पुराना नियम · 2 इतिहास · अध्याय 6 / 36
2 इतिहास 6
1तब सुलैमान ने कहा, “यहोवा ने कहा है कि मैं घने बादल में निवास करूंगा।
2परन्तु मैंने तेरे लिए एक स्थान वरन् एक ऐसा विशाल भवन बनाया है जिसमें तू युगानुयुग निवास करे।”
3तब राजा ने इस्राएल की सम्पूर्ण मंडली की ओर घूमकर उसको आशीर्वाद दिया। उस समय इस्राएल की सम्पूर्ण मंडली खड़ी रही।
4और उसने कहा, “धन्य है इस्राएल का परमेश्वर यहोवा जिसने अपने मुंह से मेरे पिता दाऊद को जो वचन दिया था, उसे यह कहकर अपने हाथ से पूरा किया,
5‘जिस दिन से मैं अपनी प्रजा को मिस्र देश से निकाल लाया, तबसे मैंने इस्राएल के किसी गोत्र का कोई नगर नहीं चुना कि वहां मेरे नाम के लिए भवन बने, और न ही मैंने किसी मनुष्य को चुना कि वह मेरी प्रजा इस्राएल पर प्रधान हो;
6परन्तु मैंने यरूशलेम को चुना है कि वहां मेरा नाम रहे, और दाऊद को चुना है कि वह मेरी प्रजा इस्राएल पर प्रधान हो।’
7मेरे पिता दाऊद की यह इच्छा तो थी कि इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के नाम का भवन बनाए,
8परन्तु यहोवा ने मेरे पिता दाऊद से कहा, ‘यह जो तेरी इच्छा है कि तू मेरे नाम का भवन बनाए, यह इच्छा भली तो है,
9फिर भी तू इस भवन को न बनाएगा, परन्तु तेरा निज पुत्र ही मेरे नाम का भवन बनाएगा।’
10अब जो वचन यहोवा ने कहा था उसे उसने पूरा भी किया है; क्योंकि मैं अपने पिता दाऊद का स्थान पाकर यहोवा के वचन के अनुसार इस्राएल की गद्दी पर विराजमान हूं और मैंने इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के नाम से इस भवन को बनाया है।
11और इसमें मैंने उस सन्दूक को रखा है जिसमें यहोवा की वह वाचा है जो उसने इस्राएलियों से बांधी थी।”
12तब उसने इस्राएल की समस्त मंडली की उपस्थिति में यहोवा की वेदी के सामने खड़े होकर अपने हाथ फैलाए।
13सुलैमान ने पांच हाथ लम्बी, पांच हाथ चौड़ी और तीन हाथ ऊंची कांसे की एक चौकी बनवाकर आंगन के मध्य रखवाई थी; उसी पर खडें होकर उसने इस्राएल की समस्त मंडली के समक्ष घुटने टेके और स्वर्ग की ओर हाथ फैलाकर
14कहा, “हे यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर तेरे समान न तो स्वर्ग में और न पृथ्वी पर कोई ईश्वर हैः तू अपने उन दासों के प्रति जो सम्पूर्ण मन से तेरे सम्मुख चलते हैं, अपनी वाचा पूरी करता और करफ़णा करता रहता है।
15तूने अपने दास मेरे पिता दाऊद को जो वचन दिया था उसे पूरा किया है; जैसे तूने अपने मुख से कहा था, निश्चय वैसा ही तूने अपने हाथ से पूरा भी किया, जैसा कि आज है।
16इसलिए अब हे यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर, इस वचन को पूरा कर जो तूने अपने दास, मेरे पिता दाऊद को दिया था; यदि तेरे वंशज अपने चाल-चलन की चौकसी करें और जैसे तू मेरे सम्मुख चलता आया है वैसा ही वे भी मेरी विधियों पर चलें तो तेरे कुल में इस्राएल की राजगद्दी पर विराजने वाले की कमी न होगी।’
17अतः अब हे यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर, जो वचन तूने अपने दास दाऊद को दिया था उसे सच्चा सिद्ध कर।
18“परन्तु क्या परमेश्वर सचमुच मनुष्य के साथ इस धरती पर वास करेगा? देख, मेरे बनाए हुए भवन में क्या, तू तो स्वर्ग में वरन् सबसे ऊंचे स्वर्ग में भी नहीं समाता।
19फिर भी, हे यहोवा मेरे परमेश्वर, अपने दास की प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट की ओर ध्यान दे और मेरी पुकार और प्रार्थना को सुन जो तेरा दास तेरे सामने करता है;
20कि रात-दिन तेरी आंखें इस भवन की ओर लगी रहें अर्थात् इसी स्थान की ओर जिसके लिए तूने कहा, ‘मेरा नाम वहां रहेगा, ’ जिससे कि जो प्रार्थना तेरा दास इस स्थान की ओर करे उसे तू सुन ले।
21और तू अपने दास और अपनी प्रजा इस्राएल की प्रार्थना जिसको वे इस स्थान की ओर गिड़गिड़ाकर करें उसे सुनना, वरन् अपने निवासस्थान स्वर्ग में से सुनना, और सुनकर क्षमा करना।
22“यदि कोई मनुष्य अपने पड़ोसी के विरफ़द्ध अपराध करे, और उसको शपथ खिलाई जाए, और वह तेरे भवन में आकर इस वेदी के सामने शपथ खाए;
23तब तू स्वर्ग में से सुनकर कार्यवाही करके, अपने दासों का न्याय चुकाना अर्थात् दुष्ट को दण्ड देना और उसकी चाल उसी के सिर लौटा देना और धर्मी को उसकी धार्मिकता के अनुसार निर्दोष ठहराना।
24“और यदि तेरी प्रजा इस्राएल के लोग तेरे विरफ़द्ध पाप करने के कारण अपने शत्रुओं से हार जाएं, और तेरी ओर फिरकर तेरा नाम लें और इस भवन में गिड़गिड़ाकर तुझसे प्रार्थना करें;
25तब तू स्वर्ग में से सुनकर अपनी प्रजा इस्राएल के पाप क्षमा कर देना, और उन लोगों को इस देश में लौटा ले आना जिसे तूने उन्हें तथा उनके पूर्वजों को दिया था।
26“तेरे विरफ़द्ध उनके पाप के कारण जब आकाश बन्द हो जाए और वर्षा न हो, और तेरे दुख देने के कारण जब वे इस स्थान की ओर मुंह करके प्रार्थना करें और तेरा नाम लें तथा वे अपने पापों से फिरें;
27तब तू स्वर्ग मेें सुनकर अपने दासों और अपनी प्रजा इस्राएल के पाप क्षमा करना, निश्चय तू उन्हें भला मार्ग सिखा जिस पर उन्हें चलना चाहिए। और अपने देश पर जिसे तूने अपनी प्रजा को उत्तराधिकार में दिया है, वर्षा भेजना।
28“यदि देश में अकाल हो, महामारी हो, झुलसा अथवा गेरफ़ई हो, टिड्डियां व टिड्डे हों और यदि उनके शत्रु उन्हें उनके नगरों में घेर लें अर्थात् वहां कोई विपत्ति या व्याधि क्यों न हो,
29तब यदि कोई मनुष्य या तेरी प्रजा इस्राएल के सब लोग अपने दुख अपनी पीड़ा को जानकर गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करें और अपने हाथ इस भवन की ओर फैलाएं,
30तब तू अपने निवासस्थान स्वर्ग से सुनकर क्षमा करना और प्रत्येक को जिसका मन तू जानता ही है, उसके प्रत्येक कार्य का फल देना; क्योंकि केवल तू ही मनुष्यों के मनों को जानता है,
31कि जब तक वे उस देश में रहें जिसे तूने हमारे पूर्वजों को दिया है, तेरा भय मानकर तेरे मार्गों पर चलते रहे।
32“और वह परदेशी भी जो तेरी प्रजा इस्राएल का न हो, जब वह तेरे बड़े नाम और सामर्थी हाथ और तेरी बढ़ाई हुई भुजा के कारण सुदूर देश से आए, और आकर इस भवन की ओर मुंह करके प्रार्थना करे,
33तब तू अपने निवासस्थान स्वर्ग में से सुनना और जिन बातों के लिए वह परदेशी तुझे पुकारे, उन सबके अनुसार करना जिससे समस्त पृथ्वी के लोग तेरा नाम जानें, और तेरी प्रजा इस्राएल के समान तेरा भय मानें, और यह भी जानें कि यह भवन जिसे मैंने बनाया है वह तेरे ही नाम का कहलाता है।
34“जब तेरी प्रजा के लोग, जहां कहीं तू उन्हें भेजे, अपने शत्रुओं के विरफ़द्ध युद्ध करने जाएं और इस नगर की ओर जिसे तूने चुना है और इस भवन की ओर जिसे मैंने तेरे नाम से बनाया है, मुंह करके तुझसे प्रार्थना करें,
35तब तू स्वर्ग में से उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनकर उनके पक्ष में लड़ना।
36“जब वे तेरे विरफ़द्ध पाप करें-निष्पाप तो कोई मनुष्य नहीं है-और तू उन पर कोप करके उन्हें शत्रुओं के हाथ कर दे और वे उनको बन्दी बनाकर दूर अथवा निकट के किसी देश में ले जाएं,
37और यदि वे बन्धुवाई के देश में अपने आपे में आकर पश्चात्ताप करें और अपने बन्धुवा करने वालों के देश में गिड़गिड़कर तुझसे विनती करें, ‘हमने पाप किया है, अधर्म किया है और दुष्टता की है,’
38यदि वे अपने उस बन्धुवाई के देश में जहां वे बन्दी बनाकर ले जाए गए हों, अपने सम्पूर्ण मन और अपने सम्पूर्ण प्राण से तेरी ओर फिरें और अपने इस देश की ओर जिसे तूने उनके पूर्वजों को दिया था, और इस नगर की ओर जिसे तूने चुना है और इस भवन की ओर जिसे मैंने तेरे नाम से बनाया है, मुंह करके प्रार्थना करें,
39तो तू अपने निवासस्थान स्वर्ग में उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनकर उनके पक्ष में लड़ना और अपनी प्रजा के पाप जो उन्होंने तेरे विरफ़द्ध किए हों, क्षमा करना।
40“अब हे मेरे परमेश्वर, जो प्रार्थना इस स्थान में की जाए, उसकी ओर तेरी आंखें खुली रहें और तेरे कान लगे रहे।
41इसलिए, अब हे यहोवा परमेश्वर, उठकर तू अपने सामर्थ्य के सन्दूक के साथ अपने विश्रामस्थल में आ; हे यहोवा परमेश्वर, तेरे याजक उद्धाररूपी वस्त्र पहने रहें, और जो कुछ भला है उसमें तेरे भक्त आनन्दित रहे।
42हे यहोवा परमेश्वर, अपने अभिषिक्त से मुख न फेर; तू अपने दास दाऊद पर की गई अपनी करफ़णा को स्मरण रख।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)