पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 26 / 31
नीतिवचन 26
1जैसे ग्रीष्मकाल में हिम का और कटनी के समय वर्षा का पड़ना, वैसे ही मूर्ख का सम्मानित होना जँचता नही।
2जैसे गौरैया फुदकती फिरती और अबाबील उड़ते-उड़ते नहीं बैठती, वैसे ही अकारण दिया गया शाप भी नहीं ठहरता।
3घोड़े के लिए चाबुक, गधे के लिए लगाम, और मूर्खों की पीठ के लिए छड़ी है।
4मूर्ख को उसकी मूर्खता जैसा उत्तर न दे, कहीं ऐसा न हो कि तू भी उसके समान हो जाए।
5मूर्ख को उसकी मूर्खता के अनुसार ही उत्तर दे, ऐसा न हो कि वह अपनी दृष्टि में बुद्धिमान ठहरे।
6जो मूर्ख के हाथ से सन्देश भेजता है, वह अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारता और हानि मोल लेता है।
7जैसे लंगड़े के लटकते पैर, वैसे ही मूर्खों के मुंह में नीतिवचन व्यर्थ है।
8जैसे गोफन में पत्थर बांधना, वैसे ही मूर्ख को सम्मान देना है।
9जैसे कँटीली झाड़ी शराबी के हाथ में, वैसे ही नीतिवचन मूर्खों के मुंह मे।
10जैसे वह धनुर्धारी जो हर एक को घायल करता है, वैसा ही वह मनुष्य है जो मूर्खों और राहगीरों को मजदूरी पर लगाता है।
11जैसे कुत्ता अपनी छांट को फिर चाटता है, वैसे ही मूर्ख अपनी मूर्खता को दोहराता है।
12क्या तू ऐसे मनुष्य को देखता है जो अपनी ही दृष्टि में बुद्धिमान है? उससे बढ़कर आशा तो मूर्ख ही से है।
13आलसी कहता है, “मार्ग में शेर है! चौक में शेर है!”
14जिस प्रकार दरवाजा अपनी चूलों पर घूमता है उस प्रकार आलसी अपने बिस्तर पर।
15आलसी भोजन की थाली में हाथ झटके से डालता तो है पर उसे फिर मुंह तक लाने में थक जाता है।
16उन सात मनुष्यों से जो सही-सही उत्तर दे सकते हैं, आलसी तो अपने को अधिक बुद्धिमान समझता है।
17जो मार्ग पर चलते-चलते पराए झगड़े में हाथ डालता है, वह उसके समान है जो कुत्ते को कान से पकड़ता है।
18जैसे एक पागल जो जलती लकड़ियां तथा घातक तीर फेंकता है,
19वैसे ही वह मनुष्य है जो अपने पड़ोसी को ठगता है और कहता है, “अरे, मैं तो मजाक कर रहा था।”
20लकड़ी न रहने से आग बुझ जाती है, और जहां कानाफूसी करने वाला नहीं, वहां झगड़ा शान्त हो जाता है।
21जैसे अंगारों पर कोयला और आग पर लकड़ी होती है, वैसे ही झगड़ालू मनुष्य झगड़ा उत्पन्न करने के लिए होता है।
22कानाफूसी करने वाले की बातें स्वादिष्ट कौर के समान होती है। वे देह के भीतरी भागों में घुस जाती है।
23जैसे मिट्टी के बर्तन पर चांदी की कलई चढ़ी होती है, वैसे ही दुष्ट मन वाले के प्रेम भरे वचन होते है।
24बैरी अपने होंठों से बैर को छिपा लेता है, पर अपने हृदय में छल को दबाए रखता है।
25जब वह मीठी-मीठी बातें करे, तो उसका विश्वास न कर, क्योंकि उसके हृदय में सात घिनौनी बातें है।
26चाहे उसका बैर छल से छिप भी जाए, फिर भी उसकी दुष्टता सभा के सामने प्रकट हो जाएगी।
27जो गड़हा खोदता है वह स्वयं उसमें गिरेगा, और लुढ़काया हुआ पत्थर लुढ़काने वाले पर आ पड़ेगा।
28झूठी जीभ उनसे बैर रखती है जिन्हें उसने घायल किया, और चापलूसी करने वाला मुंह विनाशकारी है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)