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पुराना नियम · गिनती · अध्याय 11 / 36

गिनती 11

1फिर वे लोग यहोवा के सुनते कुड़कुड़ाने लगे, और जब यहोवा ने यह सुना तब उसका क्रोध भड़क उठा, और यहोवा की आग उनके बीच जल उठी और छावनी को किनारे-किनारे भस्म करने लगी।

2तब लोगों ने मूसा से चिल्लाकर विनती की, और मूसा ने यहोवा से प्रार्थना की और आग बुझ गई।

3और उस स्थान का नाम तबेरा पड़ा, क्योंकि यहोवा की आग उनमें जल उठी थी।

4और जो मिली-जुली भीड़ उनके साथ थी उसमें लालसा भड़क उठी और इस्राएली फिर रोने लगे और कहने लगे कि हमें मांस खाने को कौन देगा?

5हमें मिस्र की वे मछलियां याद हैं जो हम मुफ्रत में खाया करते थे और खीरे और तरबूज और गन्दने और प्याज और लहसुन भी,

6परन्तु अब तो हमारा जी ऊब गया है, मन्ना के सिवाय हमें यहां और कुछ दिखाई नहीं देता।

7मन्ना तो धनिए के बीज के समान था और उसका रूप मोती के समान।

8लोग इधर-उधर जाकर उसे बटोरते और चक्की में पीसते थे अथवा ओखली में कूटकर तसले में उबालते और रोटियां बनाते थे, और उसका स्वाद तेल में तली हुई रोटी के समान था।

9जब रात में छावनी में ओस गिरती थी, तब मन्ना भी उसके साथ गिरता था।

10तब मूसा ने हर एक परिवार के लोगों को अपने-अपने डेरे के द्वार पर रोते हुए सुना, और यहोवा का क्रोध अत्यन्त भड़क उठा, और मूसा को भी यह बुरा लगा।

11तब मूसा ने यहोवा से कहा, “तू अपने दास पर क्यों इतना कठोर हो गया है? मैंने तेरी दृष्टि में क्यों अनुग्रह नहीं पाया जो तूने इस सारी प्रजा का बोझ मुझ पर लाद दिया है?

12क्या ये मेरे गर्भ में थे? क्या मैंने ही उनको उत्पन्न किया, जो तू कहता है कि जैसे धाय दूध पीते बालक को अपनी गोद में लिए फिरती है, वैसे ही मैं इन लोगों को अपनी गोद में लेकर उस देश में पहुंचाऊं जिसे देने की शपथ तूने उनके पूर्वजों से खाई है?

13इन सब लोगों को खिलाने के लिए मुझे इतना मांस कहां से मिलेगा? क्योंकि वे मेरे समक्ष रो-रोकर कहते हैं, ‘हमें मांस खाने को दे!’

14मैं अकेला इन सब लोगों को नहीं सम्भाल सकता, क्योंकि यह बोझ मेरे लिए बहुत भारी है।

15यदि तू मुझसे ऐसा ही व्यवहार करना चाहता है और यदि तेरा अनुग्रह मुझ पर हो तो मुझे शीघ्र ही मार डाल, जिससे कि मैं अपनी दुर्दशा देख न पाऊ।”

16तब यहोवा ने मूसा से कहा, “इस्राएल प्राचीनों में से मेरे लिए सत्तर पुरुष जिनको तू जानता है कि वे प्रजा के प्राचीन और अगुवे हैं, इकट्ठा कर और उन्हें मिलापवाले तम्बू के पास ले आ और वे तेरे साथ वहीं खड़े हो।

17तब मैं उतरकर वहां तुझसे बात करूंगा और जो आत्मा तुझमें है उसमें से कुछ लेकर उनमें डाल दूंगा, और वे तेरे साथ लोगों का बोझ उठाएंगे जिससे कि तुझे अकेले ही उठाना न पड़े।

18और इन लोगों से कह, ‘अपने आपको कल के लिए पवित्र करो और तुम्हें मांस खाने को मिलेगा, क्योंकि तुम यह कहकर यहोवा के सुनते हुए रोए हो कि हमें मांस खाने को कौन देगा, क्योंकि हम तो मिस्र ही में भले थे। इसलिए यहोवा तुमको मांस देगा और तुम खाओगे।

19तुम एक या दो दिन, या पांच या दस या बीस दिन ही नहीं,

20वरन् महीने भर खाते रहोगे, जब तक वह तुम्हारे नथनों से निकलने न लगे और तुम उससे घृणा न करने लगो, क्योंकि तुमने यहोवा का तिरस्कार किया है जो तुम्हारे मध्य में है और उसके सुनते हुए रो-रोकर यह कहा है कि हमने क्याें मिस्र देश को छोड़ दिया’?”

21पर मूसा ने कहा, “जिन लोगों के मध्य मैं रहता हूं उनमें छः लाख तो प्यादे ही हैं और फिर भी तूने कहा है कि मैं उन्हें इतना मांस दूंगा कि वे महीने भर खाते रहेंगे।

22क्या उनके लिए भेड़-बकरियों और गाय-बैलों के झुंड काटे जाएं कि उनके लिए पर्याप्त हो? अथवा समुद्र की सारी मछलियां उनके लिए इकट्ठी की जाएं कि उनके लिए पर्याप्त हों?”

23तब यहोवा ने मूसा से कहा, “क्या यहोवा का हाथ छोटा हो गया है? अब तू देखेगा कि जो मैंने तुझसे कहा है वह पूरा होता है या नही।”

24तब मूसा ने बाहर जाकर सब लोगों को यहोवा की बातें सुना दीं, और उसने प्रजा के प्राचीनों में से सत्तर पुरुषों को भी इकट्ठा किया और उन्हें तम्बू के चारों ओर खड़ा कर दिया।

25तब यहोवा बादल में होकर उतरा और उससे बोला, और उस आत्मा में से जो मूसा पर था कुछ लेकर उन सत्तर प्राचीनों पर डाल दिया, और ऐसा हुआ कि जब आत्मा उनमें समाया तब वे नबूवत करने लगे, पर बाद में उन्होंने फिर कभी नबूवत नहीं की।

26परन्तु दो पुरुष छावनी में ही रह गए थे। उनमें से एक का नाम एलदाद और दूसरे का मेदाद था और आत्मा उनमें भी समाया-ये तो उनमें से थे जिनके नाम लिख लिए गए थे परन्तु वे तम्बू के पास नहीं गए थे-और वे छावनी में ही नबूवत करने लगे।

27तब एक जवान ने मूसा के पास दौड़कर उसे बताया, “एलदाद और मेदाद छावनी में नबूवत कर रहे है।”

28तब नून के पुत्र यहोशू ने जो युवावस्था से मूसा का सेवक था, मूसा से कहा, “हे स्वामी मूसा, उन्हें रोक दे।”

29पर मूसा ने उससे कहा, “क्या तुझे मेरे कारण जलन होती है? अच्छा होता कि यहोवा की सारी प्रजा के लोग नबी होते और यहोवा अपना आत्मा उनमें डाल देता।”

30तब मूसा इस्राएल के प्राचीनों के साथ छावनी में लौट आया।

31अब यहोवा की ओर से एक बड़ी आंधी चली और समुद्र से बटेरें उड़ा लाई, और उन्हें छावनी के चारों ओर इधर-उधर एक दिन के मार्ग तक भूमि की सतह से लगभग दो हाथ की ऊंचाई तक छावनी पर गिरा दिया।

32और लोग उठे और दिन भर और रात भर और दूसरे दिन भी बटेरें बटोरते रहे। किसी ने दस होमेर से कम नहीं बटोरा और उन्होंने उन्हें छावनी के चारों ओर फैला दिया।

33और जब मांस उनके मुंह में ही था और वे उसे चबा भी न पाए थे, तभी यहोवा का क्रोध उन पर भड़क उठा और यहोवा ने उन्हें भयानक महामारी में मार डाला।

34और उस स्थान का नाम किब्रोथ-हत्तावा पड़ा, क्याेंकि जिन लोगों ने लालच किया था उनको वहां मिट्टी दी गई।

35किब्रोथ-हत्तावा से प्रजा कूच करके हंसेरोत की ओर चली और हंसेरोत में ठहर गई।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)