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नया नियम · 2 तीमुथियुस · अध्याय 2 / 4

2 तीमुथियुस 2

1इसलिए, हे मेरे पुत्र, उस अनुग्रह में जो मसीह यीशु में है, बलवन्त हो,

2और जो बातें तू ने बहुत से गवाहों के समक्ष मुझ से सुनी हैं, उन्हें ऐसे विश्वासयोग्य मनुष्यों को सौंप दे जो दूसरों को भी सिखाने के योग्य हो।

3मसीह यीशु के अच्छे योद्धा के समान मेरे साथ दुख उठा।

4कोई भी योद्धा जो लड़ाई पर जाता है अपने आप को प्रतिदिन की झंझटों में इसलिए नहीं फंसाता कि वह अपने भरती करने वाले को प्रसन्न करे।

5इसी प्रकार जब अखाड़े में जाने वाला पहलवान यदि विधि के अनुसार न लड़े तो वह पुरस्कार नहीं पाता।

6परिश्रमी किसान को ही सब से पहिले उपज का भाग मिलना चाहिए।

7जो मैं कहता हूं उस पर ध्यान दे, क्योंकि प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा।

8मेरे सुसमाचार के अनुसार दाऊद के वंशज मृतकों में से जी उठे यीशु मसीह को स्मरण रख।

9इसी सुसमाचार के लिए मैं दुख उठाता हूं, यहाँ तक कि अपराधी की भांति बन्धनों में हूँ परन्तु परमेश्वर का वचन किसी बन्धन में नहीं है।

10इस कारण मैं चुने हुए लोगों के लिए सब कुछ सह लेता हूं, कि वे भी उस उद्धार को जो मसीह यीशु में है, और उसके साथ अनन्त महिमा को, प्राप्त करे।

11यह कथन विशवसनीय है कि यदि हम उसके साथ मर चुके हैं तो उसके साथ जीएंगे भी।

12यदि हम धीरज से सहें तो उसके साथ राज्य भी करेंगे। यदि हम उसका इनकार करें तो वह भी हमारा इनकार करेगा।

13यदि हम विश्वासघाती हों, फिर भी वह विश्वास-योग्य बना रहता है, क्योंकि वह स्वयं अपना इनकार नहीं कर सकता।

14उन्हें इन बातों का स्मरण दिला और परमेश्वर के सामने उनको चेतावनी दे कि शब्दों के बारे में तर्क-वितर्क न किया करें जो व्यर्थ है और सुनने वालों के लिए विनाश का कारण है।

15अपने आपको परमेश्वर के ग्रहणयोग्य ऐसा कार्य करनेवाला ठहराने का प्रयत्न कर जिस से लज्जित होना न पड़े, और जो सत्य के वचन को ठीक-ठीक काम में लाए।

16पर सांसारिक और व्यर्थ बकवाद् से दूर रह, क्योंकि इस से लोग अभक्ति में और भी बढ़ते जाएंगे,

17और उनकी बातें सड़े घाव की तरह फैलेंगी। हुमिनयुस और फिलेतुस उन्हीं में से हैं:

18वे यह कहकर कि पुनरुत्थान पहिले ही हो चुका है सत्य से भटक गए हैं और कुछ लोगों के विश्वास को उलट-पुलट कर देते है।

19फिर भी परमेश्वर की पक्की नींव अटल रहती है जिस पर यह छाप लगी है, “परमेश्वर अपने लोगों को पहिचानता है,” और, “हर एक जो प्रभु का नाम लेता है, वह दुष्टता से बचा रहे।”

20बड़े घर में न केवल सोने और चांदी के, वरन् लकड़ी और मिट्टी के भी पात्र होते हैं, कुछ तो आदर के लिए और कुछ अनादर के लिए।

21अतः यदि कोई अपने को इन बातों से शुद्ध रखे तो वह आदर के योग्य, पवित्र, स्वामी के लिए उपयोगी और हर भले काम के लिए तैयार किया हुआ पात्र होगा।

22जवानी की अभिलाषाओं से भाग और जो लोग शुद्ध हृदय से प्रभु का नाम लेते हैं उनके साथ धार्मिकता, विश्वास, प्रेम और शान्ति का अनुसरण कर।

23परन्तु मूर्खता और अज्ञानपूर्ण विवादों से यह जान कर अलग रह कि इन से झगड़े उत्पन्न होते है।

24परमेश्वर के दास को झगड़ालू नहीं, वरन् सब पद दया करने वाला, योग्य शिक्षक, सहनशील

25और विरोधियों को नम्रता से समझाने वाला होना चाहिए; क्या जाने परमेश्वर उन्हें पश्चात्ताप का मन दे कि वे भी सत्य को पहिचानें,

26और सचेत हो कर शैतान के फन्दे से बच निकलें, जिसने उन्हें अपनी इच्छा पूर्ण करने के लिए बन्दी बना रखा है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)