पुराना नियम · 1 शमूएल · अध्याय 25 / 31
1 शमूएल 25
1तब शमूएल की मृत्यु हो गई। समस्त इस्राएल एकत्रित हुआ और उसके लिए शोक मनाया, और उसके घर रामा में ही उसको मिट्टी दी। और दाऊद उठकर पारान के जंगल में चला गया।
2माओन में एक व्यक्ति रहता था जिसका व्यवसाय कर्मेल में था और वह बड़ा धनवान था। उसके पास तीन हज़ार भेड़ें और एक हज़ार बकरियां थी। ऐसा हुआ कि वह कर्मेल में अपनी भेड़ों का ऊन कतर रहा था।
3उस व्यक्ति का नाम नाबाल, तथा उसकी पत्नी का नाम अबीगैल था। वह स्त्री तो बुद्धिमान् और देखने में सुन्दर थी, परन्तु पुरुष कठोर और व्यवहार में दुष्ट था। वह कालेबवंशी था।
4दाऊद ने जंगल में सुना कि नाबाल अपनी भेड़ों का ऊन कतर रहा है।
5अतः दाऊद ने दस जवानों को वहां भेजा। और दाऊद ने उन जवानों से कहा, “तुम कर्मेल जाओ, और नाबाल से मिलकर मेरा अभिवादन कहो।
6तुम उससे ऐसा कहना, ‘दीर्घायु हो! तुझे, शान्ति मिले, तेरे घराने को शान्ति मिले और जो कुछ तेरा है, सब पर शान्ति हो।
7मैंने सुना है कि तेरे पास ऊन कतरने वाले आए हुए है। देख, तेरे चरवाहे हमारे साथ थे, और हमने उनका अपमान नहीं किया, और जितने दिन वे कर्मेल में रहे उनका कुछ भी नहीं खोया।
8अपने जवानों से पूछ, वे तुझे बताएंगे। इसलिए मेरे जवानों पर तेरी कृपा-दृष्टि हो क्योंकि हम आनन्द के समय तेरे पाए आए है। कृपा कर अपने इन दासों को तथा अपने पुत्र, दाऊद को जो कुछ तेरे हाथ लगे, उसे खुशी से दे’।”
9दाऊद के जवानों ने जाकर नाबाल को दाऊद के नाम से वे वचन कह सुनाए। फिर वे ठहरे रहे।
10तब नाबाल ने दाऊद के सेवकों को उत्तर दिया, “दाऊद कौन है? और यिशै का पुत्र कौन है? आज कल बहुत से सेवक हैं जो अपने स्वामियों के पास से भाग जाते है।
11क्या मैं अपनी रोटी और पानी और मांस, जो मैंने अपने ऊन कतरने वालों के लिए तैयार किया है, ऐसे लोगों को दे दूं जिनको मैं नहीं जानता कि वे कहां के हैं?”
12अतः दाऊद के जवान अपने मार्ग पर लौट गए और लौटकर उसको ये सब बातें ज्यों की त्यों सुना दी।
13तब दाऊद ने अपने साथियों से कहा, “अपनी-अपनी तलवार बांध लो।” अतः प्रत्येक ने अपनी तलवार बांध ली, और दाऊद ने भी अपनी तलवार बांध ली। इस प्रकार लगभग चार सौ पुरुष दाऊद के साथ निकले, और दो सौ सामान के पास रहे।
14परन्तु एक जवान ने नाबाल की पत्नी अबीगैल को बताया, “दाऊद ने जंगल से दूतों को हमारे स्वामी का अभिवादन करने के लिए भेजा था, पर स्वामी ने उनका तिरस्कार किया है।
15परन्तु उन लोगों ने हमारे साथ अच्छा व्यवहार किया था। और जितने दिन हम मैदानों में रहते हुए उनके पास आया-जाया करते थे उतने दिन न तो हमारा अपमान हुआ और न ही कुछ खोने पाया।
16जितने दिन हम उनके साथ रहकर अपनी भेड़-बकरियां चराते रहे, वे रात-दिन हमारी आड़ बने रहे।
17इसलिए अब विचार करके देख कि क्या करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने हमारे स्वामी और उसके घराने के विरुद्ध अनिष्ट की योजना बनाई है। वह तो ऐसा लुच्चा है कि कोई उससे बात भी नहीं कर सकता।”
18तब अबीगैल ने फुर्ती से दो सौ रोटी, दो कुप्पे दाखमधु, पांच भेड़ों का पका हुआ मांस, पांच सआ भुना हुआ अनाज और किशमिश के एक सौ गुच्छे, और अंजीर की दो सौ टिकियां लेकर गदहों पर लदवाईं।
19फिर उसने अपने जवानों से कहा, “मेरे आगे आगे जाओ। देखो, मैं तुम्हारे पीछे-पीछे आ रही हू।” परन्तु उसने अपने पति नाबाल को कुछ नहीं बताया।
20और ऐसा हुआ कि अपने गदहे पर सवार जब वह पर्वत की आड़ से उतर रही थी तो देखो, दाऊद और उसके साथी भी उसी की ओर उतरे चले आ रहे थे। अतः उनकी भेंट हो गई।
21दाऊद ने कहा था, “निश्चय, मैंने व्यर्थ ही जंगल में इस व्यक्ति की सारी सम्पत्ति की रक्षा की है जिससे उसका कुछ भी खोने नहीं पाया। पर इसने तो मेरी भलाई का बदला बुराई से दिया है।
22यदि मैं प्रातःकाल तक उसके सब लोगों में से एक लड़के को भी जीवित छोड़ दूं तो यहोवा मुझ दाऊद के सब शत्रुओं के साथ ऐसा ही, वरन् इससे भी अधिक करे।”
23जब अबीगैल ने दाऊद को देखा तब वह शीघ्र ही गदहे पर से उतर पड़ी, और दाऊद के सामने भूमि पर मुंह के बल गिरी और उसको दण्डवत् किया!
