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पुराना नियम · 1 राजा · अध्याय 7 / 22

1 राजा 7

1औेर सुलैमान ने अपना भवन भी बनवाया, और उसे पूर्ण करने में तेरह वर्ष लगे।

2और उसने लेबनोन-वन नामक भवन बनाया; इसकी लम्बाई सौ हाथ, चौड़ाई पचास हाथ, और ऊंचाई तीस हाथ थी। उसमें देवदार के खम्भों की चार पंक्तियां थीं जिन पर देवदार की कड़ियां रखी गई थी।

3और पैंतालीस खम्भों के ऊपर देवदार की छत वाली कोठरियां बनीं अर्थात् एक-एक मंजिल में पन्द्रह।

4और तीनों मंजिलों में खिड़कियों की चौखटें लगी थी। तीनों मंजिलों में खिड़कियां आमने-सामने थी।

5द्वारों की चौखटें चौकोर थीं और तीनों मंजिलों में प्रत्येक खिड़की एक दूसरे के आमने-सामने थी।

6और उसने खम्भों वाला एक ओसारा भी बनवाया जिसकी लम्बाई पचास हाथ और चौड़ाई तीस हाथ की थी और इन खम्भों के सामने खम्भों वाला एक ओसारा और उनके सामने एक ड्योढ़ी बनाई।

7और उसने सिंहासन वाला एक बड़ा कक्ष बनाया जहां उसे न्याय करना था, अर्थात् न्याय का कमरा, और उसमें एक प़फ़र्श से दूसरे फ़र्श तक देवदार की तख़्ताबन्दी थी।

8और वह भवन जिसमें उसे रहना था वह उस बड़े कक्ष के भीतर के एक आंगन में बना; वह भी उसी प्रकार का था। फिर उसी कक्ष के सामने सुलैमान ने फि़रौन की बेटी के लिए जिसको उसने ब्याह लिया था, एक भवन बनाया।

9नींव से मुंडेर तक बाहर-भीतर सब कुछ अनमोल और गढ़े हुए पत्थरों से बना, जो नाप कर और आरों से चीर कर तैयार किए गए थे और बाहर के आंगन से बड़े आंगन तक लगाए गए थे।

10और नींव तो बहुमूल्य और बड़े-बड़े पत्थरों से अर्थात् दस-दस और आठ-आठ हाथ के पत्थरों से डाली गई थी।

11और ऊपर बहुमूल्य पत्थर अर्थात् नाप के अनुसार गढ़े हुए पत्थर और देवदार की लकड़ी लगी थी।

12और यहोवा के भवन के भीतर वाले आंगन और भवन के ओसारे के समान ही बड़े आंगन के चारों ओर गढ़े हुए पत्थरों के तीन रद्दे और देवदार की कड़ियों की एक परत थी।

13फिर राजा सुलैमान ने हीराम को सूर से बुलवा भेजा।

14वह नप्ताली के गोत्र की एक विधवा का बेटा था, और उसका पिता सूर वासी एक ठठेरा था। वह कांसे की सब प्रकार की कारीगरी में अति बुद्धिमान, समझदार और निपुण था। अतः उसने राजा सुलैमान के पास आकर उसका सब काम किया।

15उसने कांसे के अठारह-अठारह हाथ ऊंचे दो खम्भे बनाए। एक-एक की परिधि बारह हाथ थी।

16और उसने खम्भों के सिरों पर लगाने के लिए ढले हुए कांसे की दो कंगनियां भी बनाईं। एक-एक कंगनी की ऊंचाई पांच हाथ थी।

17खम्भों के सिरों पर की कंगनियों के लिए चौखाने की सात-सात जालियां और जंजीरों की सात-सात झालरें बनी।

18और उसने खम्भों को इस प्रकार बनाया कि खम्भों के सिरों पर की एक-एक कंगनी को ढांकने के लिए चारों ओर जालियों की एक-एक पंक्ति पर अनारों की दो-दो पक्तियां हो।

19ओसारे में खम्भों के सिरे पर सोसन के आकार की चार-चार हाथ ऊंची कंगनियां बनी थी।

20और एक-एक खम्भे के सिरे पर उस गोलाई के पास जो जाली से लगी थी एक-एक कंगनी बनी थी। प्रत्येक पर दो सौ अनार चारों ओर पंक्तियों में बने थे।

21उन खम्भों को उसने मन्दिर के ओसारे के पास खड़ा किया और दाहिनी ओर खम्भे को खड़ा करके उसका नाम याकीन रखा, फिर बाईं ओर खम्भा खड़ा करके उसका नाम बोअज रखा।

22खम्भों के सिरों पर सोमन के फूल का काम बना था। इस प्रकार खम्भों का काम पूरा हुआ।

23फिर उसने धातु को ढाल कर एक बड़ा हौज़ बनाया जो एक छोर से दूसरी छोर तक दस हाथ चौड़ा था। उसका आकार गोल था, और उसकी ऊंचाई पांच हाथ की और उसकी परिधि लगभग तीस हाथ की थी।

24और उसके किनारे के नीचे चारों ओर एक-एक हाथ पर दस-दस इन्द्रायन बने हुए थे जो हौज को घेरे थे। सबके साथ ढलाई के समय यह इन्द्रायन भी दो पंक्तियों में ढाले गए।

25यह बारह बैलों पर रखा गया था जिनमें से तीन उत्तर की ओर, तीन पश्चिम की ओर, तीन दक्षिण की ओर और तीन पूर्व की ओर मुंह किए हुए थे और उनके ऊपर हौज था और उन सबके पिछले अंग भीतर की ओर थे।

