पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 24 / 31
नीतिवचन 24
1दुष्ट लोगों के प्रति डाह न करना, और न उनकी संगति की इच्छा करना।
2क्योंकि उनके मन हिंसा की योजना बनाया करते हैं, और उनके होंठ शरारत की बातें बोलते है।
3बुद्धि से घर बनाया जाता है और समझ से वह स्थिर होता है,
4तथा ज्ञान के द्वारा कमरे सब मनभावनी वस्तुओं से भर जाते है।
5बुद्धिमान मनुष्य बलवान होता है और ज्ञानी मनुष्य शक्ति पर शक्ति बढ़ाता है।
6क्योंकि बुद्धि की सलाह से युद्ध लड़ा जाता है, और सलाहकारों की अधिकाई से विजय प्राप्त होती है।
7बुद्धि तो मूर्ख की पहुंच से परे है, वह सभा में अपना मुंह नहीं खोलता।
8जो बुराई करने की युक्ति करता है उसे लोग षड्यंत्रकारी कहेंगे।
9मूर्खता की योजना बनाना पाप है, और हँसी ठट्ठा करने वाले से लोग घृणा करते है।
10यदि तू विपत्ति के दिन साहस छोड़ दे, तो तेरा सामर्थ्य बहुत कम है।
11जो लोग मार डाले जाने के लिए घसीटे जा रहे हैं, उन्हें छुड़ा, जो घात होने को लड़खड़ाते हुए चले जा रहे हैं, उन्हें रोक!
12यदि तू कहे, “देख, हम तो यह जानते न थे,” क्या वह जो हृदयों को तौलता है ध्यान नहीं देता? क्या वह जो तेरे प्राण की रक्षा करता है, यह नहीं जानता? क्या वह मनुष्य को उसके कार्यों के अनुसार प्रतिफल न देगा?
13हे मेरे पुत्र, तू शहद खा, क्योंकि यह अच्छा है हां, छत्ते का शहद, क्योंकि वह तूझे मीठा लगेगा।
14जान ले कि बुद्धि भी तेरे प्राण के लिए ऐसी ही हैः यदि तू उसे पा जाए तो तेरा भविष्य अच्छा होगा और तेरी आशा न टूटेेगी।
15हे दुष्ट, तू धर्मी के निवासस्थान के विरुद्ध घात लगाकर न बैठ, उसके विश्राम-स्थान को न उजाड़;
16क्योंकि धर्मी चाहे सात बार गिरे, फिर भी उठ खड़ा होगा; परन्तु दुष्ट लोग विपत्ति के समय ठोकर खाकर गिर पड़ते है।
17जब तेरा शत्रु गिरे तो आनन्दित न होना, और जब वह ठोकर खाए तो तेरा हृदय प्रसन्न न हो,
18ऐसा न हो कि यहोवा इसे देख कर अप्रसन्न हो, और अपना क्रोध उस पर से हटा ले।
19कुकर्मियों के कारण मत कुढ़, और न दुष्टों के प्रति डाह कर;
20क्योंकि दुष्ट मनुष्य के लिए कोई भविष्य नहीं; दुष्ट का दीपक बुझा दिया जाएगा।
21हे मेरे पुत्र, यहोवा और राजा दोनों का भय मानना; जो विद्रोह करना चाहते हैं, तू उनका साथी न होना,
22क्योंकि उन पर दोनों की ओर से अचानक विपत्ति आ पड़ेगी, और उनके द्वारा जो विनाश आ पड़ेगा उसे कौन जानता है?
23बुद्धिमानों के वचन ये भी हैं: न्याय में पक्षपात करना बिल्कुल अनुचित है।
24जो दोषी से कहता है, “तू निर्दोष है,” उसे हर समाज के लोग शाप देंगे, और जाति-जाति के लोग उसे घृणित समझेंगे,
25परन्तु वे जो दोषी को उचित दण्ड देंगे, वे हर्षित होंगे, और उन पर बड़ी आशीष होगी।
26जो सही उत्तर देता है, वह मानों होंठों को चूमता है।
27अपना बाहर का काम-काज पहले ठीक कर लेना, और खेत का काम संभाल लेना; उसके बाद अपना घर बनाना।
28अकारण अपने पड़ोसी के विरुद्ध साक्षी न देना, और अपने होंठों से छल न करना।
29ऐसा मत कह कि जैसा उसने मेरे साथ किया, वैसा ही मैं भी उसके साथ करूंगा, मैं उसे उसके काम के अनुसार बदला दूँगा।
30मैं आलसी मनुष्य के खेत, अर्थात् निर्बुद्धि मनुष्य की दाख की बारी के पास से होकर निकला;
31तो देखो, वह कँटीली झाड़ियों से भरी पड़ी है; बिच्छू-पौधों से ढँक गई है, और उसकी पत्थर की दीवार टूटकर गिर पड़ी है।
32जब मैंने यह देखा तो इस पर सोच-विचार किया, हां, मैंने देख कर शिक्षा प्राप्त कीः
33थोड़ी और नींद, एक और झपकी, हाथ पर हाथ रख कर थोड़ा और लेटे रहना
34तब तेरी दरिद्रता लुटेरे के समान, और तेरी घटी हथियारबन्द मनुष्य के समान आ पड़ेगी।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)