24तब उसके चरणों पर गिरकर उसने कहा, “मेरे स्वामी, सारा दोष मुझ पर ही हो। अपनी दासी को कुछ कहने दे, और अपनी दासी के वचनों को सुन ले।
25मेरा स्वामी, उस लुच्चे नाबाल के वचनों पर ध्यान न दे, क्योंकि जैसा उसका नाम है वैसा ही वह है। उसका नाम नाबाल है, और सचमुच उसमें मूर्खता पाई जाती है। मैं, तेरी दासी तो मेरे स्वामी के भेजे हुए जवानों को देख तक न पाई।
26इसलिए, मेरे स्वामी, अब यहोवा के जीवन की शपथ, और तेरे जीवन की शपथ, जबकि यहोवा ने तुझे खून बहाने से तथा अपने ही हाथों से अपना बदला लेने से रोका है, अब तेरे सब शत्रु, और मेरे स्वामी के सब हानि चाहने वाले नाबाल के समान ठहरे।
27और अब यह भेंट, जो तेरी दासी अपने स्वामी के लिए लाई है, उन जवानों को दी जाए जो मेरे प्रभु के पद-चिह्नों पर चलते है।
28कृपया, अपनी दासी का अपराध क्षमा कर, क्योंकि निश्चय यहोवा मेरे स्वामी के लिए चिरस्थाई घर बनाएगा, क्योंकि मेरा स्वामी यहोवा के युद्ध लड़ता है, तथा जीवन-भर तुझमें कोई बुराई नहीं पाई जाएगी।
29यदि कोई तेरा पीछा करने को उठे, और तेरे प्राण की खोज में रहे तो तुझ मेरे स्वामी का प्राण तेरे परमेश्वर यहोवा के द्वारा जीवितों की गठरी में बांधकर रखा जाएगा; परन्तु तेरे शत्रुओं के प्राणों को मानो गोफन में रखकर फेंक देगा।
30और ऐसा होगा कि जब यहोवा, मेरे प्रभु के लिए वे सब भलाई करेगा जो उसने तेरे विषय कही हैं, और तुझे इस्राएल पर शासक नियुक्त करेगा।
31तब मेरे प्रभु को इस कारण न पश्चात्ताप होगा और न हार्दिक वेदना होगी कि तू ने अकारण खून बहाया, और अपना बदला अपने हाथो लिया। फिर जब यहोवा मेरे प्रभु का भला करे तब तू अपनी दासी को स्मरण करना।”
32तब दाऊद ने अबीगैल से कहा, “धन्य हो इस्राएल का परमेश्वर यहोवा जिसने आज के दिन तुझको मुझसे भेंट करने भेजा!
33धन्य है तेरी बुद्धिमानी! और तू स्वयं धन्य हो, जिनसे आज के दिन मुझे खून बहाने से तथा अपना बदला अपने हाथों लेने से रोका है।
34क्योंकि इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के जीवन की शपथ जिसने मुझे तेरी हानि करने से रोका है, यदि तू शीघ्र ही मुझसे भेंट करने न आई होती तो कल प्रातःकाल तक नाबाल का एक लड़का भी न बच पाता।”
35अतः जो वह लेकर आई थी उसे ग्रहण करके दाऊद ने कहा, “अपने घर शान्ति से जा। देख, मैंने तेरी बात मानी है, और तेरी विनती स्वीकार की है।”
36तब अबीगैल ने नाबाल के पास लौटकर देखा, कि वह घर में राजा का-सा भोज कर रहा है और नशे में चूर, तथा आनन्दमग्न है। अतः उसने भोर होने तक उसे कुछ न बताया।
37प्रातःकाल जब नाबाल का नशा उतरा। तब उसकी पत्नी ने उसे सब कुछ बताया। जिससे उसका हियाव जाता रहा और वह पत्थर-सा सुन्न पड़ गया।
38दस दिन के बाद, यहोवा का हाथ नाबाल पर ऐसा पड़ा कि वह मर गया।
39जब दाऊद ने सुना कि नाबाल की मृत्यु हो गई है, तब उसने कहा, “धन्य हो यहोवा जो नाबाल द्वारा मेरे अपमान का मुकदमा लड़ा और जिसने अपने दास को बुराई से रोका है! यहोवा ने नाबाल की बुराई को उसी पर लौटा दिया है।” इसके पश्चात् दाऊद ने अबीगैल के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा।
40जब दाऊद के सवेक कर्मेल में अबीगैल के पास पहुंचे, तो उन्होंने उससे कहा, “दाऊद ने हमको तेरे पास भेजा है कि हम तुझको उसकी पत्नी होने के लिए ले चले।”
41तब वह उठी और दण्डवत् करके बोली, “देख, तेरी दासी तो अपने स्वामी के सेवकों के पांव धोने वाली दासी है।”
42फिर अबीगैल फुर्ती से उठी, और गदहे पर सवार होकर सेवा करने वाली अपनी पांच सहेलियों के साथ दाऊद के दूतों के पीछे गई, और उसकी पत्नी हो गई।
43दाऊद ने यिज्रेली अहीनोअम को भी ब्याह लिया, और वे दोनों उसकी पत्नियां हुईं।
44शाऊल ने अपनी पुत्री, दाऊद की पत्नी, मीकल को लैश के पुत्र, गल्लीमवासी पलती की पत्नी होने के लिए दे दिया था।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)