नया नियम · प्रेरितों के काम · अध्याय 7 / 28
प्रेरितों के काम 7
1महायाजक ने कहा, ‘‘क्या ये बातें ऐसी ही हैं?”
2तब उसने कहा, ‘‘भाइयों और बुजुर्गो, सुनो! हमारा पिता इब्राहीम हारान में रहने से पहिले जब मेसोपोटामिया में था तो महिमामय परमेश्वर ने उसे दर्शन दिया,
3और उस से कहा, ‘तू अपने देश और अपने कुटुम्बियों से अलग होकर उस देश को चला जा जो मैं तुझे दिखाऊंगा।’
4तब वह कसदियों के देश से निकलकर हारान में जा बसा। वहां से उसके पिता की मृत्यु के पश्चात् परमेश्वर उसे इस देश में लाया जहाँ तुम अब रहते हो!
5परमेश्वर ने वहाँ उसे कोई मीरास नहीं दी। यहाँ तक कि पैर रखने की भी जगह नहीं दी। यघपि उस समय उसके कोई पुत्र नहीं था, फिर भी प्रतिज्ञा की कि यह देश मैं तेरे और तेरे पश्चात् तेरे वंश के अधिकार में कर दूँगा।
6परन्तु परमेश्वर ने यह भी कहा कि तेरा वंश चार सौ वर्ष तक पराए देश में परदेशी होकर रहेगा और दास बनाया जाकर उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाएगा।
7परमेश्वर ने कहा, ‘जिस जाति के वे दास होंगे उसको मैं स्वयं दण्ड दूँगा, इसके पश्चात् वे छूटकर इसी स्थान पर मेरी सेवा करेंगे।’
8उसने उनसे ख़तने की वाचा बांधी, अतः इब्राहीम से इसहाक उत्पन्न हुआ और आठवें दिन उसका ख़तना हुआ। इसहाक से याकूब तथा याकूब से बारह कुलपति उत्पन्न हुए।
9और कुुलपति यूसुफ से ईर्ष्या करने लगे और उसे मिस्र जाने वालों के हाथ बेच दिया। फिर भी परमेश्वर उसके साथ था।
10परमेश्वर ने उसे समस्त संकटों से छुड़ाकर मिस्र के राजा पि़फ़रौन की दृष्टि में अनुग्रह तथा बुद्धि प्रदान की। तब राजा ने उसे मिस्र तथा अपने सम्पूर्ण घराने पर अधिकारी ठहराया।
11फिर पूरे मिस्र तथा कनान में अकाल पड़ा और बड़ा संकट आया। हमारे पूर्वजों को अन्न नहीं मिला।
12परन्तु जब याकूब ने सुना कि मिस्र में अन्न है, तो उसने हमारे पूर्वजों को पहिली बार वहां भेजा।
13दूसरी भेंट में यूसुफ ने अपने आप को अपने भाइयों पर प्रकट कर दिया, और पि़फ़रौन को भी यूसुफ के परिवार के बारे में मालूम हो गया।
14तब यूसुफ ने सन्देश भेजकर अपने पिता याकूब को तथा सारे सम्बन्धियों को जो सब मिलाकर पचहत्तर व्यक्ति थे, अपने पास बुलाया।
15याकूब मिस्र को गया और वह तथा हमारे पूर्वज वहीं मर गए।
16वहां से उनके शव शेकेम ले जाए जाकर उस क़ब्र में रख दिए गए जिसे इब्राहीम ने मूल्य देकर हमोर के पुत्रों से शेकेम में खरीदा था।
17परन्तु जब उस प्रतिज्ञा के पूरे होने का समय निकट आया जो परमेश्वर ने इब्राहीम से की थी तो मिस्र में उन लोगों की संख्या कई गुणा बढ़ गई।
18‘‘तब वहाँ एक अन्य राजा हुआ जो यूसुफ के विषय में कुछ भी नहीं जानता था।
19उसने धूर्ततापूर्वक हमारी जाति के साथ व्यवहार किया और हमारे पूर्वजों को ऐसा विवश किया कि वे अपने शिशुओं को फेंक दिया करें जिस से वे जीवित न रहे।
20‘‘इसी समय मूसा का जन्म हुआ और वह परमेश्वर की दृष्टि में अति सुन्दर था, और तीन माह तक उसके पिता के घर में उसका पालन-पोषण हुआ।
21जब वह बाहर छोड़ दिया गया तो फिरौन की पुत्री उसे उठाकर ले गई और अपने पुत्र के समान उसका पालन-पोषण करने लगी।
22मूसा को मिस्रियों की समस्त विघा की शिक्षा दी गई थी और वह बातों तथा कार्यों दोनों में सामर्थी था।
23‘‘परन्तु जब वह चालीस वर्ष का होने वाला था तब उसके मन में अपने इस्राएली भाइयों से भेंट करने का विचार आया।
24जब उसने एक के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार होते देखा तब उसका बचाव किया और मिस्री को मारकर सताए जाने वाले का बदला लिया।
25उसने सोचा कि उसके भाई समझ जाएंगे कि परमेश्वर उसके द्वारा उन्हें छुटकारा दिलवाएगा, परन्तु उन्होंने न समझा।
26दूसरे दिन जब वे आपस में झगड़ रहे थे तो उसने उनके पास आकर यह कहते हुए मेल कराने का प्रयत्न किया, ‘हे सज्जनों, तुम तो भाई-भाई हो। क्यों एक दूसरे को मारते हो?’
