पुराना नियम · 1 राजा · अध्याय 10 / 22
1 राजा 10
1जब शीबा की रानी ने यहोवा के नाम के विषय में सुलैमान की कीर्ति सुनी तो वह कठिन से कठिन प्रश्नों से उसकी परीक्षा करने आई।
2वह तो मसालों और बहुत सोने और कीमती मणियों से लदे ऊंट और सेवक-सेविकाओं के बड़े भारी दल को लेकर यरूशलेम आई। और वह सुलैमान के पास आकर अपने मन की सब बातों के विषय में उससे बातें करने लगी।
3और सुलैमान ने उसके सब प्रश्नों का उत्तर दिया; ऐसी कोई बात राजा की बुद्धि से परे न रही जिसे वह उसे बता न सका हो।
4जब शीबा की रानी ने सुलैमान की समस्त बुद्धिमत्ता और उसका बनाया हुआ भवन देखा,
5और उसकी मेज पर का भोजन, उसके कर्मचारियों की व्यवस्था और उसके सेवा टहल करने वालों की सेवा-विधि और उनकी पोशाक और उसके पिलाने वालों को तथा वह मार्ग जिससे वह यहोवा के भवन को जाया करता था, इन सबको देखा तो वह दंग रह गई।
6तब उसने राजा से कहा, “तेरे कार्यों और बुद्धिमानी की जो कीर्ति मैंने अपने ही देश में सुनी थी वह सच ही है।
7फिर भी मैंने उन बातों का तब तक विश्वास नहीं किया जब तक यहां आकर उनको अपनी आंखों से न देख लिया। और देख, मुझसे तो इसका आधा भी न बताया गया था। तेरी बुद्धिमानी और सम्पन्नता उस कीर्ति से बढ़कर है, जो मैंने सुनी थी।
8धन्य हैं तेरे लोग और धन्य हैं तेरे ये सेवक जो नित्य तेरे सम्मुख रहकर तेरी बुद्धि की बातें सुनते है।
9धन्य है तेरा परमेश्वर यहोवा जो तुझसे ऐसा प्रसन्न हुआ कि उसने तुझे इस्राएल की राजगद्दी पर विराजमान किया। चूंकि यहोवा ने इस्राएल से सदा प्रेम किया इसलिए उसने न्याय और धार्मिकता करने को तुझे राजा बनाया है।”
10और उसने राजा को एक सौ बीस किक्कार सोना, बहुत-सा सुगन्धित द्रव्य और बहुमूल्य मणि दिए। शीबा की रानी ने राजा सुलैमान को जितना अधिक सुगन्धित द्रव्य दिया उतना फिर कभी नहीं आया।
11फिर हीराम के जहाज जो ओपीर से सोना लाते थे, बहुत-सी चन्दन की लकड़ी और बहुमूलय मणि भी ओपीर से लाए।
12और राजा ने चन्दन की लकड़ी से यहोवा के भवन और राजभवन के लिए खम्भे और गवैयों के लिए वीणा और सारंगियां बनवाईं; ऐसे चन्दन की लकड़ी फिर नहीं आई न आज तक दिखाई पड़ी।
13शीबा की रानी ने जो कुछ अपनी इच्छा के अनुसार चाहा वह सब राजा सुलैमान ने उसे दिया, इसके अतिरिक्त उसने अपनी उदारता से और भी बहुत कुछ दिया। तब वह अपने दल-बल सहित अपने देश को लौट गई।
14जो सोना सुलैमान के पास प्रति वर्ष पहुंचाया जाता था, उसका तौल छः सौ छियासठ किक्कार सोना था।
15इसके अतिरिक्त व्यापारियों से और सौदागरों के लेन-देन से और अरब के सब राजाओं तथा देश के राज्यपालों से भी बहुत कुछ मिलता था।
16फिर राजा सुलैमान ने सोना गढ़वाकर दो सौ बड़ी-बड़ी ढालें बनवाईं; एक-एक ढाल में छः छः सौ शेकेल सोना लगा।
17फिर उसने गढ़े हुए सोने की तीन सौ ढालें बनवाईं, एक-एक ढाल में तीन-तीन मीना सोना लगा, और राजा ने उनको लेबनोन-वन नामक भवन में रखा।
18इसके अतिरिक्त राजा ने हाथी दांत का एक बड़ा सिंहासन बनवाया और उसे चोखे सोने से मढ़वाया।
19उस सिंहासन में छः सीढ़ियां थीं और सिंहासन का पिछला भाग गोलाकार था और गद्दी के दोनों ओर टेकें लगी थीं, और टेकों के पास एक-एक सिंह खड़ा हुआ बना था।
20और छहों सीढ़ियों के दोनों ओर एक-एक सिंह अर्थात् कुल बारह सिंह खड़े हुए बने थे। ऐसा कभी किसी राज्य में नहीं बना था।
21और राजा सुलैमान के पीने के सब पात्र सोने के थे, और लेबनोन की लकड़ी के भवन के सब पात्र भी चोखे सोने के थे। चांदी का एक भी पात्र न था; सुलैमान के दिनों में इसे मूल्यवान नहीं समझा जाता था।
22क्योंकि समुद्र पर हीराम के जहाजो के साथ राजा तर्शीश के जहाज भी रखता था। तर्शीश के जहाज हर तीसरे वर्ष सोना, चांदी, हाथीदांत, बन्दर और मयूर ले आते थे।
23अतः राजा सुलैमान धन और बुद्धि में पृथ्वी के सब राजाओं से बढ़ कर हो गया।
24बुद्धि की जो बातें परमेश्वर ने सुलैमान के मन में डाली थीं, उन्हें सुनने के लिए समस्त पृथ्वी के लोग उसका दर्शन पाना चाहते थे।
25और वे प्रति वर्ष अपनी-अपनी भेंटें अर्थात् चांदी और सोने की वस्तुएं, पोशाकें, शस्र, सुगधित द्रव्य, घोड़े और खच्चर लाया करते थे।
26फिर राजा सुलैमान ने रथ और घुड़सवार इकट्ठे किए और उसके पास चौदह सौ रथ और बारह हजार घुड़सवार हो गए और उसने उनको यरूशलेम के राजा के पास और रथवाले नगरों में ठहरा दिया।
27और यरूशलेम में बहुतायत के कारण राजा ने चांदी को पत्थर के समान और देवदार को तराई के गूलर के समान कर दिया।
28सुलैमान के यहां घोड़ों का आयात मिस्र और कोए देशों से होता था और राजा के व्यापारी उन्हें कोए से दाम देकर मंगाते थे।
29मिस्र से एक रथ़्ा चांदी के छः सौ शेकेल में, और एक घोड़ा डेढ़ सौ शेकेल में आयात होता था और इसी प्रकार वे हित्तियों और सीरिया के सब राजाओं को भी भेजे जाते थे।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)