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पुराना नियम · यहेजकेल · अध्याय 18 / 48

यहेजकेल 18

1फिर यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचा,

2“इस्राएल देश के विषय में तुम यह कहावत क्यों कहते होः खट्टे अंगूर तो खाए बापदादों ने, पर दांत खट्टे हुए सन्तानों के?

3प्रभु यहोवा यों कहता हैः मेरे जीवन की शपथ, निश्चय, तुम यह कहावत इस्राएल में फिर कभी कहने न पाओगे।

4देखो, सब प्राण मेरे हैं, जैसे पिता का प्राण वैसे ही पुत्र का प्राण, दोनों मेरे है। जो कोई पाप करे वही मरेगा।

5परन्तु यदि मनुष्य धर्मी है और न्याय और धार्मिकता से चलता है,

6और जो पर्वत पर के पूजा-स्थलों में नहीं खाता, न इस्राएल के घराने की मूर्तियों की ओर दृष्टि करता, न पड़ोसी की स्त्री को भ्रष्ट करता, न ट्टतुमति स्त्री के पास जाता,

7न किसी पर अन्धेर करता, परन्तु ट्टणी को उसकी गिरवी लौटा देता, लूट-पाट नहीं करता, परन्तु भूखे को अपनी रोटी देता और नंगे को वस्त्र पहनाता,

8ब्याज पर ट्टण नहीं देता और न सूदखोरी करता, अपने हाथ दुष्टता से रोकता, और मनुष्यों में सच्चा न्याय करता,

9मेरे विधान का पालन करता और मेरी धर्मविधियों पर सच्चाई से चलता है-ऐसा मनुष्य धर्मी है-वह निश्चित रूप से जीवित रहेगा,” प्रभु यहोवा की यही वाणी है।

10तब यदि उसका एक उद्दण्ड पुत्र हो जो रक्तपात करता, और किसी भाई के प्रति इनमें से कोई भी कार्य करता हो

11( यघपि पिता ने स्वयं इनमें से कोई कार्य न किया हो) ,अर्थात् वह पर्वत पर के पूजा-स्थलों में खाता हो, तथा अपने पड़ोसी की पत्नी को भ्रष्ट करता हो,

12दीन-दरिद्र पर अन्धेर करता हो, लूट-पाट करता हो, गिरवी वापस नहीं करता हो, मूर्तियों पर दृष्टि लगाता हो, और घृणित कार्य करता हो,

13ब्याज पर ट्टण देता हो और सूदखोरी करता हो, तो क्या वह जीवित रहेगा? कदापि नहीं! उसने ये सब घृणित कार्य किए हैं, वह अवश्य ही मार डाला जाएगा; उसका खून उसी के सिर पर पड़ेगा।

14“फिर देख, यदि उसका एक ऐसा पुत्र है जिसने अपने पिता के सब पापों को देखा है और देखकर भी वैसा नहीं करता है,

15अर्थात् पर्वत पर के पूजा-स्थलों में नहीं खाता, न इस्राएल के घराने की मूर्तियों की ओर दृष्टि करता है, न अपने पड़ोसी की स्त्री को भ्रष्ट करता,

16न किसी पर अन्धेर करता, न गिरवी को हड़पता, न चोरी करता; परन्तु भूखे को अपनी रोटी देता और नंगे को वस्त्र पहनाता,

17दीन-दरिद्र की हानि करने से हाथ रोकता, ब्याज नहीं लेता, न सूदखोरी करता वरन् मेरी विधियों का पालन करता और मेरे नियमों पर चलता है; वह अपने पिता के अधर्म के कारण न मरेगा, वह अवश्य ही जीवित रहेगा।

18परन्तु उसका पिता जिसने अन्धेर किया, अपने भाई को लूटा, और अपने लोगों के बीच अनुचित कार्य किया, देख, वह तो अपने अधर्म के कारण मरेगा।

19“फिर भी तुम कहते हो कि पुत्र अपने पिता के अधर्म का दण्ड क्यों न भोगे? जबकि पुत्र ने न्याय और धार्मिकता के कार्य किए हैं तथा मेरे सब नियमों का पालन किया और उन पर चला है, तो निश्चत रूप से ही वह जीवित रहेगा।

20जो कोई पाप करे वही मरेगा। न तो पुत्र, पिता के और न पिता, पुत्र के अधर्म का दण्ड भोगेगा। धर्मी को अपनी ही धार्मिकता का और दुष्ट को अपनी ही दुष्टता का फल मिलेगा।

21“परन्तु यदि दुष्ट अपने किए हुए सब पापों से फिरकर मेरी सब विधियों का पालन करे तथा न्याय और धार्मिकता से चले तो वह निश्चितरूप से जीवित रहेगा, वह नहीं मरेगा।

22उसके किए हुए सारे अपराध उसके विरुद्ध स्मरण नहीं किए जाएंगे; अपनी धार्मिकता के कारण जिसका उसने पालन किया, वह जीवित रहेगा।

23प्रभु यहोवा की यह वाणी हैः क्या मैं दुष्ट की मृत्यु से प्रसन्न होता हूं? क्या इसी से नहीं कि वह अपने मार्ग से फिरकर जीवित रहे?

24“परन्तु जब धर्मी अपनी धार्मिकता से फिरकर दुष्टता करे तथा दुष्ट के समान सब घृणित कार्य करे, तो क्या वह जीवित रहेगा? उसके सब धार्मिकता के कार्य जो उसने किए वे उसके किए गए विश्वासघात और पाप के कारण स्मरण नहीं किए जाएंगे, वरन् वह उनके कारण मरेगा।

25फिर भी तुम कहते हो कि प्रभु का व्यवहार उचित नही। इसलिए हे इस्राएल के घराने, अब सुन! क्या मेरा व्यवहार उचित नहीं? क्या स्वयं तुम्हारे ही व्यवहार अनुचित नहीं?

26जब धर्मी अपनी धार्मिकता से फिरकर दुष्टता करे और उसके कारण मर जाए तो जो दुष्टता उसने की है उसी के कारण वह मरेगा।

27फिर जब कोई दुष्ट अपने दुष्ट आचरण से फिरकर न्याय और धार्मिकता से चले तो वह अपना प्राण बचाएगा।

28इसलिए कि वह सोच-विचार कर अपने किए हुए सब अधर्मों से फिरा, वह अवश्य जीवित रहेगा, मरेगा नही।

29परन्तु इस्राएल का घराना कहता है कि प्रभु का व्यवहार उचित नही। हे इस्राएल के घराने, क्या मेरा व्यवहार उचित नहीं? क्या स्वयं तुम्हारे व्यवहार ही अनुचित नहीं?

30“इसलिए हे इस्राएल के घराने, मैं तुममें से प्रत्येक का न्याय उसके आचरण के अनुसार करूंगा” “प्रभु यहोवा की यह वाणी है”ः “पश्चात्ताप करो और अपने सब अपराधों से फिर जाओ जिससे अधर्म तुम्हारे ठोकर का कारण न ठहरे।

31अपने किए हुए सब अपराधों को दूर करो और अपने हृदय और आत्मा को नया बनाओ। हे इस्राएल के घराने, तुम क्यों मरो?

32जो मरता है उसकी मृत्यु से मैं प्रसन्न नहीं होता,” प्रभु यहोवा की यही वाणी है। इसलिए पश्चात्ताप करो और जीवित रहो।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)