26और वह बित्ता भर मोटा था और इसका किनारा कटोरे के किनारे के समान अर्थात् सोसन के फूल के समान था। उसमें दो हज़ार बत पानी समाता था।

27फिर उसने कांसे के दस आधार बनाए। प्रत्येक आधार की लम्बाई चार हाथ, चौड़ाई चार हाथ, और ऊंचाई तीन हाथ थी।

28और उन आधारों की बनावट इस प्रकार थीः उनमें पटरियां थीं और उनके बीचोंबीच जोड़ थे।

29जोड़ों के बीचोंबीच पटरियों पर सिंह, बैल और करूब बने थे; और जोड़ों के ऊपर भी एक-एक आधार-पीठिका बनी थी, और सिंहों और बैलों के नीचे लटकते हुए हार बने थे।

30और प्रत्येक आधार के नीचे कांसे की धुरी के साथ कांसे के चार पहिये थे। और चारों पायों पर टेक थे। हौदी के नीचे ढले हुए टेकों के दोनों ओर झालरें थी।

31और इसका मुंह जो कंगनी के भीतर और ऊपर भी था वह एक हाथ ऊंचा था और उसका मुंह जिसकी चौड़ाई डेढ़ हाथ थी उसकी बनावट पाए के समान गोल थी। इसके मुंह पर नक्काशी की गई थी और उसकी पटरियां गोल नहीं, चौकोर थी।

32चारों पहिये पटरियों के नीचे थे और पहियों की धुरियां आधार से लगी थीं, और एक-एक पहिये की ऊंचाई डेढ़-डेढ़ हाथ की थी।

33पहियों की बनावट रथ के पहिये की-सी थी, और उनकी धुरियां, और उनके चक्र, और उनकी आरें, और उनकी नाभें सब ढले हुए थे।

34एक-एक आधार के चारों कोनों पर चार टेक थे और कंधे और आधार दोनों एक साथ ढले हुए थे।

35और एक-एक पाए के सिरे पर आधे हाथ ऊंची चारों ओर गोलाई थी, और पाए के सिरे पर की टेकें और पटरियां पाए के साथ ही ढले हुए थे।

36और टेकों के पाटों और पटरियों पर जितनी जगह थी उसमें उसने करूब और सिंह और खजूर के वृक्ष खोदकर बना दिए और चारों ओर झालर बनाए।

37इसी प्रकार उसने दसों पाए बनाए। सभी का एक ही सांचा, एक ही नाप, और एक ही आकार था।

38और उसने कांसे की दस हौदियां बनाईं। प्रत्येक हौदी में चालीस बत पानी समाता था। और प्रत्येक हौदी चार हाथ चौड़ी थी और दसों पायों में से प्रत्येक पर एक हौदी थी।

39और उसने पांच हौदियां भवन के दाहिनी ओर और पांच उसके बाईं ओर रख दी। और हौज़ को जो ढली हुई धातु का बना था, उसने भवन के दक्षिण की ओर दक्षिण-पूर्व दिशा में रख दिया।

40और हीराम ने हौदियों, फावड़ियों तथा कटोरों को भी बनाया। अतः हीराम ने राजा सुलैमान के लिए यहोवा के भवन में जितना काम था, सबको पूरा किया,

41अर्थात् दो खम्भे और उन कंगनियों की गोलाइयां जो दोनों खम्भों के सिरों पर थीं, और दोनों खम्भों के सिरों पर की गोलाइयों को ढांपने के लिए दो-दो जालियां,

42और दोनों जालियों के लिए चार-चार सौ अनार, अर्थात् खम्भों के सिरों पर जो गोलाइयां थीं उनको ढांपने के लिए एक-एक जाली में अनारों की दो-दो पंक्तियां,

43और दस पाए और इन पर की दस हौदियां,

44और एक हौज और उसके नीचे के बारह बैल,

45और हंडे, फावड़ियां और कटोरे, ये सब पात्र जिन्हें हीराम ने यहोवा के भवन के निमित्त राजा सुलैमान के लिए बनाया, चमकाए हुए कांसे के बने।

46राजा ने उनको यरदन की तराई में अर्थात् सुक्कोत और सारतान के मध्य की चिकनी मिट्टी में ढाला।

47और सुलैमान ने सब पात्रों को बिना तौले छोड़ दिया, क्योंकि वे बहुत अधिक थे। कांसे के वजन का अनुमान नहीं लगाया जा सका।

48सुलैमान ने यहोवा के भवन की सभी वस्तुएं बनाईं, अर्थात् सोने की वेदी और सोने की वह मेज़ जिस पर ‘भेंट की रोटी’ रखी जाती थी,

49और चोखे सोने की दीवटें जो भीतरी कोठरी के आगे दाहिनी ओर पांच, और बाईं ओर पांच रखी गईं, और सोने के फूल, दीपक और चिमटें,

50और चोखे सोने के कटोरेे, कैंचियां, तसले, धूपदान, और करछे, और भीतरी भवन अर्थात् परमपवित्र स्थान तथा भवन अर्थात् मन्दिर दोनों के दरवाजों के लिए सोने के कब्जे।

51इस प्रकार जो-जो काम राजा सुलैमान ने यहोवा के भवन के लिए किया, वह सब पूरा हुआ। तब सुलैमान ने अपने पिता दाऊद के अर्पण किए हुए सोने-चांदी के पात्रों को भीतर लाकर यहोवा के भवन के भंडारों में रख दिया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)