पुराना नियम · नीतिवचन · अध्याय 30 / 31
नीतिवचन 30
1याके के पुत्र आगूर के वचन- एक प्रकाशन। यह पुरुष ईतीएल से अर्थात् ईतीएल और उक्काल से यह कहता हैः
2निश्चय ही मैं हर एक मनुष्य से अधिक बुद्धिहीन हूँ और मुझमें मनुष्य की सी समझ नही।
3न तो मैंने बुद्धि प्राप्त की है और न परमपवित्र का ज्ञान मुझे मिला है।
4कौन स्वर्ग में चढ़कर पुनः उतर आया है? किसने हवा को अपनी मुट्ठी में एकत्र कर रखा है? किसने समुद्र को अपने वस्त्र में बांध लिया है? किसने पृथ्वी के सिवानों को निर्धारित किया है- उसका अथवा उसके पुत्र का नाम क्या है? तू तो निश्चय जानता होगा!
5परमेश्वर का एक-एक वचन ताया हुआ हैः जो परमेश्वर की शरण लेते हैं उनके लिए वह ढाल है।
6तू उसके वचन में कुछ न जोड़ ऐसा न हो कि वह तुझे डाँटे और तू झूठा ठहरे।
7मैंने तुझसे दो बातों की याचना की है- मेरे मरने से पहले मुझे देने से मुंह न मोड़ः
8धोखा और झूठ दोनों को मुझसे दूर रख, मुझे न तो धन और न निर्धनता दे। प्रतिदिन की रोटी मुझे खिलाया कर
9कहीं ऐसा न हो कि मैं तृप्त होकर तेरा इनकार करके कहूँ, “यहोवा कौन है?” या मैं घटी में पड़कर चोरी करूं और अपने परमेश्वर का नाम कलंकित करू।
10किसी दास की उसके स्वामी से चुगली न करना ऐसा न हो कि वह तुझे धिक्कारे और तू दोषी पाया जाए।
11ऐसे भी हैं जो अपने पिता को शाप देते हैं और अपनी माता को धन्य नहीं कहते।
12ऐसे भी हैं जो अपनी दृष्टि में तो पवित्र हैं, फिर भी अपनी गंदगी से धोए नहीं गए है।
13ऐसे भी हैं-वाह, उनकी आंखें घमंड से कैसी भरी रहती हैं! उनकी भौंहें, घमंड से कैसी चढ़ी रहती हैं!
14ऐसे भी हैं जिनके दांत तलवार के समान और दाढ़ें छुरियों के समान हैं कि सताए हुओं को पृथ्वी पर से और कंगालों को मनुष्यों में से फाड़ खाए।
15जोंक की दो बेटियां हैं, जो ‘दे! दे!’ चिल्लाती है। तीन वस्तुएं कभी सन्तुष्ट नहीं होतीं, वरन् चार हैं जो कभी ‘बस’ नहीं कहतीं:
16अधोलोक, बांझ की कोख, भूमि जो जल से कभी सन्तुष्ट नहीं होती, और आग, जो कभी ‘बस’ नहीं कहती।
17जो आंख अपने पिता की हँसी उड़ाती है और माता का तिरस्कार करती है, उसे तराई के कौवे नोच-नोचकर निकाल देंगे और गिद्ध के बच्चे खा जाएंगे।
18तीन बातें मेरे लिए बहुत विचित्र हैं, वरन् चार हैं जो मेरी समझ से परे हैं:
19आकाश में चील की चाल, चट्टान पर सांप की चाल, बीच समुद्र में जहाज़ की चाल, और युवती के साथ युवक की चाल।
20व्यभिचारिणी की चाल तो यह हैः वह खाकर अपना मुंह पोंछती, और कहती है, “मैंने कोई गलत काम नहीं किया है।”
21तीन बातें हैं जिनसे धरती कांपती है, वरन् चार हैं जिन्हें वह सह नहीं सकतीः
22दास का राजा बन जाना, मूर्ख का पेट भरना,
23अप्रिय स्त्री का ब्याहा जाना, और दासी का अपनी स्वामिन का स्थान ले लेना।
24चार जीव पृथ्वी पर छोटे तो हैं पर वे अति बुद्धिमान हैं:
25चींटियां तो बलवान जाति की नहीं हैं पर वे ग्रीष्मकाल में अपना भोजन बटोरती है।
26बिज्जू तो शक्तिशाली जाति के नहीं होते, फिर भी वे अपना घर चट्टानों में बनाते है।
27टिड्डियों का कोई राजा नहीं होता, पर फिर भी वे दल बांधकर चलती है।
28छिपकली को हाथ से पकड़ा जा सकता है, फिर भी वह राजभवनों में रहती है।
29तीन ऐसे हैं जिनकी चाल राजसी होती है, वरन् चार हैं जो चलते समय शोभायमान दिखते हैं:
30सिंह, जो जानवरों में बलवान होता है और किसी के सामने से पीछे नहीं हटता,
31अकड़ कर चलता हुआ मुर्गा, तथा बकरा, और वह राजा जो अपनी सेना के साथ हो।
32यदि तू अपने आपको महान् बना कर मूर्ख ठहरा हो, या तूने कोई बुरी युक्ति की हो, तो अपने मुंह पर हाथ रख।
33जैसे दूध को मथने से मक्खन, और नाक को मरोड़ने से लहू निकलता है, वैसे ही क्रोध को भड़काने से झगड़ा उत्पन्न होता है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)