नया नियम · रोमियों · अध्याय 11 / 16
रोमियों 11
1अतः मैं कहता हूँ, क्या परमेश्वर ने अपनी प्रजा को त्याग दिया? कदापि नहीं! क्योंकि मैं भी तो इस्राएली हूँ, इब्राहीम के वंश और बिन्यामीन के गोत्र से हूँ।
2परमेश्वर ने अपनी प्रजा को त्याग नहीं दिया, जिसका उसे पूर्व-ज्ञान था। क्या तुम नहीं जानते कि पवित्रशास्त्र एलिय्याह के विषय में क्या कहता है, कि वह परमेश्वर से इस्राएल के विरुद्ध कैसी विनती करता है?
3“हे प्रभु, उन्होंने तेरे नबियों को घात किया है, उन्होंने तेरी वेदियों को ढा दिया है। मैं ही अकेला बच गया हूँ, और वे मेरे भी प्राण के खोजी है।”
4परन्तु परमेश्वर का प्रत्युत्तर क्या था?” “मैंने अपने लिए सात हज़ार पुरुषों को रख छोड़ा है, जिन्होंने बाअल के सम्मुख घुटने नहीं टेके।”
5ठीक उसी तरह वर्तमान समय में भी परमेश्वर के अनुग्रहमय चुनाव के अनुसार कुछ लोग शेज है।
6यदि यह अनुग्रह से हुआ, तो फिर कर्माें के आधार पर कदापि नहीं, अन्यथा अनुग्रह, अनुग्रह ही न रहा।
7तो क्या हुआ? इस्राएली जिसकी खोज में थे, वह उन्हें प्राप्त न हुआ, परन्तु उनको प्राप्त हुआ जो चुने हुए थे, और शेज कठोर कर दिए गए।
8जैसा लिखा है, “परमेश्वर ने उन्हें आज तक भारी नींद की आत्मा में डाल रखा है, उसने उसे ऐसी आंखें दी जो न देखें और ऐसे कान जो न सुने।”
9दाऊद कहता है, “उनका भोजन उनके लिए जाल और फन्दा और ठोकर और दण्ड का कारण हो जाए।
10उनकी आंखों में अंधेरा छा जाए कि न देखें, और उनकी पीठ सदा के लिए झुकी रहे।”
11तब मैं कहता हूँ, क्या उन्होंने गिरने के लिए ठोकर खाई? कदापि नहीं! परन्तु उनके अपराध के कारण गै़रयहूदियों में उद्धार आया कि उनमें ईर्ष्या उत्पन्न करे।
12अब यदि उनका अपराध संसार के लिए धन और उनका पतन गै़रयहूदियों के लिए धन-सम्पत्ति ठहरा, तो उनकी परिपूर्णता से क्या कुछ न होगा!
13परन्तु मैं तो तुमसे जो गै़रयहूदी हो, कह रहा हूँ। अब जब कि मैं गै़रयहूदियों के लिए प्रेरित हूँ, तो मैं अपनी सेवा को ऐसा महत्त्व देता हूँ,
14कि मैं किसी तरह अपने स्वदेशी भाइयों में ईर्ष्या उत्पन्न कर सकूँ और उनमें से कुछ का उद्धार करवा सकू।
15क्योंकि यदि उनका परित्याग संसार के मेल का कारण हुआ, तो उनका ग्रहण किया जाना मृतकों में से जी उठने के अतिरिक्त और क्या होगा?
16क्योंकि यदि गूँधे हुए आटे की प्रथम लोई पवित्र है तो सम्पूर्ण गूँधा हुआ आटा भी पवित्र है; यदि जड़ पवित्र है तो डालियां भी पवित्र है।
17परन्तु यदि कुछ डालियां तोड़ दी गईं और तू, जंगली जैतून होते हुए, उनमें कलम लगाया गया और उनके साथ जैतून वृक्ष की जड़ के उत्तम रस का भागी हो गया, तो
18डालियों के प्रति अहंकार न कर; परन्तु यदि तू अहंकार करे तो स्मरण रख कि तू जड़ को नहीं सम्भालता, परन्तु जड़ तुझे संभालती है।
19तो तू कहेगा, “डालियां इसलिए तोड़ डाली गईं कि मैं कलम लगाया जाऊँ।”
20बिल्कुल ठीक। वे अपने अविश्वास के कारण तोड़ दी गईं, और तू केवल अपने विश्वास के कारण स्थिर है। अतः अभिमानी न हो, परन्तु भय मान;
21क्योंकि यदि परमेश्वर ने मौलिक डालियों को नहीं छोड़ा तो वह तुझे भी नहीं छोड़ेगा।
22इसलिए परमेश्वर की दयालुता और कठोरता पर ध्यान दोः जिनका पतन हो गया उनके लिए कठोरता, परन्तु तेरे लिए तो परमेश्वर की दया है-यदि तू उसकी दया में बना रहे-अन्यथा तू भी काट कर अलग कर दिया जाएगा।
23वे भी यदि अपने अविश्वास में बने रहना छोड़ दें, तो कलम लगा दिए जाएंगे; क्योंकि परमेश्वर उन्हें फिर से कलम लगाने में समर्थ है।
24क्योंकि यदि तू उस जैतून-वृक्ष से जो मूलतः जंगली है, काटा जाकर अपनी प्रकृति के विरुद्ध एक अच्छे जैतून-वृक्ष में कलम लगाया गया, तो ये जो मौलिक डालियां हैं, क्यों अपने निज जैतून-वृक्ष में कलम न लगाई जाएंगी?
25क्योंकि भाइयो, मैं नहीं चाहता कि कहीं तुम अपने आप को बुद्धिमान समझ कर इस रहस्य से अनभिज्ञ रहो कि इस्राएल का एक भाग तब तक कठोर बना रहेगा, जब तक गै़रयहूदियों की संख्या पूर्ण न हो जाए,
26और इस प्रकार समस्त इस्राएल उद्धार पाएगा; जैसा कि लिखा है, “सिय्योन से उद्धारकर्ता आएगा, वह याकूब से अभक्ति दूर करेगा,
27और उनके साथ यही मेरी वाचा है, जब मैं उनके पापों को दूर कर दूंगा।”
28सुसमाचार की दृष्टि से तो वे तुम्हारे कारण परमेश्वर के शुत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के चुनाव की दृष्टि से वे पूर्वजों के कारण अति प्रिय हैं;
29क्योंकि परमेश्वर के वरदान और बुलाहट अटल है।
30जिस प्रकार पहले कभी तुम परमेश्वर के अवज्ञाकारी थे, परन्तु अब उनकी अवज्ञाकारिता के कारण तुम पर दया हुई है,
31इसी प्रकार अब वे भी अवज्ञाकारी हो गए, जिससे कि उस दया के कारण जो तुम पर की गई है, उन पर भी अब दया की जाए।
32क्योंकि परमेश्वर ने सबको अवज्ञाकारिता में बन्द कर रखा है कि वह सब पर दया करे।
33अहा! परमेश्वर की बुद्धि और उसके ज्ञान का धन कितना अगाध है! उसके विचार कैसे रहस्यमय, और उसके मार्ग कैसे अगम्य है!
34‘‘क्योंकि प्रभु के मन को किसने जाना है, अथवा उसका परामर्शदाता कौन हुआ?
35अथवा किसने उसे सर्वप्रथम कुछ दिया है जो उसे लौटा दिया जाए?”
36क्योंकि उसी की ओर से, उसी के द्वारा और उसी के लिए सब कुछ है। उसी की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)