Loading account

पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 18 / 50

उत्पत्ति 18

1जब इब्राहीम दिन की कड़ी धूप में अपने तम्बू के द्वार पर बैठा हुआ था तब यहोवा मम्रे के बांज वृक्षों के पास उसके सामने प्रकट हुआ।

2और जब उसने अपनी आंखें ऊपर उठाईं तो देखा कि तीन पुरुष मेरे सामने खड़े है। उन्हें देखकर वह उनसे मिलने को तम्बू के द्वार से दौड़ा, और भूमि पर गिरकर उसने दण्डवत् किया,

3और कहा, “मेरे प्रभु, यदि मुझ पर तेरी कृपा दृष्टि है तो अपने दास के पास से यों ही न चले जाना।

4थोड़ा पानी लाया जाए जिससे कि आप लोग अपने पांव धोकर इस वृक्ष के नीचे विश्राम करे।

5आप तो अपने दास के यहां पधारे हैं, इसलिए मैं कुछ रोटियां ले आऊंगा कि आप खाकर तृप्त हों, उसके बाद भले ही आप चले जाए।” उन्होंने कहा, “जैसा तूने कहा है, वैसा ही कर।”

6इब्राहीम ने तम्बू में सारा के पास शीघ्रता से जाकर कहा, “तुरन्त तीन पसेरी मैदा लेकर गूंध ले और फुलके बना।”

7फिर इब्राहीम झुण्ड के पास दौड़ा गया और एक अच्छा-सा नरम बछड़ा लेकर सेवक को दिया और उसने उसे फुर्ती से पकाया।

8तब उसने दूध, दही और वह बछड़ा जो उसने पकाया था उनके सामने परोसा; और जब वे खा रहे थे तो वह उनके पास वृक्ष के नीचे खड़ा रहा।

9तब उन्होंने उससे कहा, “तेरी पत्नी सारा कहां है?” उसने कहा, “वह तो तम्बू में है।”

10उससे कहा गया, “मैं अगले वर्ष निश्चय इसी समय तेरे पास फिर आऊंगा, और देख, तेरी पत्नी सारा से एक पुत्र होगा।” और उसके पीछे सारा तम्बू के द्वार से सुन रही थी।

11इब्राहीम और सारा तो बूढ़े थे, उनकी आयु ढल गई थी, और सारा का मासिक-धर्म बन्द हो चुका था।

12सारा मन में हंसते हुए कहने लगी, “मैं बूढ़ी हो गई हूं और मेरा स्वामी भी तो बूढ़ा हो गया है तो क्या मुझे यह सुख होगा?”

13और यहोवा ने इब्राहीम से कहा, “सारा यह कहकर क्यों हंसी कि मैं जो इतनी बूढ़ी हूं, क्या सचमुच जन्म दे सकूंगी?

14क्या यहोवा के लिए कुछ भी असम्भव है? मैं निर्धारित समय पर अर्थात् अगले वर्ष इसी समय तेरे पास फिर आऊंगा-और सारा की गोद में एक पुत्र होगा।”

15सारा ने यह कहते हुए इनकार किया, “मैं नहीं हंसी,” क्योंकि वह डरी हुई थी। परन्तु उसने कहा, “नहीं, तू हंसी तो थी।”

16तब उन पुरुषों ने वहां से उठकर सदोम की ओर दृष्टि की, और इब्राहीम उन्हें विदा करने के लिए उनके साथ-साथ चल रहा था।

17और यहोवा ने कहा, “जो मैं करने पर हूं, क्या उसे इब्राहीम से छिपा रखूं?

18इब्राहीम से तो एक महान् और शक्तिशाली जाति उत्पन्न होगी, और उसी के द्वारा संसार की सब जातियां आशीष पाएंगी,

19क्योंकि मैंनें उसे इसलिए चुना है कि वह अपने बच्चों और घराने को जो उसके पीछे रह जाएंगे, आज्ञा दे कि वे धार्मिकता और न्याय के काम करते हुए यहोवा के मार्ग पर स्थिर बने रहें, जिससे कि जो वचन यहोवा ने इब्राहीम के विषय में कहा है उसे पूरा करे।”

20फिर यहोवा ने कहा, “वास्तव में, सदोम और अमोरा की चिल्लाहट बढ़ गई है और उनका पाप अत्यन्त गम्भीर हो गया है।

21मैं उतरकर देखूंगा कि जैसी चिल्लाहट मुझ तक पहुंची है क्या उन्होंने ठीक उसी के अनुसार किया है, यदि नहीं तो मैं जान जाऊंगा।”

22तब वे पुरुष वहां से मुड़कर सदोम की ओर गए, परन्तु इब्राहीम तब भी यहोवा के सम्मुख खड़ा रहा।

23फिर इब्राहीम ने समीप आकर कहा, “क्या तू सचमुच दुष्टों के साथ धर्मियों का भी नाश करेगा?

24कदाचित् नगर में पचास धर्मी जन हों, क्या फिर भी तू उन्हें नष्ट कर देगा? क्या उन पचास धर्मियों को जो उसमें है। बचाने के लिए उस स्थान को सुरक्षित न छोड़ेगा?

25यह बात तुझसे दूर रहे कि दुष्टों के साथ धर्मियों को नष्ट करके धर्मियों और दुष्टों को एक समान करे। ऐसा करना तुझसे दूर रहे। क्या समस्त पृथ्वी का न्यायी उचित न्याय न करे?”

26तब यहोवा ने कहा, “यदि मुझे सदोम नगर में पचास धर्मी ही मिल जाएं तो मैं उनके कारण सारे स्थान को छोड़ दूंगा।”

27इब्राहीम ने उत्तर देते हुए कहा, “देख, यघपि में धूल और राख सदृश हूं फिर भी मैं प्रभु से बात करने का साहस कर रहा हू।

28यदि उन पचास धर्मियों में से पांच कम हो जाएं तो क्या तू उन पांच के कारण सारे नगर को नष्ट करेगा?” उसने कहा, “यदि मुझे वहां पैंतालीस ही मिल जाएं तो नष्ट न करूंगा।”

29उसने उससे फिर कहा, “यदि वहां चालीस ही मिलें तो?” उसने कहा, “मैं उन चालीस के कारण भी ऐसा नहीं करूंगा।”

30तब उसने कहा, “हे प्रभु, तू क्रोधित न हो तो मैं आगे कहूं, यदि वहां तीस मिलें तो?” और उसने कहा, “यदि मैं वहां तीस ही पाऊं, तो ऐसा नहीं करूंगा।”

31और उसने कहा, “देख, मैंने अपने प्रभु से बात करने का साहस किया है; यदि वहां बीस ही मिलें तो?” उसने कहा, “मैं उन बीस के कारण उसको नष्ट नहीं करूंगा।”

32तब उसने कहा, “हे प्रभु, यदि तू क्रोध न करे तो मैं अन्तिम बार कहूंगा, कदाचित् वहां दस ही मिलें तो?” उसने कहा, “मैं उन दस के कारण भी उसको नष्ट नहीं करूंगा।”

33इब्राहीम से बात पूरी करके यहोवा वहां से चला गया, और इब्राहीम अपने स्थान पर लौट आया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)