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पुराना नियम · व्यवस्थाविवरण · अध्याय 21 / 34

व्यवस्थाविवरण 21

1“यदि किसी घात किए गए व्यक्ति का शव उस देश के मैदान में पड़ा मिले जिसे तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे अधिकार में करने के लिए दे रहा है, और यह पता न चले कि किसने घात िकया है

2तो तुम्हारे प्राचीन और तुम्हारे न्यायी उस स्थान पर जाकर उन नगरों की दूरी नापें जो घात किए गए व्यक्ति के चारों ओर है।

3“तब ऐसा हो कि जो नगर उस घात किए गए व्यक्ति के निकट हो उस नगर के प्राचीन अपने गाय-बैलों में से एक बछिया लें जिससे न तो कभी कोई काम लिया गया हो और न वह जुए में जोती गई हो

4और उस नगर के प्राचीन उस बछिया को किसी बहते जल की ऐसी घाटी में ले जाएं जो जोती-बोई न गई हो और वहां उस बछिया की गर्दन तोड़ दे।

5तब लेवीय याजक समीप आएं क्योंकि उनको तेरे परमेश्वर यहोवा ने अपनी सेवा करने तथा अपने नाम से आशीर्वाद देने के लिए नियुक्त किया है। प्रत्येक विवाद तथा मारपीट का मामला उनके कहने के अनुसार निपटाया जाए।

6“उस घात किए गए व्यक्ति के निकट नगर के सब प्राचीन उस बछिया के ऊपर जिसकी गर्दन उस घाटी में तोड़ दी गई है अपने हाथ धोएं;

7और वे कहें, ‘न तो हमारे हाथों ने यह लहू बहाया है और न हमारी आंखों ने इसे देखा है।

8हे यहोवा, अपनी प्रजा इस्राएल को जिसे तूने छुड़ाया है क्षमा कर, और इस निर्दोष के लहू बहाए जाने का दोष अपनी प्रजा इस्राएल पर न लगा।’ तब लहू का दोष मिटा दिया जाएगा।

9अतः तुम वह काम करके जो यहोवा की दृष्टि में ठीक है अपने बीच में से निर्दोष के लहू का दोष दूर करना।

10“जब तू अपने शत्रुओं के विरफ़द्ध युद्ध करने निकले और तेरा परमेश्वर यहोवा उनको तेरे हाथ में कर दे, और तू उन्हें बँधुवा बनाकर ले जाए,

11तब यदि तुझे बँधुवों के बीच कोई सुन्दर स्री दिखाई दे, और तू उसकी लालसा करे तथा उसे अपनी पत्नी बनाना चाहे,

12तो उसे अपने घर में ले जाना। वहां वह अपना सिर मुंडाए और नाखून कटाए।

13फिर वह अपनी बँधुवाई के वस्र भी उतारे और तेरे घर में रहे तथा पूरे एक माह अपने माता-पिता के लिए विलाप करे। इसके बाद ही तू उसके पास जाकर उसका पति बन सकता है और वह तेरी पत्नी हो जाएगी।

14फिर यदि ऐसा हो कि वह तुझे न भाए तो उसे जहां वह जाना चाहे जाने देना। परन्तु उसे दाम लेकर न तो बेचना, और न उससे दुर्व्यवहार करना, क्योंकि तूने उसका शील भंग किया है।

15“यदि किसी पुरफ़ष की दो पत्नियां हों, और उसे एक प्रिय और दूसरी अप्रिय हो, तथा प्रिय व अप्रिय दोनों के ही पुत्र उत्पन्न हों, परन्तु यदि ज्येष्ठ पुत्र अप्रिय पत्नी से जन्मा हो,

16तो ऐसा हो कि जिस दिन वह अपने पुत्रों में अपनी सम्पत्ति का बटवारा करे, वह अपनी प्रिय पत्नी से उत्पन्न पुत्र को अपनी अप्रिय पत्नी से उत्पन्न पुत्र के स्थान में पहलौठा नहीं ठहरा सकता क्योंकि यह पहले उत्पन्न हुआ है।

17परन्तु वह अपनी अप्रिय पत्नी से उत्पन्न पुत्र को अपनी सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति का दूना भाग देकर उसके पहलौठेपन को मान्यता दे क्योंकि वह उसके पौरफ़ष का पहला फल है और पहलौठे का अधिकार उसी का है।

18“यदि किसी का पुत्र हठी और विद्रोही हो, जो अपने पिता या अपनी माता की आज्ञा न माने, और जब वे उसकी ताड़ना करे तब भी उनकी न सुने,

19तो उसके माता-पिता उसे पकड़कर अपने नगर के फाटक पर नगर-प्राचीनों के पास ले जाए।

20वे अपने नगर-प्राचीनों से कहें, ‘हमारा यह पुत्र हठी और विद्रोही है, यह हमारी नहीं सुनता और यह पेटू और पियक्कड़ है।

21तब उस नगर के सब मनुष्य पथराव करके उसको मार डाले। इस प्रकार तुम इस बुराई को अपने मध्य से दूर करना। तब सारा इस्राएल इसे सुनकर भय खाएगा।

22“फिर यदि किसी ने मृत्यु-दण्ड के योग्य पाप किया हो और वह मार डाला जाए और तूने उसे वृक्ष पर लटका दिया हो

23तो उसका शव रात भर वृक्ष पर लटका न रहे, परन्तु तुम उसे निश्चय उसी दिन मिट्टी दे देना, जिससे तुम उस देश को जिसे तुम्हारा परमेश्वर यहोवा तुम्हें उत्तराधिकार में दे रहा है अशुद्ध न करो क्योंकि जो वृक्ष पर लटकाया गया है वह परमेश्वर की ओर से शापित है

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)