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पुराना नियम · भजन संहिता · अध्याय 36 / 150

भजन संहिता 36

1दुष्ट जन का अपराध मेरे भीतर यह कहता है कि उसकी दृष्टि में परमेश्वर का कोई भय नही।

2क्योंकि वह अपने अधर्म के प्रकट होने और घृणित ठहरने के विषय अपने मन में चिकनी-चुपड़ी बातें विचारता है।

3उसके मुंह के वचन दुष्टता और छल हैं, उसने बुद्धिमानी और भलाई का काम करना छोड़ दिया है।

4वह अपने बिस्तर पर दुष्टता की योजना बनाता है, वह ऐसे मार्ग अपना लेता है जो भला नहीं, वह बुराई से घृणा नहीं करता।

5हे यहोवा, तेरी करुणा स्वर्ग तक, और तेरी सच्चाई आकाशमंडल तक फैली है।

6तेरी धार्मिकता ऊंचे पर्वतों के समान है, तेरे न्याय गहरे सागर के समान है। हे यहोवा, तू मनुष्य और पशु दोनाें की रक्षा करता है।

7हे परमेश्वर, तेरी करुणा कितनी अनमोल है! मनुष्य की सन्तान तेरे पंखों की छाया में शरण लेती है।

8तेरे भवन की भरपूरी से वे तृप्त होते हैं, और तू उन्हें अपने आनन्द की नदी में से पिलाता है।

9क्योंकि जीवन का सोता तो तेरे ही पास है; तेरे ही प्रकाश से हमें प्रकाश मिलता है।

10जो तुझे जानते हैं उन पर करुणा करता रह, और जो सीधे मन वाले हैं उन पर अपनी धार्मिकता बनाए रख।

11अहंकारी मुझ पर लात न उठाने, न दुष्ट का हाथ मुझे भगाने पाए।

12देख, दुराचारी कैसे गिर पड़े हैं- वे ऐसे पछाड़ दिए गए हैं कि उठ नहीं सकते।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)