रोमियों 12:1
अतः हे भाइयो, मैं परमेश्वर की दया का स्मरण दिलाकर तुमसे आग्रह करता हूँ कि तुम अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और ग्रहणयोग्य बलिदान करके परमेश्वर को समर्पित कर दो। यही तुम्हारी आत्मिक आराधना है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)
संदर्भ: रोमियों 12
1अतः हे भाइयो, मैं परमेश्वर की दया का स्मरण दिलाकर तुमसे आग्रह करता हूँ कि तुम अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और ग्रहणयोग्य बलिदान करके परमेश्वर को समर्पित कर दो। यही तुम्हारी आत्मिक आराधना है।
2इस संसार के अनुरूप न बनो, परन्तु अपने मन के नए हो जाने से तुम परिवर्तित हो जाओ कि परमेश्वर की भली, ग्रहणयोग्य और सिद्ध इच्छा को तुम अनुभव से मालूम करते रहो।
3क्योंकि मैं उस अनुग्रह के द्वारा जो मुझे दिया गया है, तुममें से प्रत्येक से कहता हूं कि कोई भी अपने आप को जितना समझना चाहिए उससे बढ़कर न समझे; परन्तु परमेश्वर द्वारा दिए गए विश्वास के परिमाण के अनुसार ही सुबुद्धि से अपने आप को समझे।
4क्योंकि जैसे हमारे शरीर में अनेक अंग हैं और सभी अंगों का एक ही कार्य नहीं है,
संबंधित पद
- 1 पतरस 2:5
तुम भी जीवित पत्थरों के समान एक आत्मिक भवन बनते जाते हो, जिस से पुरोहितों का एक पवित्र समाज बन कर ऐसे आत्मिक बलिदान चढ़ाओ जो यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हो।
- रोमियों 6:13
और नअपने शरीर के अंगों को अधर्म के हथियार बनाकर पाप को सौंपो; परन्तु अपने आप को मृतकों में से जीवित जानकर अपने अंगों को धार्मिकता के हथियार होने के लिए परमेश्वर को सौंप दो।
- इब्रानियों 13:15–16
अतः हम यीशु के द्वारा स्तुतिरूपी बलिदान परमेश्वर को सर्वदा चढ़ाया करें, अर्थात् उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते है।
- रोमियों 6:19
मैं तुम्हारी शारीरिक दुर्बलता के कारण मानवीय संदर्भ में बोल रहा हूँ। जिस प्रकार तुमने अपने अंगों को अशुद्धता और व्यवस्था-उल्लंघन के दास होने के लिए सौंप दिया था परिणामस्वरूप व्यवस्था-उल्लंघन और अधिक बढ़ गया, उसी प्रकार अब अपने अंगों को धार्मिकता के दास होने के लिए समर्पित कर दो कि जिसका परिणाम §पवित्रता हो।
- इफिसियों 4:1
इसलिए मैं जो प्रभु का बन्धुआ हूं तुम से निवेदन करता हूं कि जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए हो उसके योग्य चाल चलो,
- रोमियों 12:2
इस संसार के अनुरूप न बनो, परन्तु अपने मन के नए हो जाने से तुम परिवर्तित हो जाओ कि परमेश्वर की भली, ग्रहणयोग्य और सिद्ध इच्छा को तुम अनुभव से मालूम करते रहो।
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