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पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 23 / 31

नीतिवचन 23

1जब तू किसी शासक के साथ भोजन करने बैठे, तो ध्यानपूर्वक विचार कर कि तेरे सामने क्या है,

2और यदि तू अधिक खाने वाला है तो अपने मुँह पर अंकुश लगा।

3उसके नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजन की लालसा न करना, क्योंकि वह धोखे का भोजन है।

4धनवान बनने के लिए खून-पसीना न बहा, इस पर अधिक ध्यान देना छोड़ दे।

5जब तू उस पर दृष्टि डाले तो क्या वह लुप्त न हो जाएगा? क्योंकि धन तो निश्चय ही पंख लगाकर उकाब पक्षी के समान आकाश की ओर उड़ जाता है।

6जो कुढ़ कर देखता है उसकी रोटी न खाना, न उसके नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजन की लालसा करना,

7क्योंकि वह ऐसा मनुष्य है जो मन में हिसाब लगाता रहता है। वह तुझसे कहता तो है, “खा और पी!” पर उसका हृदय तुझसे लगा नही।

8जो कौर तूने खाया है उसे भी तुझे उगलना पड़ेगा, और तेरी मधुर बातें व्यर्थ ठहरेंगी।

9मूर्ख से कुछ न बोलना, क्योंकि वह तेरी बुद्धि की बाताें को तुच्छ जानेगा।

10प्राचीन सीमा को न सरकाना, और न अनाथों के खेतों पर वफ़ब्ज़ा करना।

11क्योंकि उनका छुड़ाने वाला तो सामर्थी है; वही उनका मुकदमा तुम्हारे विरुद्ध लड़ेगा।

12अपना हृदय शिक्षा पर, और अपने कान ज्ञान की बातों पर लगा।

13बच्चे को ताड़ना देने से न रुकना। यदि तू उसे छड़ी से पीटे तो वह मर नहीं जाएगा।

14तू उसे छड़ी से पीटकर उसका प्राण अधोलोक से बचा लेगा।

15हे मेरे पुत्र, यदि तेरा हृदय बुद्धि से पूर्ण हो तो इससे मेरा हृदय भी मग्न होगा;

16जब तेरे होंठ वे ही बातें बोलें जो सही हैं तो मेरी अन्तरात्मा हर्षित होगी।

17पापियों के प्रति तेरा हृदय न कुढ़ने पाए, परन्तु यहोवा के भय में सदैव बने रहना।

18निःसन्देह एक भविष्य तो है, और तेरी आशा न टूटेगी।

19हे मेरे पुत्र, मेरी सुन कर बुद्धिमान बन जा, और अपने हृदय को सुमार्ग पर लगा।

20तू पियक्कड़ों के साथ मत रहना और न अत्यधिक मांस खाने वालों के साथ संगति करना,

21क्योंकि पियक्कड़ और पेटू तो कंगाल हो जाएंगे, और उनकी खुमारी उनको चिथड़े पहनाएगी।

22अपने पिता की जिसने तुझे उत्पन्न किया, सुनना, और अपनी मां के बूढ़ी हो जाने पर भी उसे तुच्छ न जानना।

23सच्चाई को मोल ले और उसे मत बेच, बुद्धि, शिक्षा, और समझ को प्राप्त कर।

24धर्मी का पिता अति आनन्दित होगा, और जो बुद्धिमान पुत्र को जन्म देता है, वह उसके कारण मग्न होगा।

25तेरे माता-पिता तेरे कारण प्रसन्न हों, और तेरी जननी हर्षित हो।

26हे मेरे पुत्र, अपना मन मुझ पर लगा, और तेरी दृष्टि मेरे चाल-चलन पर लगी रहे।

27क्योंकि वेश्या तो एक गहरे गड्हे के समान, और व्यभिचारिणी स्त्री एक सकरे कुएं के समान है।

28वह लुटेरे के समान घात लगाकर बैठती है, और मनुष्यों में विश्वासघातियों की संख्या बढ़ाती है।

29विपत्ति में कौन है? कौन दुख में पड़ा है? झगड़ों में कौन है? शिकायतें किसकी हैं? किसके अकारण घाव हैं? किसकी आंखें लाल रहती हैं?

30वे ही जो देर तक शराब पीते हैं, और मसाला मिली हुई मदिरा की खोज में रहते है।

31शराब जब लाल दिखाई देती है, जब वह प्याले में लुभावनी लगती है, जब वह धार के साथ उंडेली जाती है, तब उस पर दृष्टि न करना।

32अन्त में वह सर्प के समान डसती और करैत के समान काटती है।

33तेरी आंखें विचित्र बातें देखेंगी और तेरे मुंह से उल्टी-सीधी बातें निकलेंगी।

34और तू उस मनुष्य के समान होगा जो समुद्र के मध्य पड़ा हो, या उसके समान जो मस्तूल के सिरे पर लेटा हो।

35तू कहेगा, “उन्होंने मारा, पर मुझे चोट न लगी। उन्होंने पीटा, पर मुझे महसूस तक न हुआ। मैं कब होश में आऊँगा कि फिर से पीऊँ?”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)