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पुराना नियम · 1 राजा · अध्याय 8 / 22

1 राजा 8

1तब सुलैमान ने इस्राएल के बड़े-बूढ़ों को और गोत्रों के सब मुखियों को जो इस्राएलियों के पूर्वजों के घरानों के प्रधान थे, यरूशलेम में एकत्रित किया कि वे यहोवा की वाचा का सन्दूक, दाऊद नगर अर्थात् सिय्योन से ऊपर ले आए।

2और सब इस्राएल पुरफ़ष एतानीम नामक सातवें महीने के पर्व के समय राजा सुलैमान के पास इकट्ठे हुए।

3जब सब इस्राएल पुरनिए आए तब याजकों ने वाचा का सन्दूक उठा लिया।

4और यहोवा का सन्दूक और मिलापवाला तम्बू और जितने पवित्र पात्र तम्बू में थे, उन सबको याजक और लेवीय ऊपर ले आए।

5और राजा सुलैमान और इस्राएलियों की समस्त मंडली के लोग जो उसके पास एकत्रित हुए थे वे सब वाचा के सन्दूक के सामने इतनी भेड़ें और बैल बलि कर रहे थे कि उनकी गिनती नहीं हो सकती थी।

6तब याजकों ने यहोवा की वाचा के सन्दूक को भवन के भीतर वाले उस स्थान में जो परमपवित्र स्थान है ले जाकर करूबों के पंखों के नीचे रख दिया,

7क्योंकि करूबों के पंख वाचा के सन्दूक पर फैले हुए थे, और वे ऊपर से सन्दूक और उसके डंडों को ढांपे हुए थे।

8डंडे तो इतने लम्बे थे कि उनके सिरे उस पवित्रस्थान से जो भीतरी पवित्रस्थान के सामने था दिखाई पड़ते थे, परन्तु बाहर से वे नहीं दिखते थे। वे आज तक वहीं है।

9सन्दूक में पत्थर की उन दो पटियों के सिवाय और कुछ नहीं था जिन्हें मूसा ने होरेब में उस समय रखा जब यहोवा ने इस्राएलियों के मिस्र से निकलने पर उनके साथ वाचा बांधी थी।

10और ऐसा हुआ कि जब याजक पवित्रस्थान से बाहर निकले तब यहोवा का भवन बादल से भर गया,

11अतः बादल के कारण याजक सेवा करने को खड़े न रह सके, क्योंकि यहोवा का तेज यहोवा के भवन में भर गया था।

12तब सुलैमान ने कहा, “यहोवा ने कहा है कि मैं घने बादल में निवास करूंगा।

13सचमुच मैंने तेरे लिए एक निवासस्थान वरन् ऐसा दृढ़ स्थान बनाया है जिसमें तू युगानुयुग बना रहे।”

14तब राजा ने इस्राएल की पूरी सभा की ओर घूमकर उसको आशीर्वाद दिया; उस समय पूरी सभा खड़ी थी।

15और उसने कहा, “धन्य है इस्राएल का परमेश्वर यहोवा, जिसने अपने मुंह से मेरे पिता दाऊद को यह वचन दिया था और अपने हाथ से उसे यह कहकर पूरा कियाः

16‘जिस दिन से मैं अपनी प्रजा इस्राएल को मिस्र से निकाल लाया तब से मैंने किसी इस्राएल गोत्र का कोई नगर नहीं चुना जिसमें मेरे नाम के निवास के लिए भवन बनाया जाए। परन्तु मैंने दाऊद को चुन लिया, कि वह मेरी प्रजा इस्राएल पर शासन करे।’

17मेरे पिता दाऊद की यह इच्छा तो थी कि इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के नाम का भवन बनाए।

18परन्तु यहोवा ने मेरे पिता दाऊद से कहा, ‘यह जो तेरी इच्छा है कि तू मेरे नाम का भवन बनाए, यह इच्छा भली तो है,

19फिर भी तू उस भवन को न बनाएगा, परन्तु तेरा निज पुत्र ही मेरे नाम का भवन बनाएगा।

20अब जो वचन यहोवा ने कहा था उसे उसने पूरा भी किया है, क्योंकि मैं अपने पिता दाऊद का स्थान पाकर यहोवा के वचन के अनुसार इस्राएल की गद्दी पर विराजमान हूं और मैंने इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के नाम से इस भवन को बनाया है।

