पुराना नियम · निर्गमन · अध्याय 18 / 40
निर्गमन 18
1जब मूसा के ससुर अर्थात् मिघान के याजक यित्रे ने यह सब सुना जो परमेश्वर ने मूसा और अपनी प्रजा इस्राएल के साथ किया था, अर्थात् यह कि यहोवा किस प्रकार इस्राएलियों को मिस्र से निकाल लाया,
2तब मूसा का ससुर यित्रे, मूसा की पत्नी सिप्पोरा को जो पहले ही वापस पहुँचा दी गई थी
3और उसके दोनों पुत्रों को ले आया। मूसा ने इनमें से एक का नाम यह कहकर गेर्शोम रखाः “मैं अन्य देश में परदेशी हुआ हू।”
4और दूसरेे का नाम यह कहकर एलीएजेर रखाः “मेरे पिता का परमेश्वर मेरा सहायक था-उसने मुझे फि़रौन की तलवार से बचाया।”
5तब मूसा का ससुर यित्रे, मूसा की पत्नी और पुत्रों को लेकर मूसा के पास जंगल में उस स्थान पर आया जहां वह परमेश्वर के पर्वत पर डेरा डाले हुए था।
6तब उसने मूसा के पास कहला भेजा, “मैं तेरा ससुर यित्रे तेरी पत्नी और उसके दोनों पुत्रों को लेकर तेरे पास आ रहा हू।”
7तब मूसा अपने ससुर से भेंट करने के लिए निकला और उसको दण्डवत् करके चूमा, फिर वे परस्पर कुशल-क्षेम पूछते हुए डेरे में गए।
8और मूसा ने अपने ससुर को वह सब बतलाया जो इस्राएलियों के निमित्त यहोवा ने फि़रौन और मिस्रियों से किया था। और उन सब विपत्तियों का भी वर्णन किया जो यात्रा के समय उन पर पड़ी थीं और कि उनसे यहोवा ने उन्हें कैसे छुड़ाया था।
9तब यित्रे यहोवा की उस भलाई के लिए जो उसने इस्राएलियों के साथ की थी कि उन्हें मिस्रियों के हाथ से छुड़ाया था, आनन्दित हुआ।
10अतः यित्रे ने कहा, “धन्य हो यहोवा जिसने तुमको फि़रौन और मिस्रियों के वश से छुड़ाया, जिसने तुम लोगों को मिस्रियों के पंजे में से छुड़ाया है।
11अब मैं जानता हूं कि यहोवा सब देवताओं से महान् है-वरन् उन बातों में भी जिनमें उन्होंने इस्राएलियों के साथ अहंकारपूर्ण व्यवहार किया था।”
12तब मूसा के ससुर यित्रे ने परमेश्वर के लिए होमबलि और मेलबलि चढ़ाए, और हारून इस्राएलियों के सब पुरनियों सहित मूसा के ससुर यित्रे के साथ परमेश्वर के सामने भोजन करने को गया।
13और दूसरे दिन ऐसा हुआ कि मूसा लोगों का न्याय करने को बैठा और भोर से संध्या तक लोग मूसा के आसपास खड़े रहे।
14जब मूसा के ससुर ने देखा कि वह लोगों के लिए क्या क्या करता है तो उसने कहा, “यह क्या है जो तू लोगों के लिए करता है, तू न्याय करने अकेला क्यों बैठता है, और भोर से संध्या तक लोग तेरे आसपास खड़े रहते हैं?”
15तब मूसा ने अपने ससुर को बताया, “क्योंकि लोग मेरे पास परमेश्वर से पूछने आते है।
16जब भी उनमें कोई मुकद्दमा होता है वे मेरे पास आते है। मैं उनके बीच न्याय करता हूं और परमेश्वर की विधियां और व्यवस्था उन्हें बतलाता हूँ।”
17तब मूसा के ससुर ने उससे कहा, “जो काम तू करता है वह अच्छा नही।
18इससे तू और तेरे साथ के ये सब लोग थक जाएंगे, क्योंकि यह कार्य तेरे लिए बहुत भारी है। तू अकेला इसे नहीं कर सकता।
19अब मेरी सुन, मैं तुझे सम्मति दूँगा और परमेश्वर तेरे संग रहे। तू परमेश्वर के सम्मुख इन लोगों का प्रतिनिधि बन और इनके मुकद्दमों को परमेश्वर के पास पहुँचाया कर।
20और उन्हें विधि और व्यवस्था सिखाया कर और जिस-जिस मार्ग पर उन्हें चलना है और जिस-जिस कार्य को उन्हें करना है उसे उनको बतला दिया कर।
21फिर तू इनमें से ऐसे-ऐसे लोग छांट ले जो गुणी, परमेश्वर का भय मानने वाले, सच्चे और अन्याय के लाभ से घृणा करने वाले हों और तू इन लोगों को हजार-हजार, सौ-सौ, पचास-पचास और दस-दस मनुष्यों पर प्रधान नियुक्त कर दे।
22और वे इन लोगों का न्याय सब समय किया करें और बड़े मुकद्दमों को तो वे तेरे पास लाएं और छोटे झगड़ों का न्याय वे आप ही किया करें, तब यह तेरे लिए सरल होगा और वे इस बोझ को तेरे साथ उठाएंगे।
23यदि तू ऐसा करे और परमेश्वर तुझे ऐसी आज्ञा दे तब तू इसे सह सकेगा और ये सब लोग अपने-अपने स्थान पर कुशल से पहुँचेंगे।”
24अतः मूसा ने अपने ससुर की बात मानी और जो कुछ उसने कहा था वह सब किया।
25और मूसा ने सम्पूर्ण इस्राएल में से योग्य पुरुषों को चुन लिया और उन्हें हज़ारझ़ार, सौ-सौ, पचास-पचास और दस-दस लोगों पर प्रधान ठहराया।
26और वे सब समय लोगों का न्याय करते थे, जो मुकद्दमा कठिन होता था उसे तो वे मूसा के पास लाते थे; परन्तु सब छोटे मुकद्दमों का निर्णय वे स्वयं किया करते थे।
27तब मूसा ने अपने ससुर को विदा किया और वह अपने देश को चला गया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)