27परन्तु जो अपने पड़ोसी को मार रहा था उसने उसे एक ओर ढकेल कर कहा, ‘किसने तुझे हम पर अधिकारी और न्यायाधीश बनाया?
28क्या जिस प्रकार तू ने कल उस मिस्री को मार डाला, वैसे ही मुझ्रे भी मार डालना चाहता है?’
29यह सुनकर मूसा भाग गया और मिघान में परदेशी होकर रहने लगा, जहाँ उसके दो पुत्र हुए।
30‘‘जब चालीस वर्ष बीत गए तब एक स्वर्गदूत सीनै पहाड़ के जंगल में जलती हुई झाड़ी की लपटों में उसे दिखाई दिया।
31मूसा ने जब उसे देखा तो विस्मित हो उठा। जब वह उसे ध्यान से देखने के लिए निकट गया तो प्रभु की यह वाणी सुनाई दीः
32‘मैं तेरे पूर्वजों का परमेश्वर, इब्राहीम, इसहाक और याकूब का परमेश्वर हूँ,’ मूसा कांप उठा और देखने का साहस न कर सका।
33तब प्रभु ने उस से कहा, ‘अपने पैरों से जूतियां उतार दे, क्योंकि जिस स्थान पर तू खड़ा है वह पवित्र भूमि है।
34मैंने निश्चय ही मिस्र में अपनी प्रजा की दुर्दशा देखी है; और उसकी आहें सुनी हैं और मैं उसे छुड़ाने के लिए उतर आया हूँ। अब आ, मैं तुझे मिस्र भेजूँगा।’
35‘‘जिस मूसा को उन्होंने यह कह कर अस्वीकार किया था, ‘तुझे किसने अधिकारी और न्यायाधीश बनाया?’ उसी को परमेश्वर ने अधिकारी और छुडा़ने वाला ठहराकर उस स्वर्गदूत के द्वारा भेजा जिसने उसे झाड़ी में दर्शन दिया था।
36यही व्यक्ति मिस्र, लाल समुद्र और जंगल में चालीस वर्ष तक आशचर्यकर्म और चिह्न दिखाता हुआ उन्हें निकाल लाया।
37यही वह मूसा है जिसने इस्राएलियों से कहा, ‘परमेश्वर तुम्हारे लिए तुम्हारे भाइयों में से मेरे जैसा एक नबी खड़ा करेगा।’
38यह वही है जो जंगल में सभा के बीच उस स्वर्गदूत के साथ था जिसने सीनै पहाड़ पर उस से बातें कीं जो हमारे पूर्वजों के साथ था और उसने परमेश्वर के जीवित वचन पाए कि हम तक पहुंचाए।
39‘‘परन्तु हमारे पूर्वज उसकी मानने के इच्छुक न थे, अतः उन्होंने उसको त्याग कर अपने मनों को मिस्र की ओर फेरा,
40और हारून से कहा, ‘हमारे लिए ऐसे देवताओं को बना जो हमारे आगे आगे चलें, क्योंकि हम नहीं जानते कि उस मूसा का क्या हुआ जो हमें मिस्र देश से निकालकर लाया था।’
41तब उन्होंने एक बछड़ा बनाया और उसकी मूर्ति पर बलि चढ़ाई और अपने हाथ के कार्यो के कारण आनन्द मनाने लगे।
42परन्तु परमेश्वर ने उनसे मुंह मोड़ लिया तथा उन्हें आकाश के गणों को पूजने के लिए छोड़ दिया, जैसा कि नबियों की पुस्तक में लिखा है, ‘हे इस्राएल के घराने, क्या तुम जंगल में चालीस वर्ष तक पशु-बलि और अन्न-बलि मुझ ही को चढ़ाते रहे?
