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पुराना नियम · 1 राजा · अध्याय 18 / 22

1 राजा 18

1तब ऐसा हुआ कि बहुत दिनों के बाद, तीसरे वर्ष में यहोवा का यह वचन एलिय्याह के पास पहुंचा, “जा, अपने आप को अहाब के समक्ष उपस्थित कर, और मैं भूमि पर वर्षा भेजूंगा।”

2अतः एलिय्याह अहाब के समक्ष उपस्थित होने के लिए गया। उस समय सामरिया का अकाल भयंकर हो गया था।

3अहाब ने ओबघाह को जो उसके घराने का प्रधान था, बुलवाया। और ओबघाह तो यहोवा का बहुत भय मानता थाः

4क्योंकि ऐसा हुआ कि जब ईज़ेबेल ने यहोवा के नबियों को नष्ट किया तो ओबघाह ने एक सौ नबियों को लेकर पचास-पचास करके गुफा में छिपा कर रखा, और भोजन-जल देकर उनका पालन-पोषण किया।

5तब अहाब ने ओबघाह से कहा, “देश में जल के सब सोतों और घाटियों के पास जा, कदाचित् वहां हमें इतनी घास मिले कि हम घोड़ों और खच्चरों को जीवित रख सकें, और कुछ पशुओं को मारना न पड़े।

6अतः उन्होंने सर्वेक्षण करने के लिए आपस में देश को बांट लिया और एक ओर स्वयं अहाब गया और दूसरी ओर ओबघाह।

7जब ओबघाह मार्ग में ही था तो देखो, एलिय्याह उससे मिला। उसने उसे पहचान लिया और मुंह के बल गिरकर कहा, “हे मेरे स्वामी एलिय्याह, क्या तू ही है?”

8और उसने उससे कहा, “हां, मैं ही हू। जा, अपने स्वामी से कह, ‘देख, एलिय्याह यहां है’।”

9और उसने कहा, “मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है कि तू अपने सेवक को मरवा डालने के लिए अहाब के हाथ सौंपना चाहता है?

10तेरे परमेश्वर यहोवा के जीवन की शपथ, कोई ऐसी जाति या राज्य नहीं है, जिसमें मेरे स्वामी ने तुझे ढूंढने को न भेजा हो, और जब उन लोगों ने कहा, ‘वह यहां नहीं है,’ तो उसने उस राज्य व जाति को इसकी शपथ खिलाई कि वे तुझे नहीं पा सके।

11और अब तू कहता है, ‘जा, अपने स्वामी से कह, “देख, एलिय्याह यहां है”।’ “

12और ऐसा होगा कि जब मैं तेरे पास से चला जाऊंगा तो यहोवा का आत्मा तुझे ऐसी जगह उठा ले जाएगा जिसे मैं नहीं जानता; अतः जब मैं जाकर अहाब को बताऊंगा, और तू उसे न मिलेगा, तब वह मुझे मार डालेगा, यघपि मैं तेरा दास अपनी युवावस्था से यहोवा का भय मानता आया हू।

13क्या मेरे प्रभु को यह नहीं बताया गया कि जब ईज़ेबेल ने यहोवा के नबियों को घात किया तो मैंने क्या किया कि मैंने एक सौ नबियों को लेकर पचास-पचास करके गुफा में छिपा दिया और भोजन-जल देकर उनका पालन-पोषण किया?

14और अब तू कहता है, ‘जा, अपने स्वामी से कह, “देख, एलिय्याह यहां है”।’ तब तो वह मुझे मार डालेगा।”

15और एलिय्याह ने कहा, “सेनाओं के यहोवा के जीवन की शपथ जिसके सामने मैं रहता हूं, आज मैं अवश्य अपने आप को उस पर प्रकट करूंगा।”

16तब ओबघाह, अहाब से मिलने गया और उसको बता दिया, और अहाब, एलिय्याह से मिलने गया।

17और ऐसा हुआ कि जब अहाब ने एलिय्याह को देखा तब अहाब ने उससे कहा, “हे इस्राएल के सताने वाले, क्या तू ही है?”

