Loading account

नया नियम · मत्ती · अध्याय 7 / 28

मत्ती 7

1“दोष न लगाओ जिससे तुम पर भी दोष न लगाया जाए।

2क्योंकि जिस प्रकार तुम दोष लगाते हो उसी प्रकार तुम पर भी दोष लगाया जाएगा। और जिस नाप से तुम नापते हो, उसी नाप से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा।

3तू क्यों अपने भाई की आंख के तिनके को देखता है और अपनी आंख का लट्ठा तुझे नहीं सूझता?

4अथवा तू अपने भाई से कैसे कह सकता है, ‘ला, मैं तेरी आंख से तिनका निकाल दूं,’ जबकि देख, लट्ठा तो स्वयं तेरी आंख में है?

5हे पाखण्डी, पहले अपनी आंख का लट्ठा निकाल ले, तब अपने भाई की आंख का तिनका निकालने के लिए तू स्पष्ट देख सकेगा।

6“पवित्र वस्तु कुत्तों को न दो, और अपने मोती सूअरों के आगे मत फेंको, कहीं ऐसा न हो कि वे उनको पैरों तले रौंदें और पलटकर तुम को फाड़ डाले।

7“मांगों तो तुम्हें दिया जाएगा, ढूंढो तो तुम पाओगे, खटखटाओ तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा।

8क्योंकि प्रत्येक जो मांगता है उसे मिलता है, और जो ढूंढता है वह पाता है, और जो खटखटाता है उसके लिए खोला जाएगा।

9तुममें ऐसा कौन है जो अपने पुत्र को जब वह रोटी मांगे तो पत्थर दे?

10अथवा मछली मांगे तो सांप दे?

11अतः जब तुम बुरे होकर अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो तो तुम्हारा पिता जो स्वर्ग में है अपने मांगने वालों को अच्छी वस्तुएं और अधिक क्यों न देगा?

12इसलिए जैसा कि तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें तुम भी उनके साथ वैसा ही करो, क्योंकि व्यवस्था और नबी यही सिखाते है।

13“सकरे फाटक से प्रवेश करो; क्योंकि विशाल है वह फाटक और चौड़ा है वह मार्ग जो विनाश की ओर ले जाता है, और बहुत-से हैं जो उससे प्रवेश करते है।

14परन्तु छोटा है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन की ओर ले जाता है और थोड़े ही हैं जो उसे पाते है।

15“झूठे नबियों से सावधान रहो जो भेड़ों के वेश में तुम्हारे पास आते हैं, परन्तु भीतर से वे भूखे, फाड़-खाने वाले भेड़िए है।

16उनके फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे। क्या कँटीली झाड़ियों से अंगूर या कांटों से अंजीर तोड़े जाते हैं?

17इसी प्रकार प्रत्येक अच्छा पेड़ अच्छा फल देता है, परन्तु निकम्मा पेड़ बुरा फल देता है।

18अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं दे सकता और न ही निकम्मा पेड़ अच्छा फल दे सकता है।

19प्रत्येक पेड़ जो अच्छा फल नहीं देता, काटा और आग में झोंक दिया जाता है।

20अतः तुम उनके फलों से उन्हें पहचान लोगे।

21प्रत्येक जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’, कहता है, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है वही प्रवेश करेगा।

22उस दिन बहुत लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हमने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की और तेरे नाम से दुष्ट आत्माओं को नहीं निकाला और तेरे नाम से बहुत-से आशचर्यकर्म नहीं किए?’

23तब मैं उनसे स्पष्ट कहूँगा, ‘मैंने तुम को कभी नहीं जाना; हे कुकर्मियाें, मुझ से दूर हटो।’

24“इसलिए जो कोई मेरे इन वचनों को सुनकर उन पर चलता है, वह उस बुद्धिमान मनुष्य के समान है जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया।

25और मेंह बरसा, बाढ़ें आईं, आंधियां चलीं और उस घर से टकराईं; फिर भी वह नहीं गिरा, क्योंकि उसकी नींव चट्टान पर डाली गई थी।

26परन्तु जो कोई मेरे इन वचनों को सुनता है और उनका पालन नहीं करता, वह उस मूर्ख के समान है जिसने अपना घर बालू पर बनाया।

27और मेंह बरसा, बाढ़ें आईं, आंधियां चलीं और उस घर से टकराईं; तब वह गिर पड़ा, और पूर्णतः ध्वस्त हो गया।”

28इसका परिणाम यह हुआ कि जब यीशु ये बातें कह चुका तो भीड़ उसके उपदेश से चकित हुई,

29क्योंकि वह उन्हें उनके शास्त्रियों के समान नहीं, वरन् अधिकार सहित उपदेश दे रहा था।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)