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पुराना नियम · निर्गमन · अध्याय 4 / 40

निर्गमन 4

1तब मूसा ने उत्तर दिया, “यदि वे मेरा विश्वास न करें या मेरी बात न मानें और कहें, ‘यहोवा ने तुझे दर्शन नहीं दिया है,’ तो क्या होगा?”

2तब यहोवा ने उससे कहा, “तेरे हाथ में वह क्या है?” और उसने कहा, “लाठी।”

3तब उसने कहा, ‘‘उसे भूमि पर डाल दे।” अतः उसने उसे भूमि पर डाल दिया और वह सर्प बन गई, और मूसा उसके सामने से भागा।

4परन्तु यहोवा ने मूसा से कहा,फ्हाथ बढ़ाकर उसकी पूंछ पकड़ ले कि वे लोग प्रतीति करें कि उनके पूर्वजों के परमेश्वर, अर्थात् इब्राहीम के परमेश्वर, और इसहाक के परमेश्वर, और याकूब के परमेश्वर यहोवा ने तुझको दर्शन दिया है।अतः उसने अपना हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ा और वह उसके हाथ में लाठी बन गई।

5परन्तु यहोवा ने मूसा से कहा, “हाथ बढ़ाकर उसकी पूंछ पकड़ ले कि वे लोग प्रतीति करें कि उनके पूर्वजों के परमेश्वर, अर्थात् इब्राहीम के परमेश्वर, और इसहाक के परमेश्वर, और याकूब के परमेश्वर यहोवा ने तुझको दर्शन दिया है।” अतः उसने अपना हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ा और वह उसके हाथ में लाठी बन गई।

6फिर यहोवा ने उससे यह भी कहा, “अपना हाथ अपने सीने पर रखकर ढांप।” अतः उसने अपना हाथ सीने पर रखकर ढांपा, फिर जब उसे बाहर निकाला तो क्या देखा कि उसका हाथ कोढ़ के कारण हिम-सा श्वेेत हो गया।

7तब उसने कहा, “अपना हाथ फिर से सीने पर रख कर ढांप।” अतः उसने अपना हाथ फिर सीने पर रख कर ढांप लिया और जब उसने सीने पर से उसे निकाला तो क्या देखा कि वह फिर से उसकी सारी देह के समान ज्यों का त्यों हो गया।

8“तब यदि वे तेरी बात पर विश्वास न करें या पहले चिह्न को न मानें तो वे दूसरे चिह्न के कारण विश्वास करेंगे।

9और ऐसा होगा कि यदि वे इन दोनों चिह्नों पर विश्वास न करें और तेरी बात न मानें, तो तू नील नदी में से कुछ जल लेकर सूखी भूमि पर डालना और जो जल तू नील नदी में से लेगा वह सूखी भूमि पर लहू बन जाएगा।”

10तब मूसा ने यहोवा से कहा, “हे प्रभु, मैं तो बोलने में कुशल नहीं, न ही पहले था और न जबसे तूने अपने दास से बातें कीं, क्योंकि मैं तो बोलने में जीभ का भद्दा हू।”

11और यहोवा ने उससे कहा, “मनुष्य का मुंह किसने बनाया है? मनुष्य को गूंगा या बहरा, देखने वाला या अन्धा मुझ यहोवा के सिवाय कौन बनाता है?

12अब जा, मैं तेरे मुख के संग रहूंगा और तुझे सिखाता रहूंगा कि तू क्या-क्या कहे।”

13परन्तु उसने कहा, “हे प्रभु, कृपया अपनी इच्छानुसार और किसी को भेज।”

14तब यहोवा का क्रोध मूसा पर भड़क उठा और उसने कहा, “क्या हारून लेवीय तेरा भाई नहीं? मैं जानता हूं कि वह बोलने में निपुण है। इसके अतिरिक्त देख, वह तुझसे भेंट करने को निकला आता है, वह तुझे देखकर अपने मन में प्रसन्न होगा।

15तुझे उससे बातें करनी हैं और ये बातें उसके मुहं में डालनी हैं, और मैं तेरे मुंह और उसके मुंह के संग रहूंगा और मैं तुम्हें सिखाऊंगा कि तुम्हें क्या करना होगा।

16इसके अतिरिक्त वह तेरी ओर से लोगों से बातें किया करेगा; और वह तेरे लिए मुहं और तू उसके लिए परमेश्वर के समान ठहरेगा।

17अब तू इस लाठी को अपने हाथ में ले ले जिससे तू इन चिह्नों को दिखाएगा।”

18तब मूसा ने अपने ससुर यित्रे के पास लौट कर उससे कहा, “कृपया मुझे जाने दे कि मैं लौटकर मिस्र में रहने वाले अपने भाइयों के पास जाऊं और देखूं कि वे अब तक जीवित हैं या नही।” और यित्रे ने मूसा से कहा, “कुशल से जा।”

19तब यहोवा ने मूसा से मिघान में कहा, “मिस्र को लौट जा, क्योंकि जो मनुष्य तेरे प्राण के खोजी थे वे मर गए है।”

20अतः मूसा अपनी पत्नी और पुत्रों को गदहे पर बैठाकर मिस्र देश को लौटा। मूसा अपने हाथ में परमेश्वर की वह लाठी भी ले आया।

21तब यहोवा ने मूसा से कहा, “जब तू मिस्र में पहुंचे, तो देख, फि़रौन के सामने उन सब चिह्नों को दिखाना जो मैंने तेरे वश में किए हैं; परन्तु मैं उसके मन को कठोर करूंगा, जिससे कि वह मेरी प्रजा को जाने न देगा।

22तब तू फि़रौन से कहना, ‘यहोवा यों कहता हैः इस्राएल मेरा पुत्र है, वह मेरा पहलौठा है।

23इसलिए मैंने तुझसे कहा, “मेरे पुत्र को जाने दे जिससे कि वह मेरी सेवा करे,” पर तूने उसे जाने न दिया। अतः देख, मैं तेरे पुत्र को वरन् तेरे पहलौठे को घात करूंगा’।”

24और ऐसा हुआ कि मार्ग पर सराय में यहोवा ने उससे भेंट करके उसे मार डालना चाहा।

25तब सिप्पोरा ने एक तेज चकमक की छुरी लेकर अपने बेटे की खलड़ी को काट डाला और मूसा के पैरों पर यह कहकर फेंक दिया, “निश्चय, तू मेरे लिए लहू का पति ठहरा।”

26तब यहोवा ने उसको छोड़ दिया। उस समय उसने ख़तने के कारण कहा, “तू लहू का पति है।”

27तब यहोवा ने हारून से कहा, “मूसा से भेंट करने को जंगल में जा।” इसलिए उसने परमेश्वर के पर्वत पर जाकर उससे भेंट की और उसे चूमा।

28तब मूसा ने हारून को यह बतलाया कि यहोवा ने क्या-क्या कहकर मुझे भेजा है और कौन-कौन से चिह्न दिखाने की मुझे आज्ञा दी है।

29तब मूसा और हारून ने जाकर इस्राएलियों के सब पुरनियों को इकट्ठा किया।

30और हारून ने उन्हें वे सब बातें बताईं जो यहोवा ने मूसा से कही थी। तब उसने लागों के सामने वे चिह्न दिखाए।

31इसलिए लोगों ने विश्वास किया; और जब उन्होंने सुना कि यहोवा ने इस्राएलियों की सुधि ली है और उनके दुखों पर दृष्टि की है तो उन्होंने सिर झुकाकर दण्डवत् किया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)