21और इसमें मैंने एक स्थान उस सन्दूक के लिए ठहराया है जिसमें यहोवा की वह वाचा है जो उसने हमारे पूर्वजों से मिस्र देश के निकाल ले आने के समय बांधी थी।”

22तब सुलैमान ने इस्राएल की समस्त मंडली की उपस्थिति में यहोवा की वेदी के सामने खड़े होकर अपने हाथ स्वर्ग की ओर फैलाए।

23और उसने कहा, “हे यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर, तेरे समान न तो ऊपर स्वर्ग में, और न नीचे पृथ्वी पर कोई ईश्वर हैः तू अपने उन दासों के प्रति, जो अपने सम्पूर्ण मन से तेरे सम्मुख चलते हैं, अपनी वाचा पूरी करता, और करफ़णा करता रहता है।

24जो वचन तूने अपने दास मेरे पिता दाऊद को दिया था, उसका तूने पालन किया है। जैसा तूने अपने मुंह से कहा था निश्चय वैसा ही अपने हाथ से पूरा भी किया, जैसा कि आज है।

25इसलिए अब हे यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर, इस वचन को पूरा कर जो तूने अपने दास मेरे पिता दाऊद को दिया था, ‘यदि तेरे वंशज अपने चालचलन की चौकसी करें और जैसे तू मेरे सम्मुख चलता आया है वैसे ही वे भी चलें तो तेरे कुल में इस्राएल की गद्दी पर विराजने वाले की कमी न होगी।’

26इसलिए अब हे इस्राएल के परमेश्वर, अपना जो वचन तूने अपने दास मेरे पिता दाऊद को दिया था उसे सच्चा सिद्ध कर।

27“परन्तु क्या परमेश्वर सचमुच पृथ्वी पर वास करेगा? देख, मेरे बनाए हुए भवन में तो क्या, तू तो स्वर्ग में वरन् सबसे ऊंचे स्वर्ग में भी नहीं समाता।

28फिर भी, हे यहोवा, मेरे परमेश्वर, अपने दास की प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट की ओर ध्यान दे और मेरी चिल्लाहट और प्रार्थना को सुन जो तेरा दास आज तेरे सामने कर रहा है;

29कि रात दिन तेरी आंखें इस भवन की ओर लगी रहें अर्थात् इसी स्थान की ओर, जिसके लिए तू ने कहा, ‘मेरा नाम वहां रहेगा,’ जिससे कि जो प्रार्थना तेरा दास इस स्थान की ओर करे उसे तू सुन ले।

30और तू अपने दास और अपनी प्रजा इस्राएल की प्रार्थना जिसको वे इस स्थान की ओर गिड़गिड़ा कर करें उसे सुनना, वरन् अपने निवासस्थान स्वर्ग में से सुनना, और सुनकर क्षमा करना।

31“यदि कोई व्यक्ति अपने पड़ोसी के विरफ़द्ध पाप करे और उसे शपथ खिलाई जाए, और वह आकर इस भवन में तेरी वेदी के सामने शपथ खाए,

32तब तू स्वर्ग में सुनकर कार्यवाही करके अपने दासों का न्याय चुकाना, अर्थात् दुष्ट को दुष्ट ठहराना और उसकी चाल उसी के सिर लौटा देना और निर्दोष का न्याय उसकी सच्चाई के अनुसार करके उसे निर्दोष ठहराना।

33फिर जब तेरी प्रजा इस्राएल तेरे विरफ़द्ध पाप करने के कारण अपने शत्रुओं से हार जाए, और तेरी ओर फिर कर तेरा नाम ले और इस भवन में गिड़गिडाकर तुझसे प्रार्थना करे,

34तब तू स्वर्ग से सुनकर अपनी प्रजा इस्राएल का पाप क्षमा करना और उन्हें इस देश में लौटा ले आना जिसे तूने उनके पूर्वजों को दिया था।

35“जब तेरे विरफ़द्ध पाप करने के कारण आकाश बन्द हो जाए और वर्षा न हो और तेरे दुख देने के कारण वे इस स्थान की ओर प्रार्थना करके तेरे नाम को मानें और अपने पापों से फिरें,

