Loading account

नया नियम · प्रकाशितवाक्य · अध्याय 4 / 22

प्रकाशितवाक्य 4

1इन बातों के पश्चात् मैंने दृष्टि की, और देखो, स्वर्ग में एक द्वार खुला हुआ है। तुरही की ध्वनि के समान जो प्रथम आवाज़ मैंने सुनी, उसने कहा, “यहां ऊपर आ, और मैं तुझे उन बातों को दिखाऊंगा जिनका उनके पश्चात् होना अवश्य है।”

2मैं तुरन्त आत्मा में आ गया, और देखो, स्वर्ग में एक सिंहासन रखा था और उस पर कोई बैठा हुआ था।

3वह जो बैठा था यशब और माणिक्य के सदृश दिखाई देता था, और उस सिंहासन के चारों ओर पन्ना के सदृश एक मेघ-धनुष दिखाई देता था।

4उस सिंहासन के चारों ओर चौबीस सिंहासन थे, और उन सिंहासनों पर मैंने चौबीस प्राचीनों को श्वेत वस्त्र पहिने तथा सिर पर सोने के मुकुट धारण किए हुए देखा।

5उस सिंहासन से बिजलियां, गर्जन और बादलों की गड़गड़ाहट निकलती हैं, और सिंहासन के सामने आग के सात दीप जल रहे थे, जो परमेश्वर की सात आत्माएं हैं,

6तथा सिंहासन के सामने स्फटिक के समान मानो कांच का समुद्र था, और सिंहासन के मध्य और चारों ओर चार प्राणी थे जिनके आगे पीछे आंखें ही आंखें थी।

7पहला प्राणी सिंह के सदृश, दूसरा प्राणी बछड़े के सदृश, और तीसरे प्राणी का मुख मनुष्य के समान, और चौथा प्राणी उड़ते उकाब के सदृश था।

8इन चारों प्राणियों में से प्रत्येक के छः छः पंख थे। उनके चारों ओर तथा भीतर आंखें ही आंखें थी। वे दिन-रात यह कहते नहीं थकतेः “पवित्र, पवित्र, पवित्र, प्रभु परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, जो था, और जो है और जो आने वाला है।”

9जब जब ये प्राणी उसकी जो सिंहासन पर विराजमान और युगानुयुग जीवित है, महिमा, आदर और धन्यवाद करते,

10तब तब ये चौबीसों प्राचीन, उसके सामने जो सिंहासन पर बैठा है, गिर पड़ते और उसकी जो युगानुयुग जीवित है, वन्दना करते और यह कहते हुए अपने अपने मुकुट सिंहासन के सामने डाल दिया करते हैः

11‘हे हमारे प्रभु और परमेश्वर, तू ही महिमा, आदर और सामर्थ्य के योग्य है, क्योंकि तू ने ही सब वस्तुओं को सृजा, और उनका अस्तित्व और उनकी सृष्टि तेरी ही इच्छा से हुई।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)