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नया नियम · इफिसियों · अध्याय 4 / 6

इफिसियों 4

1इसलिए मैं जो प्रभु का बन्धुआ हूं तुम से निवेदन करता हूं कि जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए हो उसके योग्य चाल चलो,

2अर्थात् सम्पूर्ण दीनता और नम्रता तथा धीरज के साथ प्रेम से एक दूसरे के प्रति सहनशीलता प्रकट करो,

3और यत्न करो कि मेल के बन्धन में आत्मा की एकता सुरक्षित रहे।

4एक ही देह है और आत्मा भी एक हैः ठीक उसी प्रकार अपनी बुलाहट की एक आशा में तुम भी बुलाए गए थे।

5एक ही प्रभु, एक ही विश्वास, एक ही बपतिस्मा,

6और सब का एक ही परमेश्वर पिता है, जो सब के ऊपर और सब के मध्य और सब में है।

7परन्तु हम में से प्रत्येक को मसीह के दान के परिमाण के अनुसार अनुग्रह दिया गया है।

8इसलिए वह कहता है, ‘‘जब वह ऊंचे पर चढ़ा तो बन्धुओं के समूह को बन्धुवाई में ले गया और उसने मनुष्यों को दान दिए।’’

9अब इस कथन का कि वह ऊंचे पर चढ़ा, क्या अर्थ है? केवल यही कि वह पृथ्वी के निचले स्थानों में भी उतरा था।

10और वह जो उतरा था, स्वयं वही है जो सब आकाशों से भी ऊपर चढ़ गया कि सब कुछ परिपूर्ण करे।

11उसने कुछ को प्रेरित, कुछ को भविज्द्वक्ता, कुछ को सुसमाचार-प्रचारक, कुछ को पास्टर और कुछ को शिक्षक नियुक्त करके दे दिया,

12कि पवित्र लोग सेवा-कार्य के योग्य बनें और मसीह की देह तब तक उन्नति करे,

13जब तक कि हम सब के सब विश्वास में और परमेश्वर के पुत्र के पूर्ण ज्ञान में एक न हो जाएं, परिपक्व न बन जाएं, अर्थात् मसीह के पूरे डील-डौल तक बढ़ न जाए।

14अतः हम आगे को बालक न रहें जो मनुष्यों की ठग-विघा, धूर्तता, भ्रम की युक्ति और सिद्धान्त-रूपी हवा के हर एक झोंके से उछाले और इधर-उधर घुमाए जाते हों,

15वरन् प्रेम में सच्चाई से चलते हुए सब बातों में उसमें जो सिर है अर्थात् मसीह में बढ़ते जाएं,

16जिस से सम्पूर्ण देह, प्रत्येक जोड़ में एक साथ बन्धकर और सुगठित होकर, प्रत्येक अंग के ठीक-ठीक कार्य करने के द्वारा बढ़ती जाती है, और इस प्रकार प्रेम में स्वयं उसकी उन्नति होती है।

17इसलिए मैं कहता हूं और प्रभु में तुम्हें चेतावनी देता हूं कि जिस प्रकार ग़ैरयूहदी अपने मन की अनर्थ रीति पर चलते हैं, तुम आगे को वैसे न चलो।

18क्योंकि उस अज्ञानता के कारण जो उनमें है, और उनके मन की कठोरता के कारण, उनकी बुद्धि अन्धकारमय हो गई है, और वे परमेश्वर के जीवन से अलग हो गए है।

19वे सुन्न होकर यहां तक लुचपन में लग गए कि वब प्रकार के गन्दे काम करने के लिए लालायित रहते है।

20तुमने तो मसीह को इस प्रकार नहीं जाना-

21यदि वास्तव में तुम ने उसके विजय में सुना और जैसा यीशु में सत्य है उसमें सिखाए भी गए,

22कि तुम पिछले चालचलन के पुराने मनुष्यत्व को उतार डालो जो भरमाने वाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है।

23और अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नए बनते जाओ,

24और नए मनुष्यत्व को पहिन लो जो परमेश्वर के अनुरूप सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है।

25इस कारण तुम में से प्रत्येक, झूठ बोलना छोड़कर, अपने पड़ोसी से सच बोले, क्योंकि हम आपस में एक दूसरे के अंग है।

26क्रोध तो करो पर पाप न करो। तुम्हारा क्रोध सूर्य अस्त होने तक बना न रहे।

27शैतान को अवसर न दो।

28चोरी करने वाला फिर चोरी न करे, परन्तु भलाई करने के लिए अपने हाथों से परिश्रम करे, जिससे कि आवश्यकता में पड़े हुए को देने के लिए उसके पास कुछ हो।

29कोई अशलील बात तुम्हारे मुंह से न निकले, परन्तु केवल ऐसी बात निकले जो उस समय की आवश्यकता के अनुसार उन्नति के लिए उत्तम हो, जिससे कि सुनने वालों पर अनुग्रह हो।

30परमेश्वर के पवित्र आत्मा को -शोकित मत करो, जिस से तुम पर छुटकारे के दिन के लिए छाप दी गई है।

31सब प्रकार की कड़ुवाहट, रोज, क्रोध, कलह और निन्दा, सब प्रकार के बैर-भाव सहित तुम से दूर किए जाए।

32एक दूसरे के प्रति दयालु और करफ़णामय बनो, और परमेश्वर ने मसीह में जैसे तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)