36तब तू स्वर्ग से सुनकर अपने दासों और अपनी प्रजा इस्राएल के पाप क्षमा करना, निश्चय तू उन्हें भला मार्ग सिखा जिस पर उन्हें चलना चाहिए। और अपने इस देश पर जिसे तूने अपनी प्रजा को उत्तराधिकार में दिया है, पानी बरसाना।

37“यदि देश में अकाल, मरी, झुलस, गेरफ़ई, टिड्डियां या टिड्डे हों; या उनके शत्रु उनके देश के नगरों में उन्हें घेर लें अर्थात् वहां कोई विपत्ति या रोग क्यों न हो;

38तब यदि कोई मनुष्य या तेरी प्रजा इस्राएल के सब लोग अपने-अपने मन का दुख जान कर, गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करें और अपने अपने हाथ इस भवन की ओर फैलाएं,

39तब तू अपने निवासस्थान स्वर्ग में सुनकर क्षमा करना और ऐसा करना कि एक-एक को, जिसका मन तू जानता ही है, उसके प्रत्येक कार्य का फल देना क्योंकि केवल तू ही सब मनुष्यों के मनों को जानता है।

40तब वे जितने दिन तक इस देश में रहें, जिसे तूने हमारे पूर्वजों को दिया था, उतने दिन तक वे तेरा भय मानते रहे।

41“परदेशी भी, जो तेरी प्रजा इस्राएल का न हो जब वह दूर देश से तेरे नाम के कारण आए-

42क्योंकि वे तेरे महान् नाम, सामर्थी हाथ और बढ़ाई हुई भुजा के बारे में अवश्य सुनेंगे-जब ऐसा कोई आए और इस भवन की ओर प्रार्थना करे,

43तब तू अपने निवासस्थान स्वर्ग में सुनना और जिन बातों के लिए ऐसा परदेशी तुझे पुकारे उन सबके अनुसार करना जिससे पृथ्वी के सब लोग तेरे नाम को जानें और तेरी प्रजा इस्राएल के समान तेरा भय मानें, और यह भी जानें कि यह भवन जिसे मैंने बनाया है, वह तेरे ही नाम का कहलाता है।

44“जब तेरी प्रजा के लोग, जहां कहीं तू उन्हें भेजे वहां अपने शत्रुओं से युद्ध करने को जाएं और इसकी ओर जिसे तूने चुना है और इस भवन की ओर जिसे मैंने तेरे नाम पर बनाया है, यहोवा से प्रार्थना करें,

45तब तू स्वर्ग में उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनकर उनकी ओर से लड़ना।

46“जब वे तेरे विरफ़द्ध पाप करें- निष्पाप तो कोई भी मनुष्य नहीं है-और तू उन पर कोप करके उन्हें शत्रुओं के हाथ में कर दे और वे उनको बन्धुवा बना कर अपने देश, चाहे वह दूर हो या पास, ले जाएं,

47और यदि वे बन्धुवाई के देश में, अपने आपे में आकर पश्चात्ताप करें और अपने बन्धुवा करने वालों के देश में गिड़गिड़ाकर तुझसे विनती करें, ‘हमने पाप और अधर्म किया है तथा दुष्टता की है,’

48और यदि वे अपने उन शत्रुओं के देश में जो उन्हेंं बन्धुवा करके ले गए हों, अपने सम्पूर्ण मन और सम्पूर्ण प्राण से तेरी ओर फिरें और अपने इस देश की ओर जो तूने उनके पूर्वजों को दिया था, और इस नगर की ओर जिसे तूने चुना है, और इस भवन की ओर जिसे मैंने तेरे नाम का बनाया है, तुझसे प्रार्थना करें,

49तो तू अपने निवासस्थान स्वर्ग में उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनना; और उनकी ओर से लड़ना,

50और अपनी प्रजा के लोगों के पाप जो उन्होंने तेरे विरफ़द्ध किए हों और जो अपराध उन्होनें तेरे विरफ़द्ध किए हों, क्षमा करना और उनके बन्धुवा करने वालों की दृष्टि में उन्हें दया का पात्र बनाना जिससे कि वे उन पर दया करें,

