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नया नियम · 1 कुरिन्थियों · अध्याय 4 / 16

1 कुरिन्थियों 4

1मनुष्य हमें मसीह के सेवक और परमेश्वर के रहस्यों का भण्डारी समझे।

2इस से बढ़कर, इस विषय में भण्डारी के लिए आवश्यक है कि वह विश्वासयोग्य निकले।

3परन्तु मेरे लिए यह बहुत छोटी बात है कि तुम या कोई मानवीय न्यायालय मेरा न्याय करे। सच तो यह है कि मैं स्वयं अपना न्याय नहीं करता।

4मेरा मन मुझे किसी बात में दोषी नहीं ठहराता, फिर भी इस से मैं निर्दोष नहीं ठहरता, परन्तु मेरा न्याय करने वाला प्रभु है।

5इसलिए, समय से पहिले किसी बात का न्याय न किया करो, वरन् जब तक प्रभु न आए तब तक ठहरे रहो, क्योंकि वह उन बातों को जो अन्धकार में छिपी हैं प्रकाश में लाएगा, और मनुष्यों की मनोभावनाओं को प्रकट करेगा। तब प्रत्येक मनुष्य की प्रशंसा परमेश्वर की ओर से होगी।

6हे भाइयो, मैंने इन बातों का वर्णन तुम्हारे लिए दृष्टान्त के रूप में अपने और अपुल्लोस पर लागू किया है, कि तुम हम से यह सीखो कि उन बातों से जो लिखी गई हैं आगे न बढ़ो, जिससे कि तुम में से कोई एक के पक्ष में दूसरे की उपेक्षा करके घमण्ड न करे।

7क्योंकि कौन तुझे दूसरे से उत्तम समझता है? और तेरे पास क्या है जो तुझे नहीं मिला? यदि वह तुझे मिला है तो फिर घमण्ड क्यों करता है मानो तुझे मिला ही नहीं?

8तुम तो पहिले ही तृप्त हो चुके, तुम तो पहिले ही धनी हो गए, तुम हमारे बिना राजा बन चुके। भला होता कि तुम सचमुच राजा बन जाते जिससे कि हम भी तुम्हारे साथ राज्य करते!

9क्योंकि मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने हम प्रेरितों को जुलूस के अन्त मे रखा-उन मनुष्यों के समान जिन पर मृत्यु-दण्ड की आज्ञा हो चुकी हो, क्योंकि हम समस्त सृष्टि और स्वर्गदूतों और मनुष्यों के लिए तमाशा बन चुके है।

10हम मसीह के निमित्त मूर्ख हैं, परन्तु तुम मसीह में बुद्धिमान हो। हम निर्बल हैं परन्तु तुम बलवान हो। तुम आदरणीय हो, परन्तु हमारा आदर ही नही।

11हम इस घड़ी तक भूखे-प्यासे व चिथड़ों में हैं, हमारे साथ बुरी तरह व्यवहार किया जाता है और हम मारे-मारे फिरते है।

12हम अपने हाथों से कठिन परिश्रम करते है। जब हमारी निन्दा की जाती है तो हम आशिज देते है। जब हम सताए जाते हैं तो सहते है।

13जब हम बदनाम किए जाते हैं तो मेल करने का प्रयत्न करते है। हम अब तक मानो संसार का मैल व सब वस्तुओं का कूड़ा-कड़कट बने हुए है।

14मैं तुम्हें लज्जित करने क लिए नहीं परन्तु अपने प्रिय बालक जानते हुए ये बातें लिख कर चेतावनी देता हू।

15यघपि मसीह में तुम्हारे असंख्य शिक्षक हैं, फिर भी तुम्हारे अनेक पिता नहीं होते। क्योंकि मसीह यीशु में सुसमाचार के द्वारा मैं तुम्हारा पिता बना।

16अतः मैं तुम से आग्रह करता हूं कि तुम मेरा अनुकरण करो।

17इसी कारण मैंने तीमुथियुस को, जो प्रभु में मेरा प्रिय और विश्वासयोग्य पुत्र है, तुम्हारे पास भेजा है। वह तुम्हें मसीह में मेरे आचरण का स्मरण कराएगा, जैसे कि मैं हर जगह, प्रत्येक कलीसिया को शिक्षा दिया करता हू।

18कुछ लोग घमण्ड से ऐसे फूल गए हैं, मानो अब मैं तुम्हारे पास आऊंगा ही नही।

19परन्तु यदि प्रभु की इच्छा हुई तो मैं तुम्हारे पास शीघ्र आऊंगा, और घमण्डियों की बातों का नहीं, परन्तु उनकी सामर्थ्य का पता लगा लूंगा।

20क्योंकि परमेश्वर का राज्य बातों में नहीं, वरन् सामर्थ्य में है।

21तुम्हारी क्या इच्छा है? क्या मैं तुम्हारे पास छड़ी के साथ आऊं, या प्रेम और नम्रता की आत्मा के साथ?

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)