चरवाहे भागकर नगर में गए तथा दुष्टात्मा-ग्रस्त मनुष्यो पर जो कुछ बीता था तथा इसी के साथ-साथ सारा हाल कह सुनाया।
34और देखो, सारे नगर के लोग निकल कर यीशु से मिलने आए, और जब उन्होंने उसे देखा तो उससे विनती की कि हमारे प्रदेश से बाहर चला जा।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)