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नया नियम · 1 तीमुथियुस · अध्याय 2 / 6

1 तीमुथियुस 2

1अब सब से पहिले मेरा अनुरोध यह है कि विनतियां और प्रार्थनाएं, निवेदन तथा धन्यवाद सब मनुष्यों के लिए अर्पित किए जाएं,

2विशेज रूप से राजाओं और सब पदाधिकारियों के लिए, जिससे कि हम चैन और शान्ति सहित, पूर्ण भक्ति तथा गम्भीरता के साथ जीवन व्यतीत कर सके।

3यह हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर की दृष्टि में भला और ग्रहणयोग्य है,

4जो यह चाहता है कि सब लोग उद्धार प्राप्त करें और सत्य को जाने।

5क्योंकि परमेश्वर एक ही है और परमेश्वर तथा मनुष्यों के बीच एक ही मध्यस्थ भी है, अर्थात् मसीह यीशु, जो मनुष्य है।

6जिसने अपने आपको सब की फिरौती के दाम में दे दिया और इसकी साक्षी उचित समय पर दी गई।

7मैं सत्य कहता हूं, झूठ नहीं बोलता, कि इसी अभिप्राय से मैं प्रचारक, प्रेरित और ग़ैरयहूदियों के लिए विश्वास और सत्य का उपदेशक ठहराया गया।

8इसलिए मैं चाहता हूं कि हर स्थान पर पुरफ़ज, बिना क्रोध और विवाद के, पवित्र हाथों को उठा कर प्रार्थना करे।

9इसी प्रकार स्त्रियां भी शालीनता और सादगी के साथ उचित वस्त्रों से अपने आप को सुसज्जित करे। वे बाल गूंथने और सोने या मोतियों या बहुमूल्य वस्त्रों से नहीं,

10वरन् अपने को भले कार्यों से संवारें जैसा कि उन स्त्रियों को शोभा देता है जो अपने आप को भक्तिन कहती है।

11प्रत्येक स्त्री चुपचाप और सम्पूर्ण अधीनता से शिक्षा ग्रहण करे।

12मैं यह अनुमति नहीं देता कि स्त्री उपदेश दे या पुरफ़ज पर अधिकार जताएः वह चुप रहे।

13क्योंकि आदम पहिले और हव्वा बाद में बनाई गई।

14आदम बहकावे में न आया, परन्तु स्त्री अधिक बहकावे में आकर अपराधिनी हुई।

15परन्तु स्त्रियां, यदि वे संयम के साथ विश्वास, प्रेम व पवित्रता में बनी रहें तो सन्तान उत्पन्न करने के द्वारा उद्धार प्राप्त करेंगी।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)