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पुराना नियम · भजन संहिता · अध्याय 11 / 150

भजन संहिता 11

1मैं यहोवा की शरण लेता हूं; तुम मेरे प्राण से कैसे कह सकते हो, “पक्षी के समान अपने पर्वत पर उड़ जा,

2क्योंकि देखो, दुष्ट धनुष झुकाते हैं, वे अपने तीर डोरी पर चढ़ाते हैं कि उन्हें सीधे मन वालों पर अँधियारे में चलाएं;

3यदि नींव ही नष्ट कर दी जाएं, तो धर्मी क्या कर सकता है?”

4यहोवा अपने पवित्र मन्दिर में है, यहोवा का सिंहासन स्वर्ग में है। उसकी आंखें मनुष्य की सन्तान को देखतीं, उसकी पलकें उनको परखती है।

5यहोवा तो धर्मी और दुष्ट, दोनों को परखता है, और जो उपद्रव से प्रीति रखता है, उससे वह जी से घृणा करता है।

6दुष्टों पर वह फंदे बरसाएगा; अग्नि, गंधक और प्रचंड लू ही उनके प्याले का भाग होगी।

7यहोवा तो धर्मी है, वह धार्मिकता से प्रीति रखता है; धर्मी जन उसका मुंह देखने पाएंगे।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)