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पुराना नियम · 2 इतिहास · अध्याय 4 / 36

2 इतिहास 4

1फिर उसने कांसे की एक वेदी बनाई जिसकी लम्बाई और चौड़ाई बीस-बीस हाथ तथा ऊंचाई दस हाथ थी।

2उसने ढली हुई धातु का एक हौज भी बनाया जो एक किनारे से दूसरे किनारे तक दस हाथ चौड़ा गोलाकार था। उसकी ऊंचाई पांच हाथ और परिधि तीस हाथ थी।

3उसके नीचे चारों ओर सम्पूर्ण हौज को घेरे हुए एक-एक हाथ की दूरी पर बैलों के समान दस-दस आकृतियां थी। ये बैल दो पंक्तियों में साथ-साथ ढाले गए थे।

4वह बारह बैलों पर स्थित था, जिनमें से तीन उत्तर, तीन पश्चिम, तीन दक्षिण और तीन पूर्व की ओर मुंह किए हुए थे; और हौज उनके ऊपर रखा हुआ था, और उन सभों के पिछले अंग भीतर की ओर थे।

5उसकी मोटाई चार अंगुल थी, और उसका किनारा प्याले के किनारे जैसा, सोसन के पुष्प के समान बना हुआ था। उसमें तीन हजार बत समाता था।

6उसने धोने के लिए दस हौदियां भी बनवाईं, और उनमें से पांच दाहिनी और पांच बाईं ओर रखीं कि उनमें होमबलि की वस्तुएं धोई जाएं; परन्तु वह बड़ा हौज याजकों के नहाने के लिए था।

7तब बताई गई विधि के अनुसार उसने सोने के दस दीपदान बनाए, और पांच दाहिनी तथा पांच बाईं ओर मन्दिर में रखे।

8उसने दस मेजे भी बनाईं, और पांच दाहिनी तथा पांच बाईं ओर मन्दिर में रखी। और उसने सोने के एक सौ कटोरे बनवाए।

9तब उसने याजकों के आंगन, और बड़े आंगन को बनाया और इस आंगन के दरवाजों को बनाकर उसके किवाड़ों को कांसे से मढ़ा।

10और उसने हौज को भवन की दाहिनी ओर अर्थात् दक्षिण-पूर्व की ओर रखा।

11हूराम ने पात्र, बेलचे और कटोरे भी बनाए। अतः हूराम ने उस कार्य को जिसे वह राजा सुलैमान के लिए परमेश्वर के भवन में कर रहा था, पूरा कियाः

12अर्थात् उसने दो स्तम्भ, उनके गोले, स्तम्भों की चोटियों की कंगनियां और स्तम्भों की चोटियों पर स्थित इन दोनों कंगनियों के गोलों को ढांकने के लिए दो जालियां;

13और दो जालियों के लिए चार सौ अनार, अर्थात स्तम्भों पर स्थिर कंगनियों के दोनों गोलों को ढंकने के लिए बनी प्रति जाली के लिए अनारों की दो पंक्तियां बनाईं।

14उसने कुर्सियां और उन कुर्सियों पर हौदियां बनाईं,

15और वह हौज भी बनाया जिसके नीचे बारह बैल थे।

16और हूराम-अबी ने पात्र, बेलचे, कांटे, और उसके सभी बर्तन राजा सुलैमान की ओर से यहोवा के भवन के लिए चमकाए हुए कांसे से बनाए।

17राजा ने उनको यरदन के मैदान में अर्थात् सुक्कोत और सरेदा के मध्य की चिकनी मिट्टी में ढाला।

18इस प्रकार सुलैमान ने यह सब सामग्री इतनी अधिक मात्र में बनवाई कि उसके कांसे के तौल का कोई हिसाब न था।

19सुलैमान ने उन सब वस्तओं को भी बनाया जो परमेश्वर के भवन में थीं: अर्थात् सोने की वेदी और वे मेजें भी जिन पर भेंट की रोटियां रखी जाती थीं,

20भीतरी कोठरी के सामने विधिपूर्वक जलने के लिए दीपकों सहित चोखे सोने के दीपदान,

21सोने वरन् उत्तम सोने के फूल, दीपक और चिमटे;

22और चोखे सोने के गुलगीर, कटोरे, चम्मच और करछे बनवाए; और भवन के प्रवेश-द्वार, परमपवित्र स्थान के भीतरी दरवाजे तथा मन्दिर के भवन के दरवाजे सोने के थे।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)