पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 8 / 31
नीतिवचन 8
1क्या बुद्धि नहीं पुकारती, और समझ ऊंची आवाज नहीं देती?
2वह तो मार्ग के किनारे, ऊंचे स्थानों की चोटियों पर, जहां सड़कें मिलती हैं, वह खड़ी होती है।
3फाटकों के पास, नगर के प्रवेश-द्वार पर, अर्थात् दरवाजों पर वह ऊंचे स्वर से कहती हैः
4“हे लोगो, मैं तुम्हें पुकारती हूँ, और मेरी वाणी सब मनुष्यों के लिए है।
5हे भोले लोगो, चतुराई सीखो। हे मूर्खांे, बुद्धि को पहचानो।
6सुनो, क्योंकि मैं उत्तम बातें कहूँगी। मेरे होंठों के खुलने से सीधी बातें निकलेंगी।
7क्योंकि मेरा मुंह सच्चाई की ही बातें करेगा। दुष्टता की बातें मेरे होंठों के लिए घृणित है।
8मेरे मुंह के सारे वचन धर्ममय होते हैं, उनमें कोई टेढ़ी या उलट-फेर की बातें नहीं है।
9समझदार के लिए वे सब खरी हैं, ज्ञान प्राप्त करने वालों के लिए ठीक है।
10चांदी नहीं, पर मेरी शिक्षा को ग्रहण कर, उत्तम सोने की अपेक्षा ज्ञान को प्राप्त कर।
11क्योंकि बुद्धि रत्नों से भी उत्तम है। उसकी तुलना किसी भी मनभावनी वस्तु से नहीं की जा सकती।
12मैं बुद्धि हूँ, चतुराई में वास करती हूँ। ज्ञान और विवेक मेरे है।
13यहोवा का भय मानना, बुराई से बैर रखना है। घमंड, अहंकार तथा बुरी बात और कुटिल बातों से मुझे घृणा है।
14सम्मति और खरी बुद्धि मेरी ही है। मैं समझ हूँ, और सामर्थ्य भी मेरा है।
15मेरे द्वारा राजा राज्य करते हैं, और अधिकारी न्याय चुकाते है।
16मेरे ही द्वारा शासक और उच्चाधिकारी शासन करते हैं, अर्थात् सब जो ठीक-ठीक न्याय चुकाते है।
17जो मुझसे प्रेम रखते हैं उनसे मैं भी प्रेम रखती हूँ। जो मुझे यत्न से ढूंढें़गे, वे मुझे पाएंगे।
18धन और सम्मान मेरे पास हैं, अर्थात् स्थायी धन और धार्मिकता।
19मेरा फल सोने से, हां, चोखे सोने से, और मेरी उपज उत्तम चांदी से बढ़कर है।
20मैं धार्मिकता के मार्ग पर, अर्थात् न्याय की राहों के मध्य चलती हूँ,
21कि उन्हें जो मुझसे प्रेम करते हैं धन प्रदान करूं तथा उनके भंडारों को भर दूँ।
22यहोवा ने मुझे अपने कार्य के आरम्भ में वरन् अपने प्राचीन काल के कार्यों से भी पहले उत्पन्न किया।
23मैं तो सनातन से अर्थात् आदि से वरन् पृथ्वी के आरम्भिक काल से ठहराई गई हूँ।
24जब न तो गहरे सागर थे, न जल से भरे सोते थे, तब ही मैं उत्पन्न हुई।
25पर्वत और पहाड़ियों के स्थिर किए जाने से पूर्व, मैं उत्पन्न की गई,
26जब उसने पृथ्वी और मैदानों को नहीं बनाया था, न ही जगत की धूल के प्रथम कण बनाए गए थे।
27जब उसने आकाश को स्थिर किया, तब मैं वहां थी। जब उसने गहरे सागर के ऊपर आकाशमंडल ताना,
28जब उसने ऊपर के आकाशमंडल को स्थिर किया, और गहरे सागर के सोते निर्धारित किए,
29जब उसने समुद्र की सीमा बांधी, कि जल उसकी आज्ञा का उल्लंघन न करने पाए, जब उसने पृथ्वी की नींव के चिह्न लगाए,
30तब मैं एक कुशल कारीगर जैसी उसके साथ थी। प्रतिदिन मैं मग्न रहती, और सदा उसके सम्मुख आनन्द मनाती थी।
31मैं इस जगत् से अर्थात् उसकी पृथ्वी से प्रसन्न थी, तथा मेरा आनन्द मानवजाति में था।
32अतः हे पुत्रे, मेरी सुनो, क्या ही धन्य हैं वे जो मेरे मार्गों पर चलते है।
33शिक्षा पर ध्यान देकर बुद्धिमान बनो, और उसके विषय में लापरवाही न करो।
34धन्य है वह पुरुष जो मेरी सुनता है- मेरे फाटकों पर प्रतिदिन दृष्टि लगाए रहता है, वरन् मेरी ड्योढ़ी पर प्रतीक्षा करता है।
35क्योंकि जो मुझे पाता है, वह जीवन पाता है, और यहोवा का अनुग्रह प्राप्त करता है।
36परन्तु जो मुझे पाने से चूक जाता है, वह अपनी ही हानि करता है। जितने लोग मुझसे बैर रखते हैं, वे मृत्यु से प्रेम रखते है।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)