पुराना नियम · सभोपदेशक · अध्याय 7 / 12
सभोपदेशक 7
1अच्छा नाम अनमोल इत्र से, और मृत्यु का दिन जन्म के दिन से अधिक अच्छा है।
2उत्सव मनाने वाले के घर जाने की अपेक्षा शोक मनाने वाले के घर जाना अधिक अच्छा है, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य का अन्त यही है, और जीवित मनुष्यः इस पर मन लगाकर विचार करेगा।
3शोक, हँसी से अधिक अच्छा है, क्योंकि चेहरे के शोकित होने पर हृदय आनन्दित हो सकता है।
4बुद्धिमान का हृदय शोक करने वालों के घर में लगा रहता है, परन्तु मूर्खों का हृदय सुख-विलास करने वालों के घर में लगा रहता है।
5बुद्धिमान की डांट सुनना, मूर्खों के गीत सुनने से उत्तम है।
6जैसी हांडी के नीचे कांटों की चरचराहट होती है, वैसी ही मूर्खों की हँसी होती है। यह भी व्यर्थ है।
7बुद्धिमान मनुष्य को अत्याचार पागल बना देता है, घूस हृदय को भ्रष्ट कर देती है।
8किसी विषय का अन्त उसके आरम्भ से अधिक अच्छा है, मनुष्य का धैर्य उसके अहंकार से अधिक अच्छा है।
9अपने हृदय में क्रोध करने के लिए उतावली मत कर, क्योंकि क्रोध मूर्खों के हृदय में वास करता है।
10मत कहना, “क्या कारण है कि बीते दिन इन दिनों से अधिक अच्छे थे?” क्योंकि तू जो इसके विषय में पूछता है, वह बुद्धिमत्तापूर्ण नही।
11बुद्धिमानी उत्तराधिकार के साथ अच्छी होती है, और जीवित रहने वालों के लिए यह लाभदायक है।
12क्योंकि रफ़पये-पैसे के समान ही बुद्धि भी संरक्षण प्रदान करती है, परन्तु ज्ञान का लाभ यह है कि वह अपने रखने वालों के जीवन की रक्षा करता है।
13परमेश्वर के कार्य पर विचार कर, क्योंकि जिस वस्तु को उसने टेढ़ा किया है उसे कौन सीधा कर सकता है?
14अपने समृद्धि के दिनों में आनन्दित रह, परन्तु अपने विपत्ति के दिनों में विचार कर-परमेश्वर ने जैसे एक को बनाया वैसे ही दूसरे को भी बनाया है जिससे कि मनुष्य अपने बाद होने वाली किसी बात को न समझ सके।
15मैंने अपने व्यर्थ जीवन-काल में यह सब कुछ देखा है; कोई धर्मी जन अपनी धार्मिकता में नष्ट हो जाता है, और कोई दुष्ट व्यक्ति अपनी दुष्टता में दीर्घायु पाता है।
16अत्यधिक धर्मी न बन, और न अत्यधिक बुद्धिमान बन। तू अपने को क्यों नष्ट करे?
17अत्यधिक दुष्ट भी मत बन, और न मूर्ख बन। तू अपने समय से पहले क्यों मरे?
18यह अच्छा है कि तू एक बात को तो पकड़े रहे, परन्तु दूसरे को भी अपने हाथ से छूटने न दे, क्योंकि जो परमेश्वर का भय मानता है वह दोनों में से निकल आता है।
19बुद्धि एक बुद्धिमान मनुष्य को नगर में रहने वाले दस शासकों से अधिक सामर्थी बनाती है।
20निःसन्देह पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्मी व्यक्ति नहीं है जो निरन्तर भला ही करता रहता है, और कभी पाप नहीं करता।
21कही हुई सब बातों पर भी गम्भीरता से ध्यान मत देना, कहीं ऐसा न हो कि तेरा नौकर तुझे शाप देते सुना जाए।
22क्योंकि तू तो स्वयं ही जानता है कि तूने भी उसी प्रकार बहुत बार दूसरों को शाप दिया है।
23मैंने इन सबको बुद्धिमानी से परखा, और मैंने कहा, “मैं बुद्धिमान बनूंगा,” परन्तु यह मुझसे बहुत दूर रहा।
24जो कुछ है वह बहुत दूर और अत्यन्त गहरा है। उसे कौन खोज सकता है?
25मैंने अपने मन को लगाया कि बुद्धि को जानूं, उसकी जांच-पड़ताल करूं और उसे खोजूं और उसे प्रकट करूं, और कि मूर्खता की बुराई तथा पागलपन की मूर्खता को जानू।
26तब मैंने मृत्यु से भी अधिक कटु उस स्री को पाया जिसका हृदय फंदा और जाल है तथा जिसके हाथ जंजीर है। वह जो परमेश्वर को प्रिय है, उस स्री से बच जाएगा; परन्तु पापी उसका शिकार हो जाएगा।
27उपदेशक कहता है, “देखो, सत्य जानने के लिए -जिसे मैं अभी भी ढूंढ़ रहा हूं पर नहीं पाया-जब मैंने एक से दूसरी बात मिलाई तो यह पायाः
28हजार में एक पुरफ़ष तो मिला, परन्तु उन सभों में एक भी स्री न मिली।
29देखो, मैंने तो केवल यह पाया है कि परमेश्वर ने मनुष्यों को सीधा बनाया, पर उन्होंने बहुत सी युक्तियां निकाल ली है।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)