पुराना नियम · 1 शमूएल · अध्याय 20 / 31
1 शमूएल 20
1फिर दाऊद रामा के नायोत से भागकर योनातान के पास आया, और उसने उससे कहा, “मैंने क्या किया है? मेरा क्या अपराध है? तेरे पिता के सामने मेरा पाप क्या है कि वह मेरे प्राण के पीछे पड़ गया है?”
2उसने उसे उत्तर दिया, “नहीं, ऐसा बिलकुल नही। तू नहीं मरेगा। सुन, मेरा पिता मुझे बताए बिना कोई भी बड़ा अथवा छोटा कार्य नहीं करता, तो वह इस बात को मुझसे क्यों छिपाएगा? ऐसी कोई बात नहीं है।”
3फिर भी दाऊद ने पुनः शपथ खाकर कहा, “तेरा पिता जानता है कि मुझ पर तेरी कृपा-दृष्टि है, और उसने कहा है, ‘यह बात योनातान जानने न पाए, नहीं तो उसे दुःख होगा।’ परन्तु सचमुच, यहोवा के जीवन की शपथ और तेरे जीवन की शपथ, तू निश्चय जान कि मेरे और मृत्यु के बीच एक ही कदम का अन्त रह गया है।”
4तब योनातान ने दाऊद से कहा, “तू मुझसे जो कहे वही मैं तेरे लिए करूंगा।”
5अतः दाऊद ने योनातान से कहा, “सुन, कल नया चांद होगा। और मुझे राजा के साथ भोजन के लिए बैठना आवश्यक है। परन्तु मुझे जाने दे कि मैं तीसरे दिन संध्या तक मैदान में छिपा रहू।
6यदि कहीं तेरा पिता मुझे स्मरण करे तो कहना, ‘दाऊद ने अपने नगर बैतलहम को शीघ्र जाने के लिए मुझसे गिड़गिड़ाकर छुट्टी मांगी क्योंकि वहां उसके पूरे परिवार के लिए वार्षिक बलिदान का समय है।’
7यदि वह कहे, ‘ठीक है’ तब तो तेरा दास सुरक्षित रहेगा। परन्तु यदि वह अत्यधिक क्रोधित हो जाए तो समझ लेना कि उसने बुराई ही ठानी है।
8तब तू अपने दास के साथ कृपा का व्यवहार करना, क्योंकि तू ने अपने दास को यहोवा की शपथ खिलाकर अपने साथ वाचा बान्धी है। परन्तु यदि मेरा कोई अपराध हो तो तू स्वयं मुझे मार डाल, तू क्यों मुझे अपने पिता के हाथ में दे?”
9योनातान ने कहा, “ऐसा कभी न हो! यदि मैं सचमुच जान लेता कि मेरे पिता ने तेरे साथ बुराई ही ठानी है तो क्या मैं तुझे नहीं बताता?”
10तब दाऊद ने योनातान से कहा, “यदि तेरा पिता तुझे कठोरता से उत्तर दे तो कौन मुझे बताएगा?”
11योनातान ने दाऊद से कहा, “चल, हम दोनों मैदान में निकल चले।” तब वे दोनों मैदान में चले गए।
12तब योनातान ने दाऊद से कहा, “इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की शपथ, कल या परसों इसी समय जब मैं अपने पिता का भेद पाऊं, तब यदि दाऊद की भलाई देखूं तो क्या मैं किसी को भेजकर तुझे न बताऊंगा?
13यदि मेरा पिता तेरी हानि चाहे और मैं तुझे न बताऊं, और तुझे सुरक्षित न भेज दूं तो यहोवा योनातान से वैसा ही, वरन् उससे भी अधिक करे। अब यहोवा तेरे साथ वैसा ही रहे जैसा वह मेरे पिता के साथ रहा है।
14और यदि मैं जीवित बचा रहूं तो क्या तू मुझ पर यहोवा की सी करुणा नहीं दिखलाएगा कि मैं न मरूं?
