नया नियम · रोमियों · अध्याय 10 / 16
रोमियों 10
1भाइयो, मेरी हार्दिक अभिलाजा और परमेश्वर से उनके लिए प्रार्थना है कि वे उद्धार पाए।
2उनके लिए मेरी साक्षी है कि उनमें परमेश्वर के लिए धुन तो है, परन्तु ज्ञान के अनुसार नही।
3क्योंकि परमेश्वर की धार्मिकता को न जानते हुए, और अपनी ही धार्मिकता को स्थापित करने का प्रयत्न करते हुए, उन्होंने अपने आपको परमेश्वर की धार्मिकता के अधीन नहीं किया।
4क्योंकि प्रत्येक विश्वास करने वाले के निमित्त धार्मिकता के प्रति मसीह व्यवस्था का अन्त है।
5क्योंकि मूसा लिखता है कि जो व्यक्ति उस धार्मिकता पर आचरण करता है जो व्यवस्था पर आधारित है, वह उसी धार्मिकता के द्वारा जीवित रहेगा।
6परन्तु वह धार्मिकता जो विश्वास पर आधारित है, इस प्रकार कहती है, “अपने मन में यह न कहना, ‘स्वर्ग पर कौन चढ़ेगा?’ -अर्थात् मसीह को नीचे लाने के लिए-
7या ‘अधोलोक में कौन उतरेगा?’-अर्थात् मसीह को मृतकों में से जिला कर ऊपर लाने के लिए”-
8परन्तु वह क्या कहती है? “वचन तेरे निकट है; यह तेरे मुंह में और तेरे हृदय में है,” अर्थात् विश्वास का वह वचन जिसका हम प्रचार करते हैं,
9कि यदि तू अपने मुख से यीशु को प्रभु जान कर अंगीकार करे, और अपने मन में यह विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मृतकों में से जीवित किया तो तू उद्धार पाएगा।
10मनुष्य जब हृदय से विश्वास करता है तो उसका परिणाम धार्मिकता होता है, और जब वह मुंह से अंगीकार करता है तो उसका परिणाम उद्धार होता है।
11क्योंकि पवित्रशास्त्र कहता है, “जो कोई उस पर विश्वास करेगा, वह लज्जित न होगा।”
12क्योंकि यहूदी और यूनानी में कोई अन्तर नहीं है, एक ही प्रभु सबका प्रभु है, और उन सब के प्रति जो उसको पुकारते हैं अत्यन्त उदार है।
13क्योंकि, “जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।”
14फिर वे उसे क्यों पुकारेंगे जिस पर उन्होंने विश्वास ही नहीं किया? और वे उस पर कैसे विश्वास करेंगे जिसके विषय में उन्होंने सुना ही नहीं? भला वे प्रचारक के बिना कैसे सुनेंगे?
15और वे प्रचार कैसे करेंगे जब तक कि भेजे न जाएं? ठीक जैसा कि लिखा है, “उनके पांव कैसे सुहावने हैं जो भली बातों का सुसमाचार लाते हैं!”
16परन्तु उन सभी ने सुसमाचार पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि यशायाह कहता है, “हे प्रभु, किसने हमारे सन्देश पर विश्वास किया है?”
17अतः विश्वास सुनने से, और सुनना मसीह के वचन के द्वारा होता है।
18परन्तु मैं कहता हूँ, क्या उन्होंने वास्तव में कभी नहीं सुना? उन्होंने अवश्य सुना हैः “उनके स्वर सारी पृथ्वी पर, और उनका प्रचार संसार के कोने-कोने तक पहुंच गया है।”
19परन्तु मैं कहता हूँ, क्या इस्राएली नहीं जानते थे? निश्चय वे जानते थे! सर्वप्रथम मूसा कहता है, “जो एक जाति नहीं है, उसके द्वारा मैं तुममें जलन उत्पन्न करूँगा और एक मूढ़ जाति के द्वारा मैं तुममें क्रोध उत्पन्न करूँगा।”
20फिर यशायाह बड़े साहस के साथ कहता हैः “जो मुझे खोजते नहीं थे, उन्होंने मुझे पा लिया, और जो मेरे विषय में पूछते भी न थे, मैं उन पर प्रकट हो गया।”
21परन्तु इस्राएल के विषय में वह कहता है, “दिन भर मैं अपने हाथों को अनाज्ञाकारी और हठी प्रजा की ओर बढ़ाए रहा।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)