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नया नियम · प्रेरितों के काम · अध्याय 9 / 28

प्रेरितों के काम 9

1फिर शाऊल जो अभी भी प्रभु के शिज्यों को धमकियां देने तथा उनकी हत्या करने की धुन में था, महायाजक के पास गया,

2और उस से दमिशक के आराधनालयों के लिए इस अभिप्राय से पत्र प्राप्त किए कि यदि उसे इस पंथ के अनुयायी मिलें, वे चाहे स्त्री हों अथवा पुरफ़ज, तो उन्हें बांध कर यरूशलेम ले आए।

3और ऐसा हुआ कि यात्रा करते हुए जब वह दमिशक के समीप पहुंचा तो सहसा आकाश से एक ज्योति उसके चारों ओर चमकी,

4और वह भूमि पर गिर पड़ा और उसने एक आवाज़ यह कहते हुए सुनी, ‘‘शाऊल! शाऊल! तू मुझे क्यों सताता है?”

5उसने पूछा, ‘‘प्रभु, तू कौन है?” तब उसने कहा, ‘‘मैं यीशु हूँ जिसे तू सताता है।

6परन्तु उठ और नगर में जा, और जो करना है वह तुझे बता दिया जाएगा।”

7जो मनुष्य उस के साथ यात्रा कर रहे थे वे अवाक् खड़े रह गए, क्योंकि आवाज़ तो सुनते थे पर किसी को देखते न थे।

8तब -शाऊल भूमि पर से उठा और यघपि उसकी आँखें खुली हुई थीं, फिर भी वह कुछ देख नहीं पा रहा था,और वे उसका हाथ पकड़कर उसे दमिशक ले आए।

9वह तीन दिन तक न देख सका, और उसने न खाया और न पीया।

10दमिशक में हनन्याह नामक एक चेला था, जिस से प्रभु ने दर्शन में कहा, ‘‘हनन्याह!” उसने उत्तर दिया, ‘प्रभु देख, मैं यहां हूँ।’

11प्रभु, ने उस से कहा, ‘‘उठकर उस गली में जा जो ‘सीधी’ कहलाती है, और यहूदा के घर जाकर -शाऊल नामक एक तरसुस निवासी के विषय पूछ ले, क्योंकि देख, वह प्रार्थना कर रहा है,

12और उसने दर्शन में हनन्याह नामक एक पुरफ़ज को भीतर आते और अपने ऊपर हाथ रखते देखा है जिससे कि वह फिर से देख सके।”

13परन्तु हनन्याह ने उत्तर दिया, ‘‘प्रभु, मैंने बहुतों से इस व्यक्ति के विषय में सुना है, कि इसने यरूशलेम में तेरे पवित्र लोगों को कितना नुकसान पहुंचाया है,

14और यहाँ भी इसको मुख्य याजकों की ओर से अधिकार मिला है कि जितने तेरा नाम लेते हैं उन सब को बन्दी बना ले।”

15परन्तु प्रभु ने उस से कहा, ‘‘चला जा, क्योंकि वह तो ग़ैरयहूदियों, राजाओं और इस्राएलियों के सामने मेरा नाम प्रकट करने के लिए मेरा चुना हुआ पात्र है।

16और मैं उसे बताऊंगा कि मेरे नाम के लिए उसे कितना दुख सहना पड़ेगा।”

17तब हनन्याह ने जाकर उस घर में प्रवेश किया और उस पर अपने हाथ रख कर कहा, ‘‘भाई -शाऊल, प्रभु यीशु जिसने तुझे उस मार्ग पर जिस से तू आ रहा था, दर्शन दिया, उसी ने मुझे तेरे पास भेजा है कि तू फिर देखने लगे और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो जाए।”

18तब तत्काल -शाऊल की आंखों से छिलके-से गिरे और वह पुनः देखने लगा। फिर उठकर उसने बपतिस्मा लिया।

19तब भोजन करके उसने बल प्राप्त किया। फिर वह कई दिनों तक उन चेलों के साथ रहा जो दमिशक में थे।

20और वह तुरन्त आराधनालयों में यह कहकर यीशु का प्रचार करने लगा, ‘‘यही परमेश्वर का पुत्र है।”

21सब सुनने वाले आशचर्यचकित होकर कहने लगे, ‘‘क्या यह वही नहीं जो यरूशलेम में इस नाम के लेनेवालों को नाश करता था और यहाँ इसी अभिप्राय से आया था कि उन्हें बांध कर मुख्य याजकों के पास ले जाए?”

