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पुराना नियम · भजन संहिता · अध्याय 35 / 150

भजन संहिता 35

1दाऊद का भजन। हे यहोवा, जो मुझसे लड़ते हैं, तू ही उनके साथ लड़, जो मुझसे युद्ध करते हैं, तू ही उनसे युद्ध कर।

2ढाल और कवच लेकर मेरी सहायता करने को उठ खड़ा हो।

3भाले को तान ले और मेरा पीछा करने वालों के सामने आकर उनको रोक। मेरे प्राण से कह, “मैं तेरा उद्धार हू।”

4जो मेरे प्राण के ग्राहक हैं वे लज्जित और अपमानित हों! जो मेरे विरुद्ध दुष्टता की कल्पना करते हैं वे पीछे खदेड़े जाएं और लज्जित हों!

5वे हवा से उड़ जाने वाली भूसी के समान हों, जिन्हें यहोवा का दूत खदेड़ता जाए!

6उनका मार्ग अन्धे और फिसलन भरा हो, और यहोवा का दूत उनका पीछा करता जाए!

7क्योंकि उन्होंने अकारण मेरे लिए जाल बिछाया; बिना कारण उन्होंने मेरे प्राण के लिए गड़हा खोदा।

8उनमें से प्रत्येक पर अचानक विनाश आ पड़े, अपने बिछाए जाल में वह आप ही फँसे, उसी विनाश में वह स्वयं पड़े।

9मेरा प्राण यहोवा में आनन्दित होगा, और उसके उद्धार के कारण मग्न होगा।

10मेरी हड्डी-हड्डी कहेगी, “हे यहोवा, तेरे तुल्य कौन है, जो पीड़ित को, उस बलवान से जिसके सामने वह ठहर नहीं सकता, बचाता है, और दीन-दरिद्रों की लुटेरे से रक्षा करता है?”

11झूठे गवाह उठ खड़े होते हैं और जिन बातों को मैं नहीं जानता वे ही पूछते है।

12वे मेरी भलाई का बदला बुराई से देते हैं, यहां तक कि मेरे प्राण को शोकित करते है।

13परन्तु जब वे रोगी हुए, तो मैं शोक- वस्त्र पहने रहा; मैंने उपवास रखकर अपने आपको दीन किया और मेरी प्रार्थना मेरी ही गोद में लौटती रही।

14मैं ऐसा शोकित हुआ मानो भाई या मित्र के लिए, मैं शोक से ऐसे झुक गया जैसे कोई अपनी माता के लिए दुखी होता हो,

15जब मैं लड़खड़ाने लगा तो वे मजा लेकर इकट्ठे होने लगे; हमला करने वाले जिन्हें मैं जानता भी न था, मेरे विरुद्ध इकट्ठे हुए; वे लगातार मेरी निन्दा करते रहे।

16बड़े भोज के अधर्मी हँसोड़ों के समान वे मुझ पर दांत पीसते रहे।

17हे प्रभु, तू कब तक देखता रहेगा? इसके विनाशकारी कार्यों से मुझे छुड़ा ले, इन सिंहों से मेरे बहुमूल्य प्राण को बचा ले।

18मैं महासभा में तुझे धन्यवाद दूंगा, विशाल जनसमूह के मध्य मैं तेरी स्तुति करूंगा।

19जो झूठ-मूठ मेरे शत्रु बन गए उन्हें मुझ पर हँसने न दे, जो अकारण मुझसे घृणा करते हैं उन्हें द्वेष से घूरने न दे।

20क्योंकि वे मेल की बातें नहीं करते, परन्तु जो देश में शान्ति से रहते हैं उनके विरुद्ध छल की कल्पनाएं करते है।

21उन्होंने मेरे विरुद्ध मुंह फाड़ा; उन्होंने कहा, “अहा, अहा, हमने अपनी आंखों से देखा है!”

22हे यहोवा, तूने तो देखा है-चुप न रह। हे प्रभु, मुझसे दूर न रह।

23जाग, मेरे न्याय के लिए उठ! हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे प्रभु, मेरी ओर से मुकदमा लड़।

24हे मेरे परमेश्वर यहोवा, अपनी धार्मिकता के अनुसार मेरा न्याय चुका, और उनको मुझ पर हँसने न दे।

25वे अपने मन में कहने न पाएं, “अहा, हमारी इच्छा पूरी हुई।” न वे यह कहने पाएं: “हमने तो उसे निगल लिया है।”

26जो मेरे संकट पर हँसते हैं वे सब तुच्छ बनें और लज्जित हों; जो मेरे विरुद्ध बड़ा बोल बोलते हैं वे लज्जा और अपमान से ढंप जाए।

27जो मेरे दोष-मुत्तफ़ होने की कामना करते हैं वे अानन्दित हों और जय-जयकार करें और निरन्तर कहते रहें, “यहोवा की बड़ाई हो, जो अपने सेवक की सम्पन्नता से प्रसन्न होता है।”

28तब मेरी जीभ से तेरी धार्मिकता की चर्चा, और दिन-भर तेरी स्तुति होती रहेगी।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)