पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 7 / 31
नीतिवचन 7
1हे मेरे पुत्र, मेरी बातों को माना कर, और मेरी आज्ञाओं को अपने हृदय में रख ले।
2मेरी आज्ञाओं को मान कर जीवित रह, और मेरी शिक्षा को अपनी आंख की पुतली के सदृश जान।
3उन्हें अपनी उंगलियों पर बांध, अपने हृदय-पटल पर उन्हें लिख ले।
4बुद्धि से कह, “तू मेरी बहन है,” और समझ को अपना घनिष्ठ मित्र बना
5कि वे तुझे व्यभिचारिणी से बचाएं, अर्थात् उस पराई स्त्री से जो चिकनी-चुपड़ी बातें करती है।
6मैंने एक दिन अपने घर की खिड़की से अर्थात् झरोखे से बाहर झांका,
7तो मैंने भोले-भाले लोगों के बीच, अर्थात् युवकों के मध्य, एक नासमझ नवयुवक को देखा।
8वह उस स्त्री के घर के पास वाली गली में से होकर चला। उसने उसके घर का मार्ग लिया।
9संध्या समय, धूमिल प्रकाश था, मध्य-रात्रि के समय, घोर अंधकार था।
10और देखो, एक स्त्री उससे मिली। उसकी वेषभूषा वेश्या की सी थी और वह धूर्त हृदय की थी।
11वह बकवादी और चंचल थी। उसके पांव घर में नहीं टिकते थे,
12वह कभी गली में, तो कभी चौक में पाई जाती थी। वह हर मोड़ पर शिकार के लिए घात लगाती थी।
13तब उसने उस युवक को पकड़कर चूमा, और निर्लज्जता से मुंह बना कर बोलीः
14“मुझे मेल-बलि चढ़ाना था, मैंने आज ही अपनी मन्नतें पूरी की है।
15इसलिए मैं तुझसे भेंट करने को निकली, मैं तुझे बड़ी लगन से ढूँढ़ रही थी, और तू मुझे मिल गया है।
16मैंने अपने बिछौने को चादर से, अर्थात् मिस्र की रंग-बिरंगी मलमल से सजा रखा है।
17गंधरस, अगर और दालचीनी से मैंने अपनी शैय्या को सुगन्धित किया है।
18आ, हम भोर तक प्रेम के नशे में चूर रहें, आलिंगन-बद्ध होकर हम जी बहलाए।
19मेरा पति घर में नहीं है, वह लम्बी यात्रा पर निकल गया है।
20वह अपने साथ थैली भर रुपया ले गया है, और पूर्णिमा के दिन, घर लौटेगा।”
21लुभावनी बातें कह-कहकर, उसने उसे मोह लिया; और अपने होंठों की चिकनी-चुपड़ी बातों से उसको अपने वश में कर लिया।
22वह तुरन्त उसके पीछे चल दिया, जैसे कि बैल वध के लिए, या बेड़ी पहने हुए कोई मूर्ख सजा पाने को जाता है।
23अन्त में उस युवक का कलेजा तीर से बेधा जाएगा। वह ऐसे पक्षी के समान है जो वेग से जाल की ओर जाता है और नहीं जानता कि उसे अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा।
24अतः मेरे पुत्रे, अब मेरी सुनो, और मेरे मुंह की बातों पर ध्यान दो।
25तेरा हृदय ऐसी स्त्री के मार्गों की ओर न फिरे, तू उसकी गलियों में भूलकर भी न जाना।
26क्याेंकि उसने कितनों को शिकार करके मार गिराया है, और उसके मारे हुए बहुत है।
27उसका घर अधोलोक का मार्ग है, वह मृत्यु की कोठरी तक पहुँचता है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)