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नया नियम · रोमियों · अध्याय 9 / 16

रोमियों 9

1मैं मसीह में सच कहता हूँ, मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ, मेरा विवेक भी पवित्र आत्मा में इस बात की साक्षी दे रहा है,

2कि मैं अत्यन्त दुखी हूँ और मेरा हृदय निरन्तर शोकित रहता है।

3क्योंकि मैं यहां तक चाहता था कि अपने भाइयों के लिए जो शरीर के अनुसार मेरे सम्बन्धी हैं, मैं स्वयं ही अभिशप्त होकर मसीह से अलग हो जाता।

4वे इस्राएली हैं, और लेपालकपन का अधिकार, महिमा, वाचाएं, व्यवस्था, उपासना और प्रतिज्ञाएंकृये सब उन्हीं की है।

5पूर्वज उन्हीं के हैं, और मसीह भी शरीर के अनुसार उन्हीं में से हुआ, जो सब के ऊपर, युगानुयुग धन्य परमेश्वर है। आमीन।

6परन्तु ऐसा नहीं कि परमेश्वर का वचन व्यर्थ हो गया है। क्योंकि वे सब जो इस्राएल के वंशज हैं सभी इस्राएली नहीं;

7न ही वे इब्राहीम के वंशज होने के कारण उसकी सन्तान हैं, परन्तु लिखा है, “इसहाक ही के वंश से तेरा नाम चलेगा।”

8तात्पर्य यह है कि शरीर के सन्तान परमेश्वर के सन्तान नहीं हैं, परन्तु प्रतिज्ञा के सन्तानवंशज माने जाते है।

9क्योंकि प्रतिज्ञा का वचन यह हैः “मैं इसी समय पर आऊँगा, और सारा के एक पुत्र होगा।”

10केवल यही नहीं, परन्तु रिबका ने भी एक ही पुरुष अर्थात् हमारे पिता इसहाक से जुड़वाँ बच्चों का गर्भ धारण कियाकृ

11यघपि अभी जुड़वाँ जन्मे भी नहीं थे और न कुछ भला या बुरा किया था, इस अभिप्राय से कि परमेश्वर द्वारा चुने जाने का उद्देशय जो कर्म के आधार पर नहीं, वरन् बुलाने वाले के निर्णय के आधार पर है, बना रहेकृ

12उससे यह कहा गया था, “ज्येज्ठ पुत्र छोटे की सेवा करेगा।”

13जैसा लिखा है, “याकूब से मैंने प्रेम किया, परन्तु एसाव को अप्रिय जाना।”

14तो हम क्या कहें? क्या परमेश्वर अन्यायी है? कदापि नहीं!

15क्योंकि वह मूसा से कहता है, “मैं जिस पर दया करना चाहूँ उसी पर दया करूँगा, और जिस पर तरस खाना चाहूँ उसी पर तरस खाऊँगा।”

16अतः यह न तो चाहने वाले की इच्छा पर और न दौड़-धूप करने वाले पर निर्भर है, परन्तु परमेश्वर पर जो दया करता है।

17क्योंकि पवित्रशास्त्र फिरौन से कहता है, “मैंने इसी अभिप्राय से तुझे खड़ा किया है, कि तुझमें अपनी सामर्थ्य दिखाऊं, कि मेरे नाम का प्रचार सम्पूर्ण पृथ्वी पर किया जाए”

18अतः वह जिस पर चाहता है उस पर दया करता है, और जिसे वह चाहता है उसे कठोर कर देता है।

19तब तू मुझसे कहेगा, “वह अब भी क्यों दोष लगाता है? क्योंकि कौन उसकी इच्छा का विरोध करता है?”

20इसके विपरीत, हे मनुष्य, तू कौन है जो परमेश्वर से प्रतिवाद करता है? क्या गढ़ी हुई वस्तु गढ़ने वाले से यह कहेगी कि, “तूने मुझे ऐसा क्यों बनाया?”

21क्या कुम्हार को मिट्टी पर यह अधिकार नहीं कि उसी मिट्टी के लोंदे से एक बर्तन को आदरणीय उपयोग के लिए तथा दूसरे को साधारण उपयोग के लिए बनाए?

22यदि परमेश्वर ने अपना क्रोध दिखाने और अपना सामर्थ्य प्रकट करने की इच्छा से विनाश के लिए तैयार किए गए कोप के पात्रों को बड़े धैर्य से सहा, तो क्या हुआ?

23उसने यह इसलिए किया कि वह अपनी महिमा का धन दया के उन पात्रों पर प्रकट करे, जिन्हें उसने पहले से ही महिमा के लिए तैयार किया था,

24अर्थात् हमें भी, जिन्हें उसने न केवल यहूदियों में से, वरन् गैरयहूदियों में से भी बुलाया।

25जैसा वह होशे की पुस्तक में भी कहता हैः “जो मेरी प्रजा न थी, उसे मैं ‘अपनी प्रजा’ कहूँगा, और जो प्रिया न थी उसे ‘प्रिया’ कहूंगा।

26और ऐसा होगा कि जहां उनसे यह कहा गया था, ‘तुम मेरी प्रजा नहीं हो,’ वहीं वे ‘जीवित परमेश्वर के पुत्र’ कहलाएंगे।”

27और यशायाह इस्राएल के विषय में पुकारकर कहता है, “यघपि इस्राएल की सन्तानों की संख्या समुद्र के बालू के समान हो, फिर भी थोड़े ही बचाए जाएंगे।

28क्योंकि प्रभु पृथ्वी पर अपना वचन पूर्णतया एवं शीघ्र ही कार्यान्वित करेगा।”

29जैसे यशायाह ने भविष्यद्वाणी की थी, “यदि सेनाओं का यहोवा हमारे लिए कुछ वंश न छोड़ता, तो हम सदोम के सदृश हो गए होते, और अमोरा के समान जा ठहरते।”

30तब हम क्या कहें? कि गै़रयहूदियों ने, जो धार्मिकता की खोज नहीं करते थे, धार्मिकता प्राप्त कर ली, अर्थात् वह धार्मिकता जो विश्वास से है;

31परन्तु इस्राएली, धार्मिकता की व्यवस्था की खोज करते हुए भी, उस धार्मिकता की व्यवस्था तक नहीं पहुँचे।

32ऐसा क्यों? क्योंकि उन्होंने उसकी खोज विश्वास से नहीं, परन्तु मानो वह कर्माेंं से प्राप्त होती हो। उन्होंने ठोकर के पत्थर पर ठोकर खाई,

33जैसा लिखा है, “देखो, मैं सिय्योन में एक ठोकर का पत्थर और ठेस की चट्टान रखता हूँ, और जो उस पर विश्वास करेगा वह लज्जित न होगा।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)