22परन्तु -शाऊल और भी सामर्थी होता गया और प्रमाण दे देकर कि मसीह यही है दमिशक में रहने वाले यहूदियों का मुंह बन्द करता रहा।

23जब बहुत दिन बीत गए तो यहूदियों ने मिलकर उसे मार डालने का षडयंत्र रचा।

24परन्तु पौलुस को उनका षडयंत्र मालूम हो गया। वे उसे मार डालने के लिए दिन-रात फाटकों पर घात लगाए रहते थे।

25परन्तु उसके चेलों ने रात में उसे एक टोकरे में बैठाकर -शहरपनाह से नीचे उतार दिया।

26यरूशलेम में आकर वह चेलों से मिलने का प्रयत्न करने लगा, परन्तु वे सब उस से डरते थे, और उन्हें विश्वास नहीं होता था कि वह भी एक चेला है।

27परन्तु बरनाबास ने उसे अपने साथ प्रेरितों के पास ले जाकर उन्हें बताया कि उसने किस प्रकार मार्ग में प्रभु को देखा और उसने उस से बातें कीं, और यह भी कि दमिशक में उसने कैसे साहसपूर्वक यीशु के नाम में प्रचार किया।

28वह उनके साथ यरूशलेम में आते-जाते और निर्भीकता से यीशु के नाम में प्रचार करता रहा।

29और यूनानी भाजी यहूदियों के साथ बातचीत और बाद-विवाद करता रहा, परन्तु वे उसकी हत्या का प्रयत्न करने लगे।

30परन्तु जब भाइयों को यह मालूम हुआ, तो वे उसे कैसरिया ले गए, फिर उन्होंने उसे तरसुस भेज दिया।

31अतः सारे यहूदिया, गलील और सामरिया की कलीसिया को -शान्ति मिली, और उसकी उन्नति होती गई, और वह प्रभु के भय में चलती तथा पवित्र आत्मा के प्रोत्साहन में बढ़ती गई।

32फिर ऐसा हुआ कि पतरस उस सम्पूर्ण क्षेत्र में यात्रा करता हुआ लुद्दा के पवित्र लोगों के पास भी पहुंचा।

33वहां उसे लकवे का मारा हुआ एनियास नामक एक व्यक्ति मिला जो आठ वर्षों से रोग-शय्या पर पड़ा हुआ था।

34पतरस ने उस से कहा, ‘‘एनियास, यीशु मसीह तुझे चंगा करता है। उठ, अपना बिस्तर ठीक कर।” वह तुरन्त उठ खड़ा हुआ।

35तब लुद्दा तथा -शारोन के सभी रहनेवाले उसे देख कर प्रभु की ओर फिरे।

36याफा में तबीता अर्थात दोरकास नामक एक शिज्या रहती थी। यह स्त्री निरन्तर भले-भले कार्य तथा दान किया करती थी।

37उन दिनों ऐसा हुआ कि वह बीमार होकर मर गई, और उन्होंने उसे नहला कर अटारी के कमरे में रख दिया।

38इसलिए कि लुद्दा, याफा के निकट था, चेलों ने यह सुनकर कि पतरस वहाँ है, दो मनुष्यों को उसके पास यह विनती करने भेजा, ‘‘हमारे पास आने में देर न कर।”

39पतरस उठकर उनके साथ चल दिया। जब वह पहुंचा तो वे उसे अटारी पर ले गए। सब विधवाएं रोती हुई उसके पास आ खड़ी हुईं और जो कुरते तथा वस्त्र दोरकास उनके साथ रहते हुए बनाया करती थी, उसे दिखाने लगी।

40तब पतरस ने सब को बाहर कर दिया और घुटने टेक कर प्रार्थना की, और -शव की ओर मुड़ कर कहा, ‘‘तबीता, उठ!” उसने अपनी आँखे खोल दीं और पतरस को देख कर वह उठ बैठी।

41उसने अपना हाथ देकर उसे उठाया तथा पवित्र लोगों और विधवाओं को बुलाकर उसे जीवित सौंप दिया।

42यह बात पूरे याफा में फैल गई, और बहुतों ने प्रभु पर विश्वास किया।

43और पतरस, याफा में चमड़े का धन्धा करने वाले -शमौन नामक एक व्यक्ति के साथ बहुत दिन तक रहा।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)