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पुराना नियम · निर्गमन · अध्याय 12 / 40

निर्गमन 12

1तब यहोवा ने मिस्र देश में मूसा और हारून से कहा,

2“यह महीना तुम्हारे लिए आरम्भ का महीना हो; यह तुम्हारे लिए वर्ष का प्रथम महीना ठहरे।

3इस्राएल की समस्त मंडली से कहना कि इस महीने के दसवें दिन तुममें से प्रत्येक जन अपने पूर्वजों के घरानों के अनुसार घर के पीछे एक-एक मेमना ले।

4यदि एक मेमने के लिए घराना बहुत छोटा हो तो वह अपने घर के निकटतम पड़ोसी के साथ मिलकर लोगों की गिनती के अनुसार एक मेमना ले और हर एक की खुराक के अनुसार मेमने को बांटे।

5तुम्हारा मेमना निर्दोष और एक वर्ष का नर हो। उसे तुम चाहे भेड़ों में से या बकरियों में से ले सकते हो।

6उसे इसी महीने के चौदहवें दिन तक रख छोड़ना, तब इस्राएल की मंडली के सब लोग गोधूलि के समय उसका वध करे।

7इतना ही नहीं, जिन घरों में वे उसे खाएं, उनके दरवाजों की दोनों अलंगों तथा चौखट के ऊपरी भाग पर वे उसके लहू में से कुछ लेकर लगा दे।

8और वे उसके मांस को आग में भूनकर अख़मीरी रोटी और कड़वे साग-पात के साथ उसी रात को खा ले।

9उसमें से कुछ भी कच्चा या जल में उबालकर न खाना, परन्तु उसको उसके सिर, पैर, और अंतड़ियों सहित आग में भूनकर खाना।

10और उसमें से कुछ भी प्रातःकाल तक के लिए मत छोड़ना, परन्तु जो कुछ उसमें से प्रातःकाल तक बच जाए तो तुम उसे आग में जला देना।

11तुम उसे इस प्रकार खानाः तुम अपनी कमर बान्धे, अपनी जूतियां पांव में पहने, और अपनी लाठी हाथ में लिए हुए उसे फुर्ती से खाना-यह यहोवा का पर्व है।

12“क्योंकि उस रात्रि को मैं मिस्र देश में से होकर निकलूंगा और मिस्र देश के क्या मनुष्य और क्या पशु दोनों के पहलौठों को मारूंगा तथा मिस्र के सब देवताओं को भी मैं दण्ड दूंगा-मैं यहोवा हू।

13और जिन घरों में तुम रहते हो उन पर वह लहू तुम्हारे निमित्त चिह्न ठहरेगा, और मैं उस लहू को देखकर तुम्हें छोड़ता जाऊंगा, और जब मैं मिस्र देश को मारूंगा तो वह विपत्ति तुम पर न पड़ेगी और न ही तुम नष्ट होगे।

14वह दिन तुम्हारे लिए एक स्मृति-दिवस ठहरेगा और तुम उसे यहोवा के लिए पर्व करके मनाना। वह दिन तुम्हारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी में सदा की विधि ठहरकर पर्व माना जाए।

15“सात दिन तक अख़मीरी रोटी खाना, परन्तु पहले ही दिन तुम अपने घरों में से ख़मीर हटा देना, क्योंकि जो कोई पहले दिन से सातवें दिन तक ख़मीरी वस्तु खाए, वह व्यक्ति इस्राएल में से नष्ट किया जाए।

16पहले दिन तुम पवित्र सभा करना और सातवें दिन भी पवित्र सभा करना। उन दोनों दिनों में कोई काम न किया जाए; केवल प्रत्येक व्यक्ति के भोजन पकाने की तुम्हें अनुमति है।

17तुम अख़मीरी रोटी का पर्व भी मनाना, क्योंकि ठीक इसी दिन मैंने तुम्हारे दल-के-दल मिस्र देश से निकाले हैं; इसलिए इस दिन को तुम पीढ़ी-दर-पीढ़ी सदा की विधि मानकर मनाना।

18पहले महीने के चौदहवें दिन की संध्या से इक्कीसवें दिन की संध्या तक तुम अख़मीरी रोटी खाया करना।

19सात दिन तक तुम्हारे घरों में कुछ भी ख़मीर न पाया जाए; क्योंकि जो कोई किसी ख़मीरी वस्तु को खाए, चाहे वह देशी हो या परदेशी, वह प्राणी इस्राएल की मंडली में से नष्ट किया जाए।

20तुम कोई भी ख़मीरी वस्तु न खाना, तुम अपने घरों में अख़मीरी रोटी खाया करना।”

21तब मूसा ने इस्राएल के सब पुरनियों को बुलाया और उनसे कहा, “जाओ और तुम अपने अपने घराने के अनुसार एक-एक मेमना अलग कर रखो, और यह फसह का मेमना वध करना।

22और तुम जूफे का एक गुच्छा लेना और उसे तसले में रखे हुए लहू में डुबाना और उसी तसले में के लहू से कुछ दरवाजे की चौखट के ऊपर तथा दोनों अलंगों पर लगा देना और भोर होने तक तुममें से कोई अपने घर के दरवाजे से बाहर न निकलना।

23क्योंकि यहोवा मिस्रियों को मारने के लिए निकलेगा और जहां-जहां वह दरवाजे की चौखट के ऊपर और दोनों अलंगों पर लहू लगा हुआ देखेगा वहां-वहां यहोवा उस घर को छोड़कर आगे निकल जाएगा और नाश करने वाले को तुम्हारे घरों में मारने के लिए न जाने देगा।

24तुम इसे अपने और अपने वंश के लिए सदा की विधि करके मानना।

25और जब तुम उस देश में प्रवेश करो जिसे यहोवा तुम्हें अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार देगा तो तुम इस विधि को माना करना।

26और जब तुम्हारी सन्तान तुमसे पूछे कि इस विधि को मानने का क्या अर्थ है?

27तो तुम कहना, ‘यह यहोवा के लिए फसह का बलिदान है, क्योंकि उसने मिस्र में इस्राएलियों के घरों को छोड़ कर मिस्रियों को नष्ट कर दिया परन्तु हमारे घरों को बचा लिया’।” तब लोगों ने सिर झुकाकर दण्डवत् किया।

28तब इस्राएलियों ने जाकर ऐसा ही किया। यहोवा ने मूसा और हारून को जैसा करने की आज्ञा दी थी उन्होंने ठीक वैसा ही किया।

29ऐसा हुआ कि आधी रात को यहोवा ने सिंहासन पर विराजने वाले फिरौन के पहलौठे से लेकर बन्दीगृह में पड़े कैदी तक के पहलौठे तथा पशुओं के सब पहलौठों अर्थात् मिस्र देश के सब पहलौठों को मार डाला।

30फि़रौन रात ही को उठ बैठा, वह और उसके सब कर्मचारी और समस्त मिस्री भी। और मिस्र में भारी हाहाकार मचा, क्योंकि एक भी ऐसा घर न था जिसमें कोई मरा न हो।

31तब उसने रात ही में मूसा और हारून को बुलवाकर कहा, “उठो! तुम और इस्राएली प्रजा दोनों मेरी प्रजा के बीच में से निकल जाओ; और जैसा तुमने कहा था वैसे ही यहोवा की आराधना करो।

32अपने कहने के अनुसार अपनी भेड़-बकरियों और अपने गाय-बैलों, दोनों को लेते जाओ। और मुझे भी आर्शीवाद देते जाओ।”

33और मिस्रियों ने लोगों से आग्रह किया कि वे उनको देश में से शीघ्र ही निकल जाने दें; क्योंकि उनका कहना था, “हम सब-के-सब मर जाएंगे।”

34अतः इन लोगों ने अपने गुंधे-गुंधाए आटे को जो ख़मीर नहीं हुआ था गूंधने के बर्तनों सहित कपड़ों में बांधकर अपने-अपने कन्धों पर रख लिया।

35और इस्राएलियों ने मूसा के कहने के अनुसार यह भी किया कि मिस्रियों से सोने-चांदी के आभूषण और वस्त्र भी मांग लिए

36और यहोवा ने उन लोगों को मिस्रियों की दृष्टि में ऐसा कृपापात्र बना दिया कि जो कुछ उन्होंने मांगा वह मिस्रियों ने उन्हें दे दिया। इस प्रकार उन्होंने मिस्रियों को लूट लिया।

37तब इस्राएली लोग रामसेस से सुक्कोत को पैदल चले। और बच्चों को छोड़कर पुरुषों की संख्या लगभग छः लाख थी।

38उनके साथ एक मिली-जुली भीड़ थी, और भेड़-बकरियां, गाय-बैल और बहुत-से पशु भी साथ गए।

39उस गुंधे हुए आटे की जिसे वे मिस्र से लाए थे, उन्होंने अख़मीरी रोटियां बनाईं, क्योंकि वे मिस्र से बाहर निकाल दिए गए थे और वे वहां अधिक नहीं ठहर पाए थे, न ही वे भोजन का प्रबन्ध कर पाए थे-इसलिए वह आटा अभी तक ख़मीरा नहीं हुआ था।

40इस्राएली लोगों को मिस्र में रहते हुए चार सौ तीस वर्ष हो गए थे।

41और ऐसा हुआ कि उन चार सौ तीस वर्षों के बीतने पर, ठीक उसी दिन यहोवा की सारी सेना मिस्र देश से बाहर निकल गई।

42इसलिए कि यहोवा इस्राएलियों को मिस्र देश से बाहर निकाल लाया, वह रात्रि यहोवा के निमित्त मनाने योग्य है। यहोवा के निमित्त यह रात्रि इस्राएलियों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनाई जाए।

43यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, “फसह के पर्व की विधि यह है कि कोई भी परदेशी उसमें से न खाने पाए।

44परन्तु प्रत्येक मोल लिया गया दास जिसका तुमने ख़तना कर दिया हो, वह तो उसमें से खा सकेगा।

45पर प्रवासी और मजदूर उसमें से न खाने पाए।

46वह एक ही घर में खाया जाए; उसमें से कुछ भी मांस तुम घर के बाहर न ले जाना और न ही तुम उसकी कोई भी हड्डी तोड़ना।

47इस्राएल की समस्त मंडली इसको अवश्य मनाए।

48तुम्हारे साथ रहने वाला कोई प्रवासी यदि यहोवा के लिए फसह मनाना चाहता हो तो उसके यहां के प्रत्येक पुरुष का ख़तना किया जाए, तब वह समीप आकर उसे मनाए और वह उसी देश का निवासी समझा जाएगा। परन्तु कोई भी ख़तनारहित पुरुष इसमें से न खाने पाए।

49तुम्हारे और तुम्हारे बीच में रहने वाले प्रवासी के लिए एक ही व्यवस्था होगी।”

50तब सब इस्राएली लोगों ने ऐसा ही किया। यहोवा ने मूसा और हारून को जैसी आज्ञा दी थी उन्होंने ठीक वैसा ही किया।

51और ऐसा हुआ कि ठीक उसी दिन इस्राएली लोगों को यहोवा मिस्र देश से दल-के-दल करके निकाल ले गया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)