नया नियम · 1 कुरिन्थियों · अध्याय 10 / 16
1 कुरिन्थियों 10
1हे भाइयो, मैं नहीं चाहता कि तुम इस बात से अनभिज्ञ रहो कि हमारे सभी पूर्वज बादल की अगुवाई में चले और सब के सब समुद्र के बीच से पार हुए।
2सब ने उस बादल और समुद्र में मूसा का बपतिस्मा लिया,
3सब ने एक ही आत्मिक भोजन किया,
4और सब ने एक ही आत्मिक जल पिया, क्योंकि वे उस आत्मिक चट्टान से पीते थे जो उनके साथ-साथ चलती थी; और वह चट्टान मसीह था।
5परन्तु फिर भी उनमें से अधिकांश से परमेश्वर प्रसन्न नहीं हुआ-वे जंगल में मर कर ढेर हो गए।
6ये बातें हमारे लिए उदाहरण ठहरीं कि हम भी बुरी बातों की लालसा न करें, जैसे कि उन्होंने की थी।
7और मूर्तिपूजक न बनो जैसे कि उनमें से कुछ थे, जैसा लिखा है, ‘‘लोग खाने-पीने को बैठे, और खेलने-कूदने को उठे।’’
8और न हम व्यभिचार करें, जैसे कि उनमें से बहुतों ने किया -और एक दिन में तेईस हज़ार मर गए।
9और न हम प्रभु को परखें, जेसे कि उनमें से बहुतों ने किया-तथा सर्पों द्वारा नाश हुए।
10न तुम कुड़कुड़ाओ, जैसे कि उनमें से बहुतों ने किया-और नाश करने वाले के द्वारा नाश किए गए।
11ये बातें उन पर उदाहरणस्वरूप हुईं, और ये हमारी चेतावनी के लिए लिखी गईं जिन पर इस युग का अन्त आ पहुंचा है।
12अतः जो यह समझता है कि मैं स्थिर हूं, वह सावधान रहे कि कहीं गिर न पड़े।
13तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े जो मनुष्य के सहने से बाहर है। परमेश्वर तो सच्चा है जो तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में पड़ने नहीं देगा, परन्तु परीक्षा के साथ-साथ बचने का उपाय भी करेगा कि तुम उसे सह सको।
14अतः हे मेरे प्रियो, मूर्तिपूजा से भागो।
15मैं तुम्हें बुद्धिमान समझकर कहता हूँ: जो कुछ मैं तुमसे कहता हूं उसे परखो।
16धन्यवाद का वह कटोरा जिसके लिए हम धन्यवाद देते हैं, क्या वह मसीह के लहू में सहभागिता नहीं? वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं, क्या वह मसीह की देह में सहभागिता नहीं?
17जबकि रोटी एक ही है तो हम भी जो बहुत हैं, एक देह हैं, क्योंकि हम सब उसी एक रोटी में सहभागी होते है।
18जो शरीर के भाव से इस्राएली हैं उन पर ध्यान दोः क्या बलिदानों को खाने वाले वेदी के सहभागी नहीं?
19मेरे कहने का तात्पर्य क्या है? क्या मूर्तियों के आगे बलि की हुई वस्तु कुछ है? या मूर्ति कुछ है?
20नहीं, पर मैं यह कहता हूं कि गै़रयहूदी जिन वस्तुओं की बलि चढ़ाते हैं, उन्हें परमेश्वर के लिए नहीं वरन् दुष्टात्माओं के लिए चढ़ाते है। मैं नहीं चाहता कि तुम दुष्टात्माओं के सहभागी बनो।
21तुम प्रभु के कटोरे और दुष्टात्माओं के कटोरे दोनों में से नहीं पी सकते। तुम प्रभु की मेज़ और दुष्टात्माओं की मेज़ दोनों के सहभागी नहीं हो सकते।
22क्या हम प्रभु के क्रोध को भड़काते हैं? क्या हम उस से अधिक शक्तिशाली हैं?
23सब वस्तुएं न्यायोचित तो हैं, परन्तु सब वस्तुएं लाभदायक नही। सब वस्तुएं न्यायोचित हैं, परन्तु सब वस्तुओं से उन्नति नहीं होती।
24कोई अपने ही हित की चिन्ता न करे परन्तु दूसरों के हित की भी चिन्ता करे।
25जो मांस बाज़ार में बिकता है, उसे खाओ, और विवेक के कारण प्रशन न करो,
26क्योंकि पृथ्वी और जो कुछ उसमें है सब प्रभु का है।
27यदि कोई अविश्वासी तुम्हें आमन्त्रित करे, और यदि तुम जाना चाहो तो विवेक के कारण बिना प्रशन किए वह सब खाओ जो तुम्हारे सम्मुख परोसा जाए।
28परन्तु यदि कोई तुमसे कहे, ‘‘यह मूर्ति को चढ़ाया हुआ प्रसाद है,’’ तो तुम उस बताने वाले के कारण तथा विवेक के कारण मत खाओ।
29मेरा तात्पर्य तुम्हारे विवेक से नहीं परन्तु उस दूसरे मनुष्य के विवेक से है। भला मेरी स्वतन्त्रता उस दूसरे के विवेक से क्यों परखी जाए?
30यदि मैं धन्यवाद देकर खाता हूं तो जिसके लिए मैं धन्यवाद देता हूं, उसके विषय में मेरी निन्दा क्यों की जाती है?
31अतः चाहे तुम खाओ या पीओ या जो कुछ भी करो, सब परमेश्वर की महिमा के लिए करो।
32तुम न यहूदियों, न यूनानियों, और न परमेश्वर की कलीसिया, न किसी के लिए ठोकर का कारण बनो-
33जिस प्रकार मैं भी सब बातों में सब मनुष्यों को प्रसन्न करता हूं और अपने ही लाभ की नहीं, परन्तु बहुतों के लाभ की चिन्ता करता हूं कि वे उद्धार पाए।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)