पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 9 / 31
नीतिवचन 9
1बुद्धि ने अपना घर बनाया है; उसने अपने सातों खम्भे गढ़कर तैयार किए हैं;
2उसने अपने पशु वध करके भोजन तैयार किया है, और अपने दाख-मधु में मसाले मिलाए। उसने अपनी मेज भी लगा ली है;
3उसने अपनी सहेलियों को निमन्त्रण देने भेज दिया है, वह नगर के उच्च स्थानों की चोटी-चोटी पर से पुकारती हैः
4“जो भी भोला-भाला है, वह मुड़कर यहां आए!” जो नासमझ है, उससे वह कहती है,
5“आओ, मेरे भोजन में से खाओ, मसाला मिलाए हुए मेरे दाख-मधु में से पीयो।
6अपनी मूढ़ता छोड़कर जीवित रहो, और समझ के मार्ग में आगे बढ़ो।”
7जो कोई उपहास करने वाले को शिक्षा देता है, वह अपमानित होता है, और जो दुष्ट जन को डाँटता है, वह कलंकित होता है।
8उपहास करने वाले को मत डाँट, ऐसा न हो कि वह तुझसे बैर करने लगे; बुद्धिमान को डाँट तो वह तुझसे प्रेम रखेगा।
9बुद्धिमान को शिक्षा दे और वह अधिक बुद्धिमान होगा, धर्मी को सिखा तो वह अपनी विघा बढ़ाएगा।
10यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र को जानना ही समझ है।
11क्योंकि मेरे द्वारा तेरी आयु बढ़ेगी, वरन् तेरे जीवन के वर्ष अधिक होंगे।
12यदि तू बुद्धिमान हो, तो बुद्धि ही तेरा प्रतिफल होगी, और यदि तू उपहास करे, तो अकेला तू ही भोगेगा।
13मूर्खता, हल्ला मचाने वाली स्त्री है, वह तो भोली है और कुछ नहीं जानती।
14वह अपने घर की ड्योढ़ी पर, नगर के ऊंचे स्थानों में अपने आसन पर बैठ जाती है,
15और वह पथिकों से अर्थात् अपने-अपने मार्ग पर सीधे जाने वालों से पुकार-पुकार कर कहती है,
16“जो कोई भोला है वह मुड़कर यहां आए,” और नासमझ से वह कहती है,
17“चोरी का पानी मीठा होता है, और लुक-छिप कर खाई जाने वाली रोटी अच्छी लगती है।”
18वह यह नहीं जानता कि वहां मृतकों का वास है, और ऐसी स्त्री के अतिथि अधोलोक की गहराइयों में पड़े है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)