18और उसने कहा, “मैंने इस्राएल को नहीं सताया, परन्तु तू और तेरे पिता के घराने ने सताया है, क्योंकि तुमने यहोवा की आज्ञाओं को त्याग दिया और बाल-देवताओं की उपासना की है।

19अब दूत भेज कर सारे इस्राएल के साथ बाल के चार सौ पचास नबियों और अशेरा के चार सौ नबियों को जो ईज़ेबेल की मेज़ पर खाते हैं, मेरे पास कर्मेल पर्वत पर इकट्ठा कर ले।”

20अतः अहाब ने सारे इस्राएलियों को बुलवा भेजा और नबियों को कर्मेल पर्वत पर एकत्रित किया।

21और एलिय्याह ने सब लोगों के समीप आकर कहा, “तुम कब तक दो विचारों में लटके रहोगे? यदि यहोवा ही परमेश्वर हो तो उसके पीछे हो लो, और यदि बाल हो तो उसके पीछे हो लो।” परन्तु लोगों ने उसके उत्तर में एक भी बात न कही।

22तब एलिय्याह ने लोगों से कहा “यहोवा के नबियों में से केवल मैं ही बचा हूं, और बाल के नबी चार सौ पचास पुरफ़ष है।

23अब हमें दो बछड़े दिए जाएं और वे अपने लिए एक बछड़ा चुन कर उसे टुकड़े-टुकड़े काट कर लकड़ी पर रखें, परन्तु उसके नीचे आग न रखें; और मैं दूसरा बछड़ा तैयार करूंगा और उसे लकड़ी पर रखूंगा और मैं भी उसके नीचे कुछ आग न रखूंगा।

24तब तुम अपने देवता को पुकारना, और मैं यहोवा को पुकारूंगा; और जो आग के द्वारा उत्तर दे वही परमेश्वर ठहरे।” तब सब लोगों ने उत्तर दिया, “यह अच्छा विचार है।”

25अतः एलिय्याह ने बाल के नबियों से कहा, “पहले तुम एक बछड़ा चुन कर तैयार कर लो, क्योंकि तुम तो बहुत हो। तब अपने देवता को पुकारना, परन्तु बछड़े के नीचे आग न रखना।”

26तब उन्होंने उस बछड़े को जो उन्हें दिया गया था लेकर तैयार किया। फिर वे सुबह से लेकर दोपहर तक यह कहकर बाल देवता को पुकारते रहे, “हे बाल, हमारी सुन।” परन्तु न तो कोई शब्द हुआ और न किसी ने उत्तर दिया। तब वे अपनी बनाई हुई वेदी के आस-पास उछलने-कूदने लगे।

27और ऐसा हुआ कि दोपहर को एलिय्याह ने उनका ठट्ठा करते हुए कहा, “और भी जोर से पुकारो क्योंकि वह तो देवता है; वह ध्यान-मग्न होगा या कहीं गया होगा या कहीं यात्रा में होगा, या हो सकता है कि सोता हो और उसे जगाने की आवश्यकता है।”

28अतः उन्होंने जोर-जोर से पुकार कर अपनी रीति के अनुसार तलवारों और भालों से अपने आप को यहां तक घायल किया कि लहू-लुहान हो गए।

29तब ऐसा हुआ कि दोपहर बीत गई वरन् भेंट चढ़ाने का समय आ गया और वे चिल्लाते ही रहे; परन्तु न तो किसी ने उत्तर दिया और न कोई ध्यान दिया।

30तब एलिय्याह ने सब लोगों से कहा, “मेरे पास आओ।” अतः सब लोग उसके पास आए; और उसने यहोवा की वेदी की जो गिराई गई थी, मरम्मत की।