15और तू मेरे घराने पर से अपनी कृपा-दृष्टि कभी न हटाना, हां, तब भी नहीं, जब यहोवा दाऊद के शत्रुओं में से एक-एक को पृथ्वी पर से नाश कर चुके।”
16इस प्रकार योनातान ने दाऊद के घराने के साथ यह कहकर वाचा बांधी, “यहोवा, दाऊद के शत्रुओं से बदला ले।”
17और योनातान ने दाऊद के प्रति अपने प्रेम के कारण उसे पुनः शपथ खिलाई क्योंकि वह उससे अपने ही प्राण के बराबर प्रेम करता था।
18फिर योनातान ने उससे कहा, “कल नया चांद है। और तब तेरी अनुपस्थिति प्रकट होगी, क्योंकि तेरा आसन खाली रहेगा।
19तीन दिन तक छिपे रहने के बाद तू फुर्ती से उस स्थान पर चले आना, जहां तू उस घटना के दिन छिपा था, और एजेल नामक पत्थर के पास ठहरे रहना।
20तब मैं उसके पास मानो अपने किसी ठहराए हुए चिह्न पर तीन तीर चलाऊंगा।
21और देख, मैं लड़के को यह कहकर, भेजूंगा ‘जा, तीरों को खोज ला’। यदि मैं लड़के से विशेष रूप से कहूं, ‘देख, तीर तेरे इस ओर हैं, जा ले आ’ तब तू आ जाना, क्योंकि यहोवा के जीवन की शपथ, तेरे लिए सुरक्षा ही है, और कोई हानि नहीं है।
22परन्तु यदि मैं लड़के से कहूं, ‘देख, तीर तेरे उस पार हैं’ तब तू चले जाना, क्योंकि यहोवा ने तुझे विदा किया है।
23फिर उस वाचा के सम्बन्ध में जिसकी चर्चा मैंने और तूने की है, देख, यहोवा तेरे और मेरे बीच सदा-सर्वदा रहे।”
24अतः दाऊद मैदान में छिप गया। और जब नया चांद हुआ तब राजा भोजन करने के लिए बैठा।
25राजा तो सदा के समान दीवाल के पास अपने आसन पर बैठा, तब योनातान खड़ा हुआ, और अब्नेर शाऊल के पास बैठा, परन्तु दाऊद का आसन खाली रहा।
26तोभी शाऊल ने उस दिन कुछ नहीं कहा, क्योंकि उसने सोचा, “यह एक संयोग की बात होगी, वह शुद्ध नहीं, निश्चय वह शुद्ध नहीं है।”
27फिर नए चांद के दूसरे दिन भी दाऊद का आसन खाली रहा। अतः शाऊल ने अपने पुत्र, योनातान से कहा, “क्या कारण है कि यिशै का पुत्र भेाजन पर न कल आया, न आज?”
28तब योनातान ने शाऊल को उत्तर दिया, “दाऊद ने बैतलहम जाने के लिए मुझसे गिड़गिड़ा कर छुट्टी मांगी थी।
29उसने कहा था ‘मुझे जाने दे क्योंकि हमारे घराने ने नगर में बलिदान का आयोजन किया है, और मेरे भाई ने उसमें सम्मिलित होने की आज्ञा दी है। अब, यदि मुझ पर तेरी कृपा-दृष्टि हो तो मुझे जाने दे, कि मैं अपने भाइयों से भेंट कर सकू।’ इसी कारण वह राजा की मेज़ पर नहीं आया है।”
30तब शाऊल का क्रोध योनातान पर भड़क उठा, और उसने उससे कहा, “हे विद्रोही कुटिल स्त्री के पुत्र! क्या मैं नहीं जानता कि तू स्वयं अपनी तथा अपनी माता की नग्नता की लज्जा के लिए यिशै के पुत्र को चुन रहा है?
31क्योंकि जब तक यिशै का पुत्र पृथ्वी पर रहता है तब तक न तू, न तेरा राज्य स्थापित हो सकता है। इसलिए, अब दूतों को भेजकर उसे मेरे पास ला, क्योकि उसे निश्चय मरना है।”
32परन्तु योनातान ने अपने पिता, शाऊल से उत्तर में कहा, “वह क्यों मार डाला जाए? उसने क्या किया है?”
33यह सुन शाऊल ने अपना भाला उसी पर फेंका कि उसे मार गिराए। इससे योनातान ने जान लिया कि मेरे पिता ने दाऊद को मार डालने का निर्णय कर लिया है।
34तब योनातान भयानक क्रोध में मेज़ से उठ गया, और नए चांद के दूसरे दिन भोजन ही नहीं किया, क्योंकि वह दाऊद के कारण दुखित था, क्योंकि उसके पिता ने उसका अनादर किया था।
35प्रातःकाल ऐसा हुआ कि योनातान दाऊद को दिए हुए वचन के अनुसार मैदान में निकल गया। एक छोटा लड़का भी उसके साथ था।
36उसने अपने लड़के से कहा, “दौड़, और जो तीर मैं छोडूंगा उन्हें खोज कर लाना।” जब लड़का दौड़ ही रहा था तब उसने एक तीर छोड़ा जो उसके आगे निकल गया।
37योनातान ने जो तीर छोड़ा था उस तीर के स्थान पर वह लड़का पहुंचा ही था कि योनातान ने लड़के को पीछे से पुकार कर कहा, “क्या तीर तेरे उस ओर नहीं है?”
38तब योनातान ने लड़के को पीछे से पुकारा और कहा, “जल्दी! फुर्ती कर! मत ठहर!” योनातान का लड़का तीर उठाकर अपने स्वामी के पास आ गया।
39परन्तु लड़का कोई भेद नहीं जानता था। उसका भेद तो योनातान और दाऊद ही जानते थे।
40तब योनातान ने अपने तीर-कमान लड़के को थमा दिए, और उससे कहा, “जा, नगर में पहुंचा दे।”
41जब लड़का चला गया तब दाऊद दक्षिण की ओर से उठा, और मुंह के बल भूमि पर गिरा, और तीन बार दण्डवत् प्रमाण किया। फिर उन्होंने एक दूसरे को चूमा, और परस्पर रोए, परन्तु दाऊद बहुत रोया।
42अन्त में योनातान ने दाऊद से कहा, “सुरक्षित जा। हमने यहोवा के नाम में एक दूसरे से शपथ खाई है कि ‘यहोवा मेरे और तेरे बीच और मेरे और तेरे वंशजों के बीच सदा-सर्वदा रहेगा’।” तब वह उठकर चला गया, और योनातान नगर मे लौट आया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)