51क्योंकि वे तो तेरी प्रजा और तेरा निज भाग हैं, जिन्हें तू लोहे के भट्ठे में से अर्थात् मिस्र से निकाल लाया है।

52तेरी आंखें तेरे दास की गिड़गिड़ाहट और तेरी प्रजा इस्राएल की गिड़गिड़ाहट की ओर ऐसी लगी रहें कि जब-जब वे तुझे पुकारें, तब-तब तू उनकी सुन ले।

53क्योंकि हे प्रभु यहोवा, तूने इन लोगों को अपना निज भाग होने के लिए पृथ्वी की सब जातियों से अलग किया है, जैसा कि तूने हमारे पूर्वजों को मिस्र से निकालने के समय अपने दास मूसा के द्वारा वचन देकर कहा था।”

54अब सुलैमान तो घुटने टेके और आकाश की ओर हाथ फैलाए हुए था। और ऐसा हुआ कि जब वह यहोवा से यह सब प्रार्थना गिड़गिड़ाहट के साथ कर चुका तब वह यहोवा की वेदी के सामने से उठा,

55और उसने खड़े होकर इस्राएल की समस्त मंडली को ऊंचे स्वर से यह कह कर आशीर्वाद दिया,

56“धन्य हो यहोवा! जिसने अपनी समस्त प्रतिज्ञाओं के अनुसार अपनी प्रजा इस्राएल को विश्राम दिया; जो-जो भली प्रतिज्ञाएं उसने अपने दास मूसा के द्वारा की थीं उनमें से एक भी बात पूरी हुए बिना नहीं रही।

57हमारा परमेश्वर यहोवा जैसे हमारे पूर्वजों के साथ रहता था वैसे ही हमारे साथ भी रहे; वह हमको छोड़ न दे और न हम को त्याग दे।

58वह हमारे मन अपनी ओर ऐसा फेर कर रखे कि हम उसके सब मार्गों पर चला करें और उसकी आज्ञाएं, विधियां और नियम जो उसने हमारे पूर्वजों को दिए थे, माना करे।

59और मेरी ये बातें जिनकी मैंने यहोवा के सामने विनती की है, वे दिन रात यहोवा हमारे परमेश्वर के निकट बनी रहें कि वह प्रतिदिन की आवश्यकता के अनुसार अपने दास और अपनी प्रजा इस्राएल की ओर से लड़े,

60जिससे पृथ्वी की सब जातियां जान लें कि यहोवा ही परमेश्वर है, और कोई दूसरा नही।

61इसलिए तुम्हारा मन हमारे परमेश्वर यहोवा की ओर ऐसी पूरी रीति से लगा रहे कि आज के समान उसकी विधियों पर चलते और उसकी आज्ञाएं मानते रहो।”

62तब राजा और उसके साथ समस्त इस्राएल ने यहोवा के सम्मुख बलिदान चढ़ाए।

63और सुलैमान ने यहोवा के लिए मेलबलि के रूप में बाईस हजार बैल और एक लाख बीस हजार भेड़ें बलि की। इस प्रकार राजा और सब इस्राएलियों ने यहोवा के भवन का अर्पण किया।

64उसी दिन राजा ने यहोवा के भवन के सामने वाले आंगन के मध्य भाग को पवित्र किया और उसने वहां होमबलि, अन्नबलि और मेलबलियों की चरबी चढ़ाई; क्योंकि कांसे की जो वेदी यहोवा के सामने थी वह होमबलि, अन्नबलि और मेलबलियों की चरबी के लिए बहुत छोटी थी।

65अतः सुलैमान ने और उसके साथ समस्त इस्राएल की एक बड़ी सभा ने जो हमात के दर्रे से लेकर मिस्र के नाले तक के सब देशों से इकट्ठी हुई थी, सात दिन वरन् और सात दिन अर्थात् चौदह दिन तक हमारे परमेश्वर यहोवा के सामने पर्व मनाया।

66अगले दिन उसने प्रजा के लोगों को विदा किया और उन्होंने राजा को धन्य कहा। फिर वे उस सब भलाई के कारण जो यहोवा ने अपने दास दाऊद और अपनी प्रजा इस्राएल से की थी, आनन्दित और मग्न होकर अपने-अपने डेरे को चले गए।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)