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पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 6 / 31

नीतिवचन 6

1हे मेरे पुत्र, यदि तूने अपने पड़ोसी के लिए जमानत दी हो, अथवा तू किसी परदेशी के लिए वचनबद्ध हुआ हो,

2यदि तू अपने ही मुंह की बातों के जाल में फंस गया हो, और अपने ही मुँह के वचन से पकड़ा गया हो,

3तो हे मेरे पुत्र, तू ऐसा कर कि अपने आपको बचा लेः क्योंकि तू अपने पड़ोसी के हाथ में पड़ गया है, इसलिए आ और दीन-हीन होकर अपने पड़ोसी को मना ले।

4तू न तो अपनी आंखों में नींद और न अपनी पलकों में झपकी आने दे।

5तू अपने आपको हरिणी के समान शिकारी के हाथ से तथा पक्षी के समान बहेलिए के हाथ से बचा ले।

6हे आलसी, चींटी के पास जा। उसके कार्यों को ध्यान से देख और बुद्धिमान बन।

7उसका न तो कोई न्यायी, न अधिकारी, और न ही कोई शासक होता है।

8पर वह ग्रीष्मकाल में अपने भोजन का प्रबन्ध करती है, और कटनी के समय भोजन-सामग्री एकत्रित करती है।

9हे आलसी, तू कब तक लेटा रहेगा? तू अपनी नींद से कब जागेगा?

10और थोड़ी-सी नींद, एक और झपकी, हाथ पर हाथ रखे थोड़ा और लेटे रहना,

11तब तेरी दरिद्रता राह के लुटेरे के समान और तेरी गरीबी शस्त्रधारी की भाँति तुझ पर आ पड़ेगी।

12निकम्मा और दुष्ट मनुष्य वह है जो टेढ़ी-मेढ़ी बातें बोलता फिरता है,

13वह नैन से सैन करता है, वह अपने पैरों से संकेत तथा उगंलियों से इशारे करता है,

14वह अपने कुटिल हृदय में निरन्तर बुरी युक्तियां सोचता है, तथा झगड़े-रगड़े फैलाता है।

15इसलिए उस पर अचानक विपत्ति आ पड़ेगी। वह क्षण भर में ऐसा नष्ट हो जाएगा कि बचने का कोई उपाय नहीं रहेगा।

16छः बातें हैं जिनसे यहोवा बैर रखता है। वरन् सात हैं जिनसे उसे घृणा हैः

17घमंड से चढ़ी हुई आंखें, झूठ बोलने वाली जीभ, निर्दोष का लहू बहाने वाले हाथ,

18बुरी युक्ति गढ़ने वाला मन, बुराई के लिए शीघ्रता से दौड़ने वाले पैर,

19झूठ बोलने वाला साक्षी, और भाइयों में झगड़े फैलाने वाला मनुष्य।

20हे मेरे पुत्र, अपने पिता की आज्ञा का पालन कर, और अपनी माता की शिक्षा को न तज।

21उनको अपने हृदय में निरन्तर बांधे रह, और उन्हें अपने गले का हार बना ले।

22जब तू चलेगा तो वे तेरा मार्ग-दर्शन करेंगी, जब तू सोएगा तो वे तेरी रक्षा करेंगी, और जागते समय तुझसे बातें करेंगी।

23क्योंकि आज्ञा तो दीपक, और शिक्षा ज्योति है, और शिक्षा के लिए ताड़ना जीवन का मार्ग है।

24इनसे तू बुरी स्त्री अर्थात् व्यभिचारिणी की चिकनी-चुपड़ी बातों से बचेगा।

25अपने हृदय में उसके सौंदर्य की अभिलाषा न कर, और वह अपने कटाक्ष से तुझे फंसाने न पाए।

26वेश्या के कारण मनुष्य का मूल्य तो रोटी के टुकड़े के बराबर ही रह जाता है, और व्यभिचारिणी एक बहुमूल्य जीवन का शिकार कर लेती है।

27क्या ऐसा हो सकता है कि कोई अपनी छाती पर आग रखे और उसके कपड़े न जलें?

28या कोई मनुष्य अंगारों पर चले और उसके पैर न झुलसें?

29ऐसा ही है वह मनुष्य जो अपने पड़ोसी की पत्नी के पास जाता है। जो कोई उस स्त्री को छुएगा, वह दण्ड से बच न पाएगा।

30चोर यदि भूख मिटाने के लिए चोरी करे, तो लोग उसे तुच्छ नहीं जानते।

31यदि वह पकड़ा जाए, तो उसे सात गुना भरना पड़ेगा, उसे अपने घर का सब कुछ देना पड़ेगा।

32परन्तु जो परस्त्रीगमन करता है, वह निरा मूर्ख है। जो अपना विनाश चाहता है, वही ऐसा करता है।

33उसे घायल और अपमानित होना पड़ेगा, और उसका कलंक कभी नहीं मिटेगा।

34क्योंकि जलन मनुष्य के क्रोध को भड़काती है, और बदला लेने के दिन वह तुझे नहीं छोड़ेगा।

35वह किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति ग्रहण न करेगा, और चाहे तू उसे बहुत कुछ दे, फिर भी वह सन्तुष्ट न होगा।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)