31फिर एलिय्याह ने याकूब जिसके पास यहोवा का वह वचन आया था, “तेरे नाम इस्राएल होगा,” उसके पुत्रों के गोत्रों की गिनती के अनुसार बारह पत्थर लिए।

32और उन पत्थरों से यहोवा के नाम की वेदी बनाई । और उसके चारों ओर इतनी बड़ी खाई खोदी कि उसमें दो सआ बीज समा सके।

33तब उसने वेदी पर लकड़ी को सजाया और बछड़े को टुकड़े-टुकड़े काट कर लकड़ी पर रख दिया और कहा, “चार घड़े पानी भर कर होमबलि-पशु और लकड़ी पर उंड़ेल दो।”

34तब उसने कहा, “दूसरी बार वैसा ही करो।” तब उन्होंने दूसरी बार वैसा ही किया। और उसने कहा, “तीसरी बार वैसा की करो।” तब उन्होंने तीसरी बार भी वैसा ही किया।

35और पानी वेदी के चारों ओर बह गया, और उसने खाई को भी पानी से भर दिया।

36और ऐसा हुआ कि भेंट चढ़ाने के समय एलिय्याह नबी ने समीप जाकर कहा, “हे इब्राहीम, इसहाक और इस्राएल के परमेश्वर यहोवा, आज यह प्रकट होने दे कि इस्राएल में तू ही परमेश्वर है, और मैं तेरा दास हूं और कि मैंने यह सब तेरे कहने के अनुसार किया है।

37हे यहोवा, मेरी सुन! मेरी सुन कि ये लोग जान लें कि हे यहोवा, तू ही परमेश्वर है, और तू ही ने उनके मनों को फेर दिया है।”

38तब यहोवा की आग गिरी और उसने होमबलि की लकड़ी और पत्थरों को धूलि समेत भस्म कर दिया और खाई में का जल भी सुखा दिया।

39और जब सब लोगों ने यह देखा तो मुंह के बल गिर कर कहा, “यहोवा ही परमेश्वर है! यहोवा ही परमेश्वर है!”

40तब एलिय्याह ने उनसे कहा, “बाल के नबियों को पकड़ लो, उनमें से एक भी बचने न पाए।” अतः उन्होंने उनको पकड़ लिया, और एलिय्याह ने उन्हें नीचे किशोन के नाले में ले जाकर वहीं मार डाला।

41फिर एलिय्याह ने अहाब से कहा, “जाकर खा-पी, क्योंकि भारी वर्षा की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है।”

42अतः अहाब खाने-पीने चला गया। परन्तु एलिय्याह कर्मेल की चोटी पर चढ़ गया, और भूमि पर गिर कर तथा अपना मुंह घुटनों के बीच करके

43अपने सेवक से बोला, “ऊपर चढ़ कर समुद्र की ओर ध्यान से देख।” तब सेवक ने ऊपर चढ़ कर ध्यान से देखा और कहा, “कुछ नहीं दिखता।” और उसने कहा, “फिर से जा।” उसने सात बार ऐसा ही कहा।

44और ऐसा हुआ कि सातवीं बार उसने आकर कहा, “देख, समुद्र में से मनुष्य के हाथ के समान एक छोटा सा बादल उठ रहा है।” तब एलिय्याह ने कहा, “अहाब के पास जाकर कह कि रथ जुतवा कर नीचे जा, कहीं ऐसा न हो कि तुझे भारी वर्षा के कारण रफ़कना पड़े।”

45और थोड़ी ही देर बाद ऐसा हुआ कि आकाश आंधी और बादलों से काला हो गया और भारी वर्षा होने लगी। और अहाब सवार होकर यिज्रेल को चला।

46तब यहोवा का हाथ एलिय्याह पर ऐसा रहा कि वह कमर बांध कर अहाब के आगे-आगे यिज्रेल तक दौड़ता चला गया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)