पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 10 / 31
नीतिवचन 10
1सुलैमान के नीतिवचन। बुद्धिमान पुत्र अपने पिता को प्रसन्न करता है, परन्तु मूर्ख पुत्र अपनी माता के दुख का कारण बनता है।
2दुष्टता से प्राप्त किए गए धन से लाभ नहीं होता, परन्तु धार्मिकता मृत्यु से छुड़ाती है।
3धर्मियों को यहोवा भूखा नहीं रहने देगा, परन्तु वह दुष्टों की लालसाओं पर पानी फेर देगा।
4जिसके हाथ ढिलाई से काम करते हैं, वह कंगाल हो जाता है, परन्तु परिश्रमी के हाथ उसे धनी बना देते है।
5जो ग्रीष्मकाल में बटोरता है, वही बुद्धिमान पुत्र है, पर जो पुत्र कटनी के समय सोता है, वह लज्जा का कार्य करता है।
6धर्मी के सिर पर आशीषें होती हैं, पर दुष्टों के मुंह पर हिंसा आच्छादित रहती है।
7धर्मी का स्मरण आशीषमय परन्तु दुष्टों का नाम दुर्गन्धमय होता है।
8जो मन से बुद्धिमान है, वह आज्ञाओं को मानेगा, परन्तु मूर्ख होंठों वाला पछाड़ खाएगा।
9खरी चाल चलने वाला सुरक्षित रहता है, परन्तु जो टेढ़ी चाल चलता है, उसका भेद खुल जाएगा।
10जो नैन से सैन करता है, वह दुख पहुँचाता है, और मूर्ख होंठों वाला तो पछाड़ खाएगा।
11धर्मी का मुंह तो जीवन का सोता है, पर दुष्टों के मुंह से हिंसा फूट पड़ती है।
12घृणा से झगड़े उत्पन्न होते हैं, परन्तु प्रेम सब अपराधों को ढांप देता है।
13समझदार के होंठों पर बुद्धि निवास करती है, परन्तु निर्बुद्धि की पीठ के लिए कोड़ा होता है।
14बुद्धिमान लोग ज्ञान संचित करते हैं, परन्तु मूर्ख के बोलने से विनाश निकट आता है।
15धनी मनुष्य का धन उसका दृढ़ गढ़ है; कंगालों के विनाश का कारण उनकी दरिद्रता है।
16धर्मी की मजदूरी जीवनदायक है, परन्तु दुष्टों की कमाई दण्ड का कारण है।
17जो शिक्षा पर ध्यान देता है, वह जीवन के पथ पर है, परन्तु जो ताड़ना की उपेक्षा करता है, वह भटक जाता है।
18जो घृणा को छिपाए रखता है, वह झूठा, और जो निन्दा फैलाता है वह मूर्ख है।
19जहाँ बहुत बातें होती हैं, वहीं अपराध भी अवश्य होता है, पर जो अपने होंठों पर लगाम लगाता है, वह बुद्धिमान है।
20धर्मी की जीभ सर्वोत्तम चांदी के समान है, परन्तु दुष्ट के मन का कोई मूल्य नही।
21धर्मी के होंठों से बहुतों का भला होता है। परन्तु मूर्ख लोग निर्बुद्धि होने के कारण मर जाते है।
22यहोवा की आशीष ही से धन मिलता है, और वह उसके साथ दुख नहीं मिलाता।
23दुष्टता करना तो मूर्ख के लिए खेल है, परन्तु समझदार का आनन्द बुद्धि में है।
24दुष्ट जिस बात से डरता है वही उस पर आ पड़ेगी, और धर्मी की मनोकामना पूरी की जाएगी।
25बवंडर के निकलते ही, दुष्ट उड़ जाता है, परन्तु धर्मी की नींव सदा स्थिर रहती है।
26जैसे दांतों को सिरका और आँखों को धुआँ, वैसे ही आलसी अपने भेजने वालों के लिए होता है।
27यहोवा का भय आयु को बढ़ाता है, परन्तु दुष्टों के वर्ष कम किए जाएंगे।
28आशा पूर्ण होने पर धर्मी को आनन्द होता है, परन्तु दुष्टों की आशा मिट जाती है।
29खरे मनुष्य के लिए यहोवा का मार्ग दृढ़ गढ़ है, परन्तु अनर्थकारियों के लिए वह विनाश है।
30धर्मी सदा अटल बना रहेगा, परन्तु दुष्ट, पृथ्वी पर बसने न पाएंगे।
31धर्मी के मुंह से बुद्धि प्रवाहित होती है, परन्तु कुटिल जीभ काट डाली जाएगी।
32धर्मी के होंठों से ग्रहणयोग्य बातें, परन्तु दुष्ट के मुंह से कुटिल बातें निकलती है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)