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पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 27 / 50

उत्पत्ति 27

1अब ऐसा हुआ कि जब इसहाक बूढ़ा हो गया और उसकी आंखें इतनी धुंधली हो गईं कि वह देख नहीं सकता था, तो उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र एसाव को बुलाकर कहा, “हे मेरे पुत्र।” उसने उससे कहा, “जी!”

2तब इसहाक ने कहा, “देख, अब मैं बूढ़ा हो गया हू। न जाने किस दिन मेरी मृत्यु हो जाए।

3अब तू अपने हथियार-तरकश और धनुष- लेकर मैदान में जा और मेरे लिए शिकार ले आ,

4और मेरी रुचि के अनुसार स्वादिष्ट भोजन बनाकर मेरे पास ले आ कि मैं उसे खाऊं और मरने से पहले जी भरके तुझे आशीर्वाद दू।”

5इसहाक अपने पुत्र से जब यह कह रहा था, तो रिबका सुन रही थी। अतएव जब एसाव जंगल में शिकार के लिए गया,

6तो रिबका ने अपने पुत्र याकूब से कहा, “देख, मैंने तेरे पिता को तेरे भाई एसाव से यह कहते सुना है,

7‘मेरे लिए शिकार लाकर स्वादिष्ट भोजन तैयार कर, कि मैं मरने से पहले उसे खाकर यहोवा की उपस्थिति में तुझे आशीर्वाद दू।’

8अतएव हे मेरे पुत्र, जो मैं कहती हूं उसे सुनः

9झुण्ड में जाकर बकरी के दो बढ़िया बच्चे ले आ कि मैं तेरे पिता की रुचि के अनुसार स्वादिष्ट भोजन तैयार करू।

10तब तू उसे अपने पिता के पास ले जाना, कि वह उसे खाए और मृत्यु से पहले तुझे आशीर्वाद दे।”

11याकूब ने अपनी माता रिबका को उत्तर दिया, “परन्तु मेरे भाई एसाव की देह पर तो बाल हैं, जबकि मेरी देह चिकनी है।

12कदाचित् मेरा पिता मुझे टटोल कर देखे, तब तो मैं उसकी दृष्टि में धोखेबाज ठहरूंगा तथा आशीर्वाद के बदले मैं अपने ऊपर शाप ले आऊंगा।”

13पर उसकी माता ने उससे कहा, “हे मेरे पुत्र, वह शाप मुझ पर पड़े, केवल मेरा कहना मान, और जाकर वे बच्चे मेरे पास ले आ।”

14अतः वह गया और उन्हें अपनी माता के पास ले आया। तब उसकी माता ने उसके पिता की रुचि के अनुसार स्वादिष्ट भोजन तैयार किया।

15तब रिबका ने अपने ज्येष्ठ पुत्र एसाव के उत्तम से उत्तम वस्त्र लेकर जो उसके पास घर में थे, अपने छोटे बेटे याकूब को पहनाए।

16उसने बकरी के बच्चों की खालों को उसके हाथों पर तथा उसके गले के चिकने भाग पर लपेट दिया।

17और अपने हाथ से पकाया हुआ स्वादिष्ट भोजन तथा रोटी अपने पुत्र याकूब के हाथ में दे दी।

18तब याकूब ने अपने पिता के पास आकर कहा, “हे मेरे पिता।” इसहाक ने कहा, “मैं यहां हू। हे मेरे पुत्र, तू कौन है?”

19याकूब ने अपने पिता से कहा, “मैं तेरा ज्येष्ठ पुत्र एसाव हू। जैसा तूने कहा था, वैसा ही मैंने किया है। उठ, अब बैठकर शिकार का मांस खा, कि तू मुझे आशीर्वाद दे सके।”

20इसहाक ने अपने पुत्र से कहा, “हे मेरे पुत्र, क्या कारण है कि तुझे इतनी जल्दी शिकार मिल गया?” उसने कहा, “क्योंकि तेरे परमेश्वर यहोवा ने मेरे लिए ऐसा होने दिया।”

21तब इसहाक ने याकूब से कहा, “हे मेरे पुत्र निकट आ कि मैं तुझे टटोल कर जान लूं कि सचमुच तू मेरा पुत्र एसाव है कि नही।”

22अतएव याकूब अपने पिता इसहाक के निकट गया, और उसने उसे छूकर कहा, “आवाज तो याकूब की है, परन्तु हाथ तो एसाव के है।”

23और उसने उसे नहीं पहचाना, क्योंकि उसके हाथों पर वैसे ही बाल थे जैसे उसके भाई एसाव के हाथों पर, अतः उसने उसको आशीष दी।

24उसने पूछा, “क्या तू सचमुच मेरा पुत्र एसाव है?” और उसने कहा, “हां, मैं वही हू।”

25तब उसने कहा, “भोजन मेरे पास ले आ; मैं अपने पुत्र के द्वारा किए हुए शिकार का मांस खाऊंगा, कि तुझे आशीर्वाद दू।” तब वह भोजन उसके पास ले आया, और उसने खाया। वह उसके पास दाखरस भी लाया और उसने पीया।

26तब उसके पिता इसहाक ने उससे कहा, “हे मेरे पुत्र, निकट आकर मुझे चूम।”

27अतः उसने निकट आकर उसे चूमा। तब उसने वस्त्रों की सुगन्ध पाकर, उसे यह आशीर्वाद देते हुए कहा, “देखो, मेरे पुत्र की सुगन्ध उस खेत की सुगन्ध के समान है जिसे यहोवा ने आशीष दी हो,

28परमेश्वर तुझे आकाश से ओस, और भूमि की उत्तम से उत्तम उपज और बहुतायत से अन्न व नया दाखमधु दे।

29राज्य-राज्य के लोग तेरे अधीन हों, और जाति-जाति के लोग तुझे दण्डवत् करे। तू अपने भाइयों का स्वामी हो, और तेरी माता के पुत्र तुझे दण्डवत् करे। जो तुझे शाप दें वे शापित हों, और जो तुझे आशीष दें वे आशीष पाए।”

30अब ऐसा हुआ कि जैसे ही इसहाक याकूब को आशीर्वाद दे चुका, और याकूब अपने पिता इसहाक की उपस्थिति से निकला ही था, वैसे ही उसका भाई एसाव शिकार करके लौटा।

31तब उसने भी स्वादिष्ट भोजन बनाकर और अपने पिता के पास लाकर उससे कहा, “हे मेरे पिता, उठ और अपने पुत्र द्वारा किए गए शिकार का मांस खा कि तू मुझे हृदय से आशीर्वाद दे।”

32उसके पिता इसहाक ने उससे पूछा, “तू कौन है?” उसने कहा, “मैं तेरा पुत्र-तेरा पहिलौठा- एसाव हू।”

33इसहाक ने अत्यन्त थरथराते हुए कहा, “तब वह कौन था जो शिकार का मांस मेरे पास लाया, जिससे कि तेरे आने से पहले मैंने वह सब खाकर उसे आशीर्वाद दिया? अब तो वह निश्चय ही आशीषित होगा।”

34जब एसाव ने अपने पिता की बातें सुनीं तो वह अत्यन्त ऊंचे और दुःख भरे स्वर से चिल्लाकर अपने पिता से कहने लगा, “हे मेरे पिता, मुझे, हां, मुझे भी आशीर्वाद दे!”

35और उसने कहा, “तेरा भाई छलपूर्वक आकर तेरा आशीर्वाद लेकर चला गया।”

36एसाव ने कहा, “उसका नाम याकूब ठीक ही रखा गया। उसने दो बार मुझसे छल किया हैः उसने मेरा पहिलौठे का अधिकार तो ले ही लिया और अब मेरा आशीर्वाद भी छीन लिया है।” तब उसने पूछा, “क्या तूने मेरे लिए कोई भी आशीर्वाद नही रख छोड़ा?”

37इसहाक ने एसाव को उत्तर दिया, “मैंने उसे तेरा स्वामी ठहराया है, उसके भाई-बन्धुओं को उसके अधीन कर दिया, और अन्न व नया दाखमधु देकर उसे पुष्ट किया है। अतः अब, हे मेरे पुत्र, मैं तेरे लिए क्या करूं?”

38एसाव ने अपने पिता से कहा, “हे मेरे पिता, क्या तेरे मन में एक ही आशीर्वाद है? हे मेरे पिता, मुझे भी आशीर्वाद दे!” तब एसाव जोर-जोर से रोने लगा।

39तब उसके पिता इसहाक ने उत्तर दियाः “देख, तेरा निवास उपजाऊ भूमि और आकाश की ओस से दूर होगा।

40तू अपनी तलवार के बल पर जीवित रहेगा, और तू अपने भाई के अधीन रहेगा, पर जब तू व्याकुल होगा, तो उसके जूए को अपनी गर्दन से तोड़ डालेगा।”

41इसलिए एसाव ने याकूब से, उस आशीर्वाद के कारण जो उसके पिता ने उसे दिया था, बैर रखा। एसाव ने अपने मन में कहा, “मेरे पिता की मृत्यु के दिन निकट हैं; उसके बाद मैं अपने भाई याकूब का घात करूंगा।”

42जब रिबका को उसके ज्येष्ठ पुत्र एसाव की ये बातें बताई गईं, तो उसने अपने छोटे पुत्र याकूब को बुलवाकर कहा, “तेरा भाई एसाव तुझे मारकर ही दम लेने का विचार कर अपने आपको सांत्वना दे रहा है।

43“अतः हे मेरे पुत्र, अब जो मैं कहती हूं, उसे करः तुरन्त मेरे भाई लाबान के पास हारान को भाग जा।

44“जब तक मेरे भाई का प्रकोप शान्त न हो जाए, तब तक कुछ समय के लिए तू वहीं रहना,

45अर्थात् जब तक तेरे विरुद्ध तेरे भाई का क्रोध शान्त न हो जाए और जो कुछ तूने उसके साथ किया है उसे वह भूल न जाए। और तब मैं तुझे वहां से बुलवा लूंगी। मैं एक ही दिन में क्यों तुम दोनों से हाथ धो बैठूं?”

46और रिबका ने इसहाक से कहा, “मैं हित्ती लड़कियों के साथ रहते-रहते उकता गई हूं! यदि याकूब भी इस देश की लड़कियों में से किसी हित्ती लड़की से विवाह कर लेता है, तब मेरे जीवन में मुझे कौन-सा सुख मिलेगा?”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)