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पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 19 / 50

उत्पत्ति 19

1संध्या समय जब लूत सदोम के फाटक के पास बैठा हुआ था तब वे दो स्वर्गदूत सदोम पहुंचे। जब लूत ने उन्हें देखा तो वह उनसे भेंट करने के लिए उठा और उन्हें दण्डवत् करने लगा।

2उसने कहा, “मेरे स्वामियों, कृपा करके अपने दास के घर पधारो; और अपने पांव धोकर यहीं रात बिताओ; फिर प्रातः शीघ्र उठकर अपने मार्ग पर चले जाओ।” उन्होंने कहा, “नहीं, हम चौक में ही रात बिताएंगे।”

3परन्तु जब उसने उनसे बहुत विनती की, तब वे उसके साथ चलकर उसके घर में आए और उसने उनके लिए भोज का प्रबन्ध किया, और अख़मीरी रोटियां बनाईं और उन्होंने खाईं।

4इससे पहले कि वे सोते, उस नगर के लोगों ने अर्थात् सदोम के पुरुषों वरन् जवानों और बूढ़ों दोनों ने चारों ओर से आकर उस घर को घेर लिया;

5और उन्होनें लूत को पुकारकर उससे कहा, “आज रात जो पुरुष तेरे यहां आए हैं, वे कहां हैं? उन्हें बाहर हमारे पास ले आ कि हम उनसे सम्भोग करे।”

6परन्तु लूत द्वार के बाहर उनके पास गया और अपने पीछे द्वार बन्द करके

7कहने लगा, “मेरे भाइयों, कृपा कर ऐसा दुष्कर्म न करो।

8देखो, मेरी दो पुत्रियां हैं जो अभी कुंवारी है। मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊं और जैसा तुम चाहो उनके साथ व्यवहार करो, पर इन पुरुषों के साथ कुछ न करो, क्योंकि ये मेरी छत के नीचे आए है।”

9परन्तु उन्होंने कहा, “एक ओर हट जा,”और आगे कहा, “यह यहां प्रवासी होकर आया था और हम पर न्यायी की तरह अधिकार जताता है, अब हम उनसे अधिक तेरे साथ बुरा व्यवहार करेंगे!” और वे लूत पर टूट पड़े और दरवाजा तोड़ने को निकट आए।

10परन्तु उन पुरुषों ने हाथ बढ़ाकर लूत को अपने पास घर में खींच लिया और दरवाजा बन्द कर दिया।

11और उन्होंने क्या छोटे क्या बड़े जितने लोग घर के द्वार पर थे उन सब को अन्धा कर दिया; इस प्रकार वे लोग दरवाजे को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते थक गए।

12तब उन पुरुषों ने लूत से कहा, “यहां तेरा और कौन-कौन है? तेरे पुत्र-पुत्रियां, दामाद और जो कोई भी तेरा इस नगर में हो उन सबको लेकर इस स्थान से निकल जा।

13हम इस स्थान को नष्ट करने पर हैं, इसलिए कि इनकी चिल्लाहट यहोवा के सम्मुख बहुत अधिक हुई है, अतः यहोवा ने हमें इसका विनाश करने को भेजा है।”

14तब लूत ने बाहर जाकर अपने दामादों से जिनसे उसकी बेटियों का विवाह होने वाला था, कहा, “उठो, इस स्थान से निकल चलो, क्योंकि यहोवा इस नगर को नष्ट करेगा।” परन्तु इसके दामादों ने समझा कि वह हमसे हंसी कर रहा है।

15और भोर होते ही दूतों ने लूत से आग्रह करते हुए कहा, “उठ, अपनी पत्नी और दोनों पुत्रियों को जो यहां हैं ले जा, कहीं ऐसा न हो कि तू भी इस नगर के अधर्म में भस्म हो जाए।”

16परन्तु उसने संकोच किया। तब वे पुरुष उसका और उसकी पत्नी और पुत्रियों के हाथ पकड़कर उन्हें नगर के बाहर ले आए, क्योंकि यहोवा की दया उस पर थी।

17और ऐसा हुआ कि जब वे उन्हें बाहर निकाल ले आए तो एक ने कहा, “अपने प्राण बचाकर भागो! पीछे मुड़कर न देखना, न घाटी में कहीं रुकना। उन पहाड़ों पर भाग जाओ कि कहीं तुम भी नष्ट न हो जाओ।”

18परन्तु लूत ने उनसे कहा, “नहीं, मेरे स्वामियों, नहीं!

19देख, तेरे दास पर तेरे अनुग्रह की दृष्टि हुई है, और तूने अपनी दया-दृष्टि मेरे प्राण बचाकर मुझ पर प्रकट की है, परन्तु मैं पहाड़ों पर नहीं भाग सकता, कहीं ऐसा न हो कि कोई विपत्ति मुुझ पर आ पड़े और मैं मर जाऊ।

20देख, यह नगरी शरण लेने के लिए पास ही में है, वह छोटी भी हैः कृपा कर, मुझे वहां भाग जाने दे-क्या वह छोटी नहीं? और मेरा प्राण बच जाएगा।”

21उसने उससे कहा, “देख, मैं तेरी यह विनती भी स्वीकार करता हूं, कि जिस नगरी के विषय में तूने कहा है वह नष्ट न की जाएगी।

22फुर्ती कर, वहां भाग जा, क्योंकि जब तक तू वहां नहीं पहुंच जाता मैं कुछ नहीं कर सकता।” इसलिए उस नगरी का नाम सोअर पड़ा। सदोम और अमोरा का विनाश

23जब लूत सोअर पहुंचा, सूर्योदय हो चुका था।

24तब यहोवा ने अपनी ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से आग और गन्धक की वर्षा की,

25और उसने उन नगरों को, समस्त घाटी को, और उन नगरों में बसने वाले सब निवासियों को, भूमि की सारी उपज सहित नष्ट कर दिया।

26परन्तु लूत की पत्नी ने जो उसके पीछे थी, मुड़कर पीछे देखा और वह नमक का खम्भा बन गई।

27बड़े सवेरे इब्राहीम उठकर उस स्थान को गया जहां वह यहोवा के सम्मुख पहले खड़ा था;

28और उसने सदोम और अमोरा और घाटी के सारे देश की ओर दृष्टि डाली तो क्या देखा कि उस देश में से धधकते हुए भट्ठे का सा धुआं उठ रहा है।

29ऐसा हुआ कि जब परमेश्वर ने घाटी के नगरों का विनाश किया तब परमेश्वर ने इब्राहीम को स्मरण किया, और जब उसने उन नगरों को विनाश किया जिनमें लूत रहता था तो लूत को उस विनाश के बीच से निकाल लाया।

30सोअर से कूच करके लूत पहाड़ों पर रहने लगा, और उसकी दोनों पुत्रियां उसके साथ थीं, क्योंकि वह सोअर में रहने से डरता था; और वह और उसकी दोनों पुत्रियां वहां एक गुफा में रहने लगे।

31तब बड़ी बेटी ने छोटी से कहा, “हमारा पिता बूढ़ा है, और पृथ्वी पर ऐसा कोई पुरुष नहीं जो संसार की रीति के अनुसार हमारे पास आए।

32इसलिए अब आ, हम अपने पिता को मदिरा पिलाएं और उसके साथ सोएं जिससे हम अपने पिता के द्वारा उसके वंश को चला सके।”

33अतः उस रात्रि उन्होंने अपने पिता को मदिरा पिलाई और बड़ी पुत्री अन्दर जाकर अपने पिता के साथ सोई, और लूत को मालूम नहीं पड़ा कि वह कब उसके साथ लेटी या कब उठ गई।

34और दूसरे दिन ऐसा हुआ कि बड़ी बेटी ने छोटी से कहा, “देख, कल रात्रि मैं अपने पिता के साथ सोई। आ, हम आज रात भी उसे मदिरा पिलाएं और तू अन्दर जाकर उसके साथ सोना कि हम अपने पिता के द्वारा उसका वंश बचा सके।”

35तब उस रात्रि भी उन्होंने अपने पिता को मदिरा पिलाई। तब छोटी उठी और अपने पिता के संग सोई; और उसने न जाना कि वह कब उसके साथ लेटी या कब उठ गई।

36इस प्रकार लूत की दोनों पुत्रियां अपने पिता के द्वारा गर्भवती हुईं।

37बड़ी पुत्री के एक पुत्र उत्पन्न हुआ, और उसका नाम मोआब रखा गया; वह आज तक मोआबियों का मूल पिता है।

38और इसी प्रकार छोटी से भी एक पुत्र उत्पन्न हुआ, और उसका नाम बेनम्मी रखा गया। वह आज तक अम्मोनियों के वंश का मूल पिता है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)