पुराना नियम · निर्गमन · अध्याय 33 / 40
निर्गमन 33
1तब यहोवा ने मूसा से कहा, “यहां से प्रस्थान कर, और उन लोगों को, जिन्हें तू मिस्र देश से निकाल लाया है अपने साथ लेकर उस देश को जा जिसके लिए मैंने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब से यह कहकर शपथ खाई थी कि मैं उसे तेरे वंश को दूँगा।
2मैं तेरे आगे-आगे एक स्वर्गदूत को भेजूंगा, और मैं कनानी, एमोरी, हित्ती, परिज्जी, हिव्वी और यबूसी लोगों को निकाल दूँगा।
3उस देश में जाओ जहां दूध और मधु की धारा बहती है परन्तु मैं तुम्हारे मध्य होकर नहीं चलूँगा, कहीं ऐसा न हो कि मैं तुम्हें मार्ग में नाश कर दूँ, क्योंकि तुम हठीले लोग हो।”
4जब लोगों ने इस बुरे समाचार को सुना तो वे विलाप करने लगे और किसी ने भी अपने गहने नहीं पहने।
5क्योंकि यहोवा ने मूसा से कह दिया था, “इस्राएलियों से यह कहना, ‘तुम तो हठीले लोग हो, यदि मैं तुम्हारे मध्य एक क्षण भी चलूं तो तुम्हें नष्ट कर दूँगा। इसलिए अब अपने सब गहनों को उतार दो कि मैं जान सकूं कि मुझे तुम्हारे साथ क्या करना है’।”
6इसलिए इस्राएली लोग होरेब पर्वत से लेकर आगे तक अपने गहने उतारे रहे।
7मूसा तो तम्बू को छावनी से बाहर, वरन् छावनी से दूर खड़ा करवाता था, और उसे मिलापवाला तम्बू कहता था। और जो कोई यहोवा से भेंट करना चाहता था वह छावनी से बाहर उस मिलापवाले तम्बू के पास चला जाता था।
8और जब-जब मूसा तम्बू की ओर जाता, तब-तब सब लोग उठकर अपने-अपने तम्बू के द्वार के सामने खड़े हो जाते और मूसा की ओर तब तक एकटक देखते रहते थे जब तक कि वह उस तम्बू के भीतर नहीं चला जाता था।
9और तब ऐसा होता था कि मूसा के तम्बू में प्रवेश करते ही बादल का खम्भा उतरकर तम्बू के प्रवेशद्वार पर ठहर जाता था; और यहोवा मूसा से बातें करने लगता था।
10जब सब लोग बादल के खम्भे को तम्बू के प्रवेशद्वार पर ठहरा हुआ देखते, तब सब लोग उठकर अपने-अपने डेरे के द्वार पर उपासना करते थे।
11यहोवा मूसा से आमने-सामने इस प्रकार बातें करता था, जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने मित्र से बातें करता है। जब मूसा छावनी में लौट आता, तब उसका सेवक, नून का नवजवान पुत्र यहोशू तम्बू से बाहर नहीं निकलता था।
12तब मूसा ने यहोवा से कहा, “देख, तू मुझसे कहता है, ‘इन लोगों को ले चल।’ परन्तु तूने मुझे यह नहीं बताया कि तू मेरे साथ किसको भेजेगा। फिर भी, तूने कहा है, ‘मैं तुझे नाम से जानता हूं, और तू मेरी कृपा-दृष्टि का पात्र भी है।’
13इसलिए अब मैं तुझसे विनती करता हूं, यदि तेरी कृपा-दृष्टि मुझ पर है तो मुझे अपने मार्ग समझा दे कि मैं तुझे जान सकूं जिससे मैं तेरी कृपा-दृष्टि प्राप्त कंरू। यह भी ध्यान रख कि यह जाति तेरी ही प्रजा है।”
14उसने कहा, “मैं तेरे साथ-साथ चलूंगा, और मैं तुझे विश्राम दूँगा।”
15तब उसने उससे कहा, “यदि तू हमारे साथ न जाए, तो हमें यहां से आगे न ले जा।
16क्योंकि, तब यह कैसे ज्ञात हो सकेगा कि न केवल मैंने तेरी कृपा-दृष्टि प्राप्त की है, परन्तु तेरी प्रजा ने भी? क्या इससे नहीं, कि तू हमारे संग-संग चले, जिससे कि मैं और तेरी प्रजा, उन सब लोगों से अलग ठहरें जो इस पृथ्वी पर हैं?”
17तब यहोवा ने मूसा से कहा, “मैं यह काम भी जिसके विषय में तूने कहा है, करूँगा; क्योंकि तूने मेरी कृपा-दृष्टि प्राप्त की है, और मैं तुझे नाम से जानता हू।”
18तब मूसा ने कहा, “मैं तुझसे विनती करता हूं, मुझे अपना तेज दिखा!”
19उसने कहा, “मैं स्वयं अपनी सारी भलाई तेरे समक्ष प्रकट करूंगा, और तेरे समक्ष यहोवा के नाम का प्रचार करूंगा; और जिस पर अनुग्रह करना चाहूँ उस पर अनुग्रह करूंगा, और जिस पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूंगा।”
20परन्तु उसने कहा, “तू मेरे मुख का दर्शन नहीं कर सकता, क्योंकि कोई मनुष्य मेरे मुख का दर्शन करके जीवित नहीं रह सकता!”
21तब यहोवा ने कहा, “देख, मेरे समीप एक स्थान है, और तू उस चट्टान पर खड़ा हो;
22और जब तक मेरा तेज तेरे सामने से होकर चलता रहे, तब तक मैं तुझे चट्टान की दरार में रखूँगा और जब तक मैं तेरे सामने से होकर निकल न जाऊं तब तक अपने हाथ से तुझे ढांपे रहूँगा।
23फिर मैं अपना हाथ उठा लूँगा, तब तू मेरी पीठ को तो देख पाएगा, परन्तु मेरा मुख नहीं देख पाएगा।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)