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नया नियम · 1 यूहन्ना · अध्याय 3 / 5

1 यूहन्ना 3

1देखो, पिता ने हमें कैसा महान् प्रेम प्रदान किया है कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएं; और वही हम है। इस कारण संसार हमें नहीं जानता, क्योंकि संसार ने उसे भी नहीं जाना।

2प्रियो, हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और अब तक यह प्रकट नहीं हुआ कि हम क्या होंगे। पर यह जानते हैं कि जब वह प्रकट होगा तो हम उसके सदृश होंगे, क्योंकि हम उसको ठीक वैसा ही देखेंगे जैसा वह है।

3प्रत्येक जो उस पर ऐसी आशा रखता है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है जैसा कि वह पवित्र है।

4प्रत्येक जो पाप करता है वह व्यवस्था का उल्लंघन करता है; क्योंकि पाप व्यवस्था का उल्लंघन है।

5तुम जानते हो कि वह इसलिए प्रकट हुआ कि पापों को हर ले जाए; और उसमें कोई भी पाप नही।

6जो उसमें बना रहता है, वह पाप नहीं करता; जाे पाप करता है उसने न तो उसे देखा है और न ही उसे जानता है।

7बच्चो, कोई तुम्हें धोखा न दे। जो धार्मिकता का आचरण करता है, वह धर्मी है, ठीक वैसा ही जैसा वह धर्मी है।

8जो पाप करता है वह शैतान से है, क्योंकि शैतान आरम्भ से ही पाप करता आया है। परमेश्वर का पुत्र इस अभिप्राय से प्रकट हुआ कि वह -शैतान के कार्य को नष्ट करे।

9जो परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह पाप नहीं करता, क्योंकि उसका बीज उसमें बना रहता है; और वह पाप नहीं कर सकता, क्योंकि वह परमेश्वर से उत्पन्न हुआ।

10इसी से परमेश्वर के सन्तान और शैतान के सन्तान जाने जाते हैं कि जो कोई धार्मिकता पर आचरण नहीं करता, वह परमेश्वर से नहीं, और वह भी नहीं जो अपने भाई से प्रेम नहीं करता।

11क्योंकि जो समाचार तुमने आरम्भ से सुना, वह यह है कि हम एक दूसरे से प्रेम करें-

12कैन के समान नहीं, जो उस दुष्ट से था, और जिसने अपने भाई की हत्या की। उसने किस कारण से उसकी हत्या की? उसके कर्म तो दुष्ट और उसके भाई के कर्म धार्मिकता के थे।

13भाइयो, यदि संसार तुमसे घृणा करता है तो आश्चर्य न करना।

14हम जानते हैं कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में आ पहुंचे हैं, क्योेंकि हम भाइयों से प्रेम रखते है। वह जो प्रेम नहीं रखता मृत्यु में बना रहता है।

15प्रत्येक जो अपने भाई से घृणा करता है, वह हत्यारा है; और तुम जानते हो कि किसी हत्यारे में अनन्त जीवन वास नहीं करता।

16हम प्रेम को इसी से जानते हैं, कि उसने हमारे लिए अपना प्राण दे दिया। अतः हमें भाइयों के लिए अपना प्राण देना चाहिए।

17परन्तु जिस किसी के पास इस संसार की सम्पत्ति है और वह अपने भाई को आवश्यकता में देख कर भी उसके प्रति अपना हृदय कठोर कर लेता है तो उसमें परमेश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है?

18बच्चो, हम कथन अथवा जीभ से नहीं, वरन् कार्य तथा सत्य द्वारा भी प्रेम करे।

19इसी से हम जानेंगे कि हम सत्य के हैं और हम उसके सम्मुख उन बातों में अपने हृदयों को आश्वस्त कर सकेंगे,

20जिन बातों में हमारा हृदय हमें दोषी ठहराता है; क्योंकि परमेश्वर हमारे हृदय की अपेक्षा कहीं महान् है और वह सब कुछ जानता है।

21प्रियो, यदि हमारा हृदय हमें दोषी न ठहराए, तो परमेश्वर के सम्मुख हमें साहस होता है;

22और जो कुछ हम मांगते हैं, उस से पाते हैं, क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं का पालन करते और वे ही कार्य करते हैं जो उसकी दृष्टि में प्रिय है।

23उसकी आज्ञा यह है कि हम उसके पुत्र यीशु मसीह के नाम पर विश्वास करें और एक दूसरे से ठीक वैसा ही प्रेम करें जैसी कि उसने हमें आज्ञा दी है।

24जो उसकी आज्ञाओं का पालन करता है, वह परमेश्वर में बना रहता है, और वह उसमे। और इसी से, अर्थात् उस आत्मा से जिसे उसने हमें दिया है, हम जानते हैं कि वह हम में बना रहता है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)