43तुम अपने साथ मोलेक के तम्बू और रिफान देवता के तारे को भी लिए थे, अर्थात् उन मूर्तियों को जिन्हें पूजने के लिए बनवाया था। अतः मैं भी तुमको बाबुल से परे ले जाकर बसाऊंगा।’
44‘‘निर्जन प्रदेश में तो हमारे पूर्वजों के लिए साक्षी का ऐसा तम्बू था, जैसा कि मूसा से बातें करने वाले ने आदेश दिया था कि वह उसी नमूने के अनुसार बनाए जिसे उसने देखा था।
45उसी तम्बू को उत्तराधिकार में पाकर हमारे बाप-दादे यहोशू के साथ उस समय यहां ले आए जब उन्होंने उन जातियों पर कब्जा किया जिन्हें परमेश्वर ने हमारे पूर्वजों के सामने खदेड़कर निकाल दिया, और ऐसा ही दाऊद के समय तक रहा।
46दाऊद पर परमेश्वर की कृपा दृष्टि हुई, तब उसने विनती की कि वह याकूब के परमेश्वर के लिए निवासस्थान बनवा सके।
47परन्तु सुलैमान ने ही उस निवासस्थान को उसके लिए बनाया।
48परन्तु परमप्रधान तो हाथ के बनाए भवनों में नहीं रहता। जैसा कि नबी कहता हैः
49‘स्वर्ग मेरा सिंहासन है, और पृथ्वी मेरे चरणों की चौकी है। तुम मेरे लिए किस प्रकार का घर बनाओगे? क्या मेरे
50क्या मेरे हाथों ने ही इन सब को नहीं बनाया?’
51‘‘हे हठीले लोगो, तुम्हारे मन और कान ख़तनारहित है। तुम सदा पवित्र आत्मा का विरोध करते आए हो। तुम भी वैसा ही कर रहे हो जैसा तुम्हारे पूर्वज किया करते थे,
52तुम्हारे पूर्वजों ने नबियों में से किसे नहीं सताया? उन्होंने उनको भी मार डाला जिन्होंने उस धर्मी जन के आगमन का पहिले से ही सन्देश दिया था, जिसके पकड़वाने वाले और हत्यारे अब तुम बन गए हो;
53और तुम ही हो जिन्होंने स्वर्गदूतों द्वारा ठहराई गई व्यवस्था तो पाई, परन्तु उसका पालन नहीं किया।”
54जब उन्होंने यह सुना तो वे तिलमिला उठे और स्तिफनुस पर दांत पीसने लगे।
55परन्तु उसने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर स्वर्ग की ओर एकटक देखा तथा परमेश्वर की महिमा की और यीशु को, परमेश्वर के दाहिनी ओर खड़ा देखा।
56तब उसने कहा, “देखो, मैं स्वर्ग को खुला हुआ और मनुष्य के पुत्र को परमेश्वर के दाहिनी ओर खड़ा देखता हूँ।”
57परन्तु उन्होंने ज़ोर से चिल्लाकर अपने कान बन्द कर लिए और एक साथ उस पर टूट पड़े।
58वे उसे खदेड़कर नगर से बाहर ले गए और उसका पथराव करने लगे। गवाहों ने अपने चोगे उतारकर -शाऊल नामक एक नवयुवक के पास रख दिए।
59जब वे पथराव कर रहे थे तो स्तिफनुस ने प्रार्थना की, ‘‘हे प्रभु, मेरी आत्मा को ग्रहण कर!”
60और अपने घुटनों के बल गिरकर वह ज़ोर से चिल्लाया, ‘‘प्रभु, यह पाप उन पर मत लगा!” यह कहकर वह सो गया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)