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पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 27 / 31

नीतिवचन 27

1कल के दिन के विषय में शेखी न मार, क्योंकि तू नहीं जानता कि दिन भर में क्या हो जाएगा।

2तेरी प्रशंसा दूसरों से हो, तेरे मुंह से नहीं, अपरिचित से हो, तेरे होंठों से नही।

3पत्थर तो भारी और बालू वजनदार होती है, परन्तु मूर्ख का क्रोध भड़कना इन दोनों से भी भारी होता है।

4प्रकोप तो भयानक और क्रोध बाढ़ के समान है, पर ईर्ष्या के सामने कौन खड़ा रह सकता है?

5खुली डांट, गुप्त प्रेम से उत्तम है।

6मित्र के हाथ से लगे घाव विश्वसनीय होते हैं, परन्तु शत्रु अधिक चुम्बन करता है।

7तृप्त होने पर मनुष्य शहद के छत्ते को भी ठुकरा देता है, परन्तु भूखे को कड़वी वस्तु भी मीठी लगती है।

8जैसे वह चिड़िया जो अपना घोंसला छोड़कर उड़ती-फिरती है, वैसे ही वह मनुष्य है जो अपना घर छोड़कर भटकता-फिरता है।

9जैसे तेल और इत्र हृदय को प्रसन्न करते हैं, वैसे ही मित्र की सम्मति मन को मधुर लगती है।

10अपने अथवा अपने पिता के मित्र को न त्याग, और अपने दुर्दिनों में अपने भाई के घर न जाना; दूर रहने वाले भाई की अपेक्षा पास का पड़ोसी उत्तम है।

11हे मेरे पुत्र, बुद्धिमान बन और मेरे हृदय को प्रसन्न कर कि मैं अपने निन्दा करने वालों को उत्तर दे सकू।

12विपत्ति को आते देख कर चतुर मनुष्य छिप जाता है, पर भोले-भाले लोग बढ़े चले जाते हैं और हानि उठाते है।

13जो किसी अजनबी का जामिन होता है उसका कपड़ा रख ले, और व्यभिचारिणी का जामिन होने वाले को बंधक कर के रख ले।

14जो बड़े भोर को ऊंचे शब्द से अपने मित्र को आशीर्वाद देता है, यह उसके लिए शाप गिना जाएगा।

15झड़ी के दिन पानी का लगातार टपकना तथा झगड़ालू स्त्री-दोनों एक समान हैं;

16जो उसे रोकता है वह हवा को रोकता है, और अपने दाहिने हाथ से तेल को पकड़ता है।

17जैसे लोहा, लोहे को तेज करता है, वैसे ही मनुष्य, मनुष्य को सुधारता है।

18जो अंजीर के पेड़ की देख-भाल करता है, वह उसका फल खाएगा; और जो अपने स्वामी की सेवा-टहल करता है, वह मान-सम्मान पाएगा।

19जैसे पानी चेहरे को, वैसे मनुष्य का हृदय मनुष्य को प्रतिबिम्बित करता है।

20जैसे अधोलोक और विनाश-लोक, वैसे ही मनुष्य की आंखें भी कभी तृप्त नहीं होती।

21जैसे चांदी को कुठाली से और सोने को भट्ठी से वैसे ही मनुष्य को उसकी प्रशंसा से परखा जाता है।

22चाहे तू मूर्ख को अनाज के साथ ओखली में मूसल से कूटे, फिर भी उसकी मूर्खता उससे न हटेगी।

23अपनी भेड़-बकरियों की दशा भली-भांति जान, और अपने झुंडों की देख-भाल कर;

24धन-दौलत तो सदा नहीं रहते, और न राज-मुकुट पीढ़ी से पीढ़ी तक बना रहता है।

25जब घास कट जाती है, नई उग आती है, और पहाड़ों से चारा इकट्ठा कर लिया जाता है,

26तब मेमने तेरे वस्त्र के लिए होंगे, और बकरियों से खेत का मूल्य चुकाया जाएगा।

27तेरे तथा तेरे घराने के खाने के लिए बकरियों का दूध भरपूर होगा, और तेरी दासियों का भी पालन-